Sunday - 20 October 2019 - 7:02 AM

..तो “तालिबानी सोच” ने ले ली अनुष्का की जान!

राजीव ओझा 

इस देश में, जहां आज भी कोई मुद्दा तब बड़ा होता है जब किसी बड़े टीवी चैनल पर आए, वरना मनाते रहिये डाटर्स डे। सन्डे 22 सितम्बर को डाटर्स डे था।

बेटियों के साथ पेरेंट्स ने खुशियाँ बांटी और बेटियों के लिए गर्व करने का दिन था। लेकिन मैनपुरी की अनुष्का पाण्डेय इतनी