Saturday - 18 September 2021 - 1:50 PM

डंके की चोट पर : पहली बार देखी ट्रोल होती सरकार

शबाहत हुसैन विजेता

आये दिन फ़िल्मी सितारों के ट्रोल होने की खबरें आती हैं. यह खबरें आती हैं और गुम हो जाती हैं. एक-दो दिन बाद कोई उनकी चर्चा भी नहीं करता. चर्चा इसलिए बंद हो जाती है क्योंकि किसी का भी उस व्यक्ति से न तो दिल का रिश्ता होता है न दिमाग का. इन दिनों यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार को ट्रोल किया जा रहा है. ट्रोल जनता कर रही है.

उत्तर प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. सरकार फिर से अपनी सरकार बनाना चाह रही है विपक्ष खुद को सरकार की भूमिका में देखने को लालायित है. सभी अपने-अपने सियासी तीर छोड़ने में लगे हैं. विपक्ष जहाँ महंगाई, भ्रष्टाचार, गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरने में लगा है तो वहीं सरकार विकास के नये-नये माडल लेकर सामने आ रही है.

पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर पहली बार लड़ाकू विमान उतर रहे हैं. उत्तर प्रदेश की सड़कें गड्ढा मुक्त हो गई हैं. योगी आदित्यनाथ की सरकार लखनऊ में मेट्रो लेकर आई. अगले साल कानपुर और आगरा में मेट्रो चलाने वाली है. वाराणसी क्योटो में बदलने जा रहा है. क़ानून का राज स्थापित हो चुका है. अधिकाँश बेरोजगारों को नौकरी मिल चुकी है. अस्पतालों की दशा बहुत अच्छी हो गई है. उत्तर प्रदेश में महिलायें पूरी तरह से सुरक्षित हैं. पुलिस फ़ौरन मुकदमे दर्ज कर रही है और कोई भी बेगुनाह अब सताया नहीं जा रहा है.

ऐसी दिल को छू लेने वाली बातें रोज़ सरकार की तरफ़ से बताई जा रही हैं और रोज़ आम आदमी इन बातों को सुन रहा है. दोपहिया वाहन के ज़रिये अपनी रोजाना की ज़रूरतें निबटाने वाला आम आदमी सौ रुपये लीटर का पेट्रोल डलवाने पर मजबूर है. सौ रुपये का पेट्रोल गाड़ी की टंकी में न जाने कौन से कोने में जाकर छुप जाता है और मजबूर आदमी जब जिम्मेदारियों के बोझ से दोहरे हो रहे जिस्म पर लगे सर को ऊपर उठाता है तो सामने लगे होर्डिंग पर मुस्कुराते चेहरे को देखकर तौबा करता है कि और कम गाड़ी चलाऊंगा. पेट्रोल सस्ता नहीं करवा सकता लेकिन चलाना तो कम कर ही सकता हूँ.

 

नौकरियां गायब हो रही हैं, आमदनी आधी रह गई है, खर्च दुगने हो गए हैं. मगर आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं है. आम आदमी के वश में कुछ नहीं है सोशल मीडिया पर रोजाना मुर्गों की लड़ाई चल रही है. कोई सरकारी फैसलों की तारीफ़ में दोहरा हुआ जा रहा है तो कोई सरकार को आइना दिखाने के लिए खुद के घर में लगे आईने को भी तोड़ डालने पर आमादा हो चुका है लेकिन सरकार है कि उसके पास घोषणाओं का पिटारा खाली ही नहीं हो रहा है. रोजाना नई-नई योजनायें निकलती आ रही हैं.

माफियाओं की संपत्तियां जब्त हो रही हैं मगर महंगाई वहीं है. माफियाओं की बहुमंजिला इमारतें ढहाई जा रही हैं मगर सड़कों पर जाम वैसा ही है. बलात्कारियों को फांसी देने का क़ानून बन चुका है मगर जनप्रतिनिधि भी बलात्कार का जुर्म करके भी फांसी के फंदे से कोसों दूर हैं. माफियाओं के बनाए अस्पताल ढहाए जा रहे हैं मगर सरकारी अस्पतालों में ज़रूरत पड़ने पर बेड खाली नहीं हैं. सरकारी अफसरों ने भी यह नहीं सोचा कि ढहाने के बजाय माफिया के मेडिकल कालेज को सरकारी मेडिकल कालेज बना दिया जाए तो आम आदमी को इलाज का मौका मिल सकता है लेकिन अधिकारी खामोश हैं क्योंकि सरकार माफियाओं का हौंसला तोड़ रही है.

