Thursday - 4 March 2021 - 3:01 PM

डंके की चोट पर : ब्रिटिश हुकूमत भी मानती थी वही नेताजी थे

शबाहत हुसैन विजेता

देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था. ब्रिटिशर्स सोने की चिड़िया के पंख उखाड़ने में लगे थे. हर तरफ कराहों और सिसकियों की गूँज सुनाई दे रही थी. उस दौर में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जो मुल्क पर कब्ज़ा जमाये लोगों की हां में हां मिलाकर फायदे उठा रहे थे.

ब्रिटिश हुकूमत अपनी गुलामी करने वालों को खान बहादुर और राय बहादुर के खिताब बांटकर खुश कर रही थी. ऐसे लोगों के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी से पेंशन बंधवाई जा रही थी. उस दौर में ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़ने के लिए तमाम नौजवानों ने स्कूल छोड़कर हथियार उठा लिए थे.

हिन्दुस्तान को गुलामी से आज़ादी दिलाने के लिए मासूम भगत सिंह खेतों में बंदूकें बोने लगा था. रोटियों पर सन्देश लिखकर इधर से उधर जाने लगे थे. अंग्रेजों की रगों में डर हिलोरें लेने लगा था.

ब्रिटिश हुकूमत को नेस्तनाबूद करने के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने दुनिया में ऐसा डंका बजाया था कि ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें टेरोरिस्ट बता दिया था. ब्रिटिश हुकूमत उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ने की कोशिशों में जुट गई थी लेकिन नेताजी ने आज़ाद हिन्द फ़ौज बना ली थी. अपने मुल्क को आज़ाद कराने के लिए यह दुनिया की पहली प्राइवेट मिलट्री थी. इस मिलट्री में भी कैप्टन और कर्नल थे. इस मिलट्री में भी बहादुरी के मेडल मिलते थे. यह मिलट्री भी सरकारी मिलट्री की तरह से जंग के मैदान में उतरना जानती थी.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया था, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा. इस नारे ने हिन्दुस्तान के नौजवानों में गज़ब का जोश भर दिया था. इस जोश से लबरेज़ नौजवान अंग्रेजों की नाक में दम कर चुके थे. काकोरी में ट्रेन रोककर सरकारी खजाना लूटकर सीधे हुकूमत को चैलेन्ज कर दिया गया था.

हालात रोज़ बदल रहे थे. नये जोश के साथ ब्रिटिश हुकूमत से टकराने निकले नौजवान आये दिन लाशों में तब्दील होकर अपने घरों को लौट रहे थे. ब्रिटिश हुकूमत फांसी चढ़ाकर नौजवानों का कत्ल कर रही थी. मगर क्रांतिकारियों का हर कदम ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों में थोड़ा मट्ठा डाल ही देती थी.

ब्रिटिश हुकूमत जब यह बात अच्छी तरह से समझ गई कि अब उसे जाना ही होगा तो उसने हिन्दुस्तान के उन लोगों के साथ यह सौदा किया (जिन्हें हुकूमत ट्रांसफर होनी थी) कि सुभाष चन्द्र बोस जब भी वापस लौटेंगे तो उन्हें युद्ध अपराधी की तरह से ब्रिटिश हुकूमत को सौंपना पड़ेगा.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्लेन क्रैश में मौत की बात कही गई मगर उस पर गारंटी की मोहर किसी ने नहीं लगाई. अयोध्या में 90 के दशक में जिन गुमनामी बाबा की मौत हुई उन्हें भी नेताजी बताया गया मगर वह पुष्टि भी आज तक नहीं हो पाई. गुमनामी बाबा के पास जो सामान था उसमें ढेर सारी चीज़ें ऐसी थीं जो नेताजी से मेल खाती थीं.

