Tuesday - 11 August 2020 - 8:40 PM

दुश्मन के शव के साथ भी ऐसा नहीं होता, ये तो फिर अपने हैं

प्रीति सिंह

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इंसानी सभ्यताओं के विकास की कहानियां और रस्मों रिवाज भले ही कितने अलग क्यों न हो लेकिन कुछ बातें एक जैसी होती हैं। जैसे शवों के सम्मान की परंपरा। हर जगह दुश्मन तक के शव के सम्मान देने का चलन है, लेकिन कोरोना काल में सब कुछ बदल गया है। भारत जैसे देश में जहां मृतक के भी संस्कार किए जाते हैं, वहां मृतकों के अंतिम संस्कार में संवेदनहीनता को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

दो महीने पहले अमेरिकन लैटिन देश इक्वाडोर पूरी दुनिया में चर्चा में था। चर्चा में इक्वाडोर इसलिए था क्योंकि वहां कोरोना की वजह से जान गवाने वाले लोगों का शव सड़कों पर छोड़ कर जा रहे हैं। लोगों को अपने परिवार वालों के शव हासिल करने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही थी। अस्पताल और कब्रिस्तान के बाहर लोगों की लंबी कतारें देखी जा रही थी। लोगों को कई घंटों के इंतजार के बाद शव मिल भी रहा है तो उनके लिए पहचान कर पाना खासा मुश्किल भरा हो रहा था, क्योंकि शवों का चेहरा बिगड़ गया था। उसमें कीड़े लग गए थे।

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इक्वाडोर का जिक्र इसलिए क्योंकि भारत में भी कोरोना महामारी का असर दिखने लगा है। यहां सड़कों पर कोरोना मरीज का शव तो नहीं दिख रहा लेकिन कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या अधिक होने के कारण उनके अंतिम संस्कार में संवदेनहीनता देखी जा रही है।

कोरोना काल में सबकुछ बदल गया है। कुछ माह पहले तक हम दूसरे देशों में कोरोना की वजह उपजे दुखद हालात की तस्वीरें देखकर दुखी होते थे और आज हम अपने देश में ऐसे हालात के गवाह बन रहे हैं। कोरोना संक्रमण ने जहां एक ओर लोगों की लाचारी को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी ओर व्यवस्थागत खामियों और उसकी संवेदनहीनता को भी उघाडऩा शुरू कर दिया है।

भारत में कोरोना के दस्तक देने के बाद से ही जांच का समुचित प्रबंध न होने, चिकित्साकर्मियों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध न कराए जा सकने, मरीजों के लिए अस्पतालों में पर्याप्त जगह न मिल पाने आदि को लेकर अंगुलियां उठती रही हैं। अब मृतकों के अंतिम संस्कार में संवेदनहीनता को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

अभी ये हाल तब है जब बहुत सारे लोग कोरोना की जांच से दूर है। यदि देश में जांच की रफ्तार बढ़ा दी जाए तो जो हर दिन बीस हजार मामले दर्ज हो रहे हैं वह लाखों में पहुंच जायेंगे। कोरोना संक्रमितों की संख्या बढऩे के साथ-साथ मौतों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अस्पतालों और शवदाहगृहों के सामने संक्रमण से मौत के मुंह में समाए लोगों के अंतिम संस्कार का इंतजाम करना कठिन हो गया है।

दरअसल सरकारी नियम है कि मृतकों का अंतिम संस्कार परिजन नहीं, बल्कि सरकार ही करेगी। बस, अंतिम दर्शन के लिए कुछ देर को परिवार के कुछ सदस्यों को शव के पास जाने दिया जाएगा। सरकार ने अंतिम संस्कार के लिए शवदाहगृह भी तय कर रखा हैं, मगर इन दिनों कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या अधिक होने के कारण उनके अंतिम संस्कार में काफी वक्त लग रहा है। हालत यह है कि अस्पतालों के मुर्दाघरों में शवों के रखने की जगह नहीं है।

सरकारी नियम के मुताबिक कोरोना से हुई मौतों के मामले में शवों को दो घंटे के भीतर मुर्दाघर में भेज देना और चौबीस घंटे के भीतर उनका अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए, मगर ऐसा हो नहीं रहा है। दरअसल मुर्दाघरों में जगह न होने के कारण शवों को लंबे समय तक अस्पताल के बिस्तरों पर ही छोड़ दिया जा रहा है। इसका कई तरह का प्रभाव पड़ रहा है। एक तो शवों के खराब होने का डर और दूसरा आस-पास के मरीजों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।

शवों की बदइंतजामी और दाह-संस्कार में की जा रही लापरवाही को लेकर पिछले दिनों दिल्ली चर्चा में थी। जब यह हाल देश की राजधानी का है तो दूसरे राज्यों में क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। दूसरे राज्यों में स्थिति गंभीर है। पुडुच्चेरी और कर्नाटक में शवों को गड्ढे में दफनाए जाने की घटनाएं सामने आई, तो वहां के प्रशासन को माफी मांगनी पड़ी थी।

इन घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रशासन शवों के अंतिम संस्कार को लेकर किस कदर संवेदनहीनता दिखा रहा है। भारत में रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार संवैधानिक अधिकार है। किसी शव को इस तरह गड्ढे में डाल देना या जैसे-तैसे जला देना सामाजिक और कानूनी रूप से उचित नहीं है। यदि प्रशासन पर दबाव है तो सरकार को इसका विकल्प ढूढने की जरूरत है। अब तो सामाजिक संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस तरह शवों के निपटारे पर सवाल उठा रहे हैं।

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फिलहाल इस समस्या का समाधान तभी होगा जब शवों के अंतिम संस्कार में उनके परिजनों को शामिल किया जायेगा। जब परिजन मौके पर मौजूद होंगे तो कर्मचारी लापरवाही नहीं कर सकेंगे। कर्मचारी लापरवाही इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनके काम को कोई देखने वाला नहीं है।

कोरोना से हुई मौतों में परिजनों को इसलिए अंतिम संस्कार से दूर रखने का नियम बनाया गया था, ताकि दूसरे लोगों को संक्रमण न होने पाए, मगर चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि ऐसी क्रियाओं में किसी के भी शामिल होने से कोई खतरा नहीं है, जिसमें शव को छूना नहीं पड़ता हैं। इसलिए परिजनों को अंतिम संस्कार संबंधी रीति-रिवाजों से रोके जाने का कोई औचित्य नहीं है। अंतिम संस्कार में परिजनों को शामिल होने से इस तरह की घटनाएं निश्चित ही रूकेंगी।

भारत जैसे देश में जहां मृतक के भी संस्कार किए जाते हैं, वहां बीमारी के भय से उनके साथ प्रशासन का पशुवत व्यवहार निंदनीय है। जिस तरह से शवों का अपमान किया जा रहा है ऐसा तो कोई अपने दुश्मन के शव के साथ भी नहीं करता। इसलिए सरकार को व्यवस्थागत खामियों को दूर करने, वैकल्पिक उपाय जुटाने और शवों का गरिमापूर्ण संस्कार कराने का उपाय ढूढने की जरूरत है। ऐसा न हो कि प्रशासन की खामियों के चलते दूसरे देशों में देश का सिर झुक जाए। ऐसा न हो कि जहां कल तक हम दूसरे देशों की खबरें पढ़कर दुखी हो रहे थे वहीं अब दूसरे हमारी खबरें पढ़कर संवेदना व्यक्त करें।

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