सरकारी दावे पोस्टरों पर हैं. सरकारी दावे होर्डिंग्स पर भी हैं. सरकारी दावे अखबारों के विज्ञापनों पर भी हैं. सुनहरे ख़्वाब जनता की आँखों में लगातार भरे जा रहे हैं. इसी कड़ी में इंडियन एक्सप्रेस में पूरे पेज का विज्ञापन छपा. इस विज्ञापन में कोलकाता की सड़क को यूपी का दिखा दिया गया. यह विज्ञापन और यह खबर डिजीटल मीडिया पर भी छा गई. कोलकाता के ब्रिज ने दोपहर होते-होते सरकार की किरकिरी कर दी.

सरकारी विज्ञापनों को देखने के लिए सरकार के पास बहुत बड़ा अमला है. हज़ारों लाखों रुपये की तनख्वाह सरकार इसी वजह से देती है कि सब कुछ देखभाल कर किया जाए. विज्ञापन बनाकर देने की प्रक्रिया यूपी सरकार ने बनाई है. कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को बड़ी तनख्वाहों पर रखकर उनसे सरकार की वाहवाही लिखवाई जा रही है. सूचना विभाग की सेवा से रिटायर हो चुके कुछ अधिकारियों को इसी काम को देखते रहने के लिए हज़ारों रुपये हर महीने इसी बात के लिए दिए जा रहे हैं कि वह सरकार की छवि को चमकाएं. वह अधिकारी सोशल मीडिया पर बिजी हैं. लोगों से फालतू की बहस में बीजी हैं. हर मुद्दे पर हिन्दू-मुसलमान में बदल देने पर उतारू हैं. बहुत से बेरोजगार पत्रकार भी काफी समय से हिन्दू-मुसलमान के बीच दीवार उठाने में अपने अन्दर की पूरी सडांध को निकाल देने में लगे हैं.

 

जनता सब देख रही है. जनता सब समझ रही है. दो साल से खुदी सड़कों में डाले जा रहे सीवर और खुदी सड़कों के बीच एक्सप्रेस वे पर उतरते लड़ाकू विमानों की तस्वीरें आम आदमी को कितना खुश कर पा रही हैं इसका नमूना कोलकाता के पुल को यूपी का दिखा देने पर सामने आ गया.

हालत यह है कि सोशल मीडिया पर स्क्रोल करते जाइए. लन्दन ब्रिज को गोमतीनगर बताया जा रहा है. एफिल टावर को 6 जी का टावर बताया जा रहा है. क्योटो को बनारस बताया जा रहा है. विदेशी तस्वीरों में कहीं लखनऊ का हुसैनाबाद है तो कहीं लालबाग, आसामान चूमती इमारतें कहीं सीतापुर बनी जा रही हैं तो कहीं बलिया. लखनऊ से गोरखपुर के बीच बुलेट ट्रेन दौड़ाने की तैयारी की तस्वीर भी है. कुकरैल नाले की जगह शानदार झील बह रही है और अंग्रेज़ी फूल खिले हुए हैं. हर तस्वीर में धन्यवाद योगी जी ज़रूर लिखा हुआ है.

एक विज्ञापन में हुई गलती के बाद जिस तरह से यूपी सरकार को ट्रोल किया गया इससे पहले कभी नहीं हुआ था. यह मज़ाक नहीं है. बहुत से भक्त इसे पढ़कर भी गालियां लिखेंगे पता है. सरकार को आइना दिखाने वाले कम हैं. नफरत फैलाने के कारोबार में लगे लोग ज्यादा हैं. हिन्दू-मुसलमान के सहारे वोटों की फसल काटने वाले बहुत खुश हैं मगर एक ज़रा सी गलती पर जनता ने सरकार को ट्रोल कर यह बता दिया है कि सालों से खुदी सड़कों से वह खुश नहीं हैं. नौकरी जाने के बाद वह अपने बच्चो की फीस जमा नहीं कर पा रहे हैं. महंगाई उनके गले में फंदा डाल रही है.

पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर लड़ाकू विमान उतरने से घर में रखी थाली में खाना नहीं आ पाएगा यह बात सरकार को समझनी होगी. लड़ाकू विमान तो लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पर भी उतरा था यह बात फ़ौरन सरकार को बतानी चाहिए थी. अधिकारियों को बताना चाहिए था कि लखनऊ मेट्रो अमौसी से चारबाग तक चलने लगी थी तब नई सरकार आई थी.

पुरानी सरकारों ने जो किया उसे ईमानदारी से स्वीकार करना सीखिए फिर दिखाइये अपने विकास कार्य. सच का दामन पकड़कर चलिए. जनता ट्रोल कर रही है मतलब जनता खुश नहीं है. आलोचना करने वालों को जेल का रास्ता दिखाने वाले अपने रास्तों पर नागफनी बोते हैं. आपकी झूठी तारीफें कर अपना पेट और जेब भरने वाले कल किसी और के थे आज आपके हैं और कल किसी और के हो जायेंगे. इस विज्ञापन से सरकार को सीखने की ज़रूरत है. वास्तव में यह विज्ञापन ही आपको नींद से जगाने का सहारा भी बन सकता है. बशर्ते आप जागना चाहें.

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