नेताजी के बारे में किसी ने कभी कुछ नहीं कहा. सरकार भी खामोश रही और नेताजी के करीबी लोगों ने भी कभी ज़बान नहीं खोली. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के लेफ्टीनेंट एस.के.वर्धन और कैप्टन लक्ष्मी सहगल से अनगिनत मुलाकातें हुई हैं. इन दोनों ने भी कभी नहीं बताया कि नेताजी कहाँ हैं.

लेफ्टीनेंट एस.के.वर्धन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़ी ढेर सारी बातें करते थे लेकिन उनकी मौत के बारे में बात होती तो वह खामोश हो जाते थे. अयोध्या के गुमनामी बाबा के बारे में भी वह बात नहीं करते थे.

नेताजी के साथियों की इस खामोशी के पीछे क्या था यह तो उनके साथ ही चला गया लेकिन लेफ्टीनेंट वर्धन और कैप्टन लक्ष्मी सहगल के साथ बैठकर उस शख्सियत का अंदाजा ज़रूर होता था कि कितने बड़े दिल का शख्स था वह जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने भी नेताजी माना था.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बंगाल की ज़मीन से उठे थे और पूरे हिन्दुस्तान पर छा गए थे. नेताजी न होते तो मुल्क को आज़ाद होने में कितना वक्त और लग जाता यह बात ठीक से नहीं कही जा सकती. ब्रिटिश हुकूमत से नेताजी को लेकर अगर कोई संधि हुई थी तो उस संधि की आखिर कितनी मुश्किल शर्तें थीं जो सरकार का मुंह आज तक बंद रखने को मजबूर किये है.

नेताजी के साथियों को जो ब्रिटिश हुकूमत से नहीं घबराए थे वह आखिर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े हीरो की ज़िन्दगी के आख़री चैप्टर पर बात करने की हिम्मत आखिर क्यों नहीं कर पाए.

सवाल तो बहुत से हैं. 23 जनवरी को उनकी सालगिरह आती है तो बहुत से सवाल दिल को मथने लगते हैं. जो हिन्दुस्तान की आज़ादी का सबसे बड़ा हीरो था उसकी यादों को सहेजने के लिए आखिर हिन्दुस्तान ने क्या किया?

गुमनामी बाबा के सामान में एक तस्वीर जवाहर लाल नेहरू की अंतिम यात्रा की भी थी. पंडित नेहरू के सिरहाने सुभाष चन्द्र बोस खड़े नज़र आ रहे हैं. यह तस्वीर साबित करती है कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत नहीं हुई थी. गुमनामी बाबा के सामान में एक जगह यह भी लिखा मिला था कि स्वतंत्र भारत के इतिहास से मेरा नाम मिटा दिया गया है.

क्या सचमुच नेताजी को ऐसा सोचने को मजबूर होना पड़ा था. नेताजी की गिनी-चुनी मूर्तियां हैं. नेताजी की याद सिर्फ 23 जनवरी को ही ताज़ा होती है. नेताजी बंगाल की सियासत का बड़ा मुद्दा हैं. मगर सही यही है कि सुभाष चन्द्र बोस से पहले न कोई नेताजी था और न सुभाष चन्द्र बोस के बाद कोई नेताजी है. सदियाँ गुजर जायेंगी मगर सुभाष चन्द्र बोस को लोगों के दिलों से निकाल पाना आसान बात नहीं होगी.

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गर्व होता है कि लेफ्टिनेंट एस.के.वर्धन और कैप्टन लक्ष्मी सहगल को देखने, उनसे बात करने का मौका मिला. जो नेताजी के साथी थे, उन्हें बोलते और मुस्कुराते देखा. नेताजी के नाम पर उनकी आँखों में वह सन्नाटा देखा जो आज़ादी की कीमत बताता है. नेताजी आज नहीं है मगर यकीन है कि वह कहीं गए भी नहीं हैं. आज़ाद हिन्दुस्तान के कण-कण में नेताजी की कोशिशें सांस लेती हैं. नेताजी जहां हों, खुश हों, आज़ाद हिन्दुस्तान को दुआएं देते रहें, सालगिरह मुबारक हो नेताजी.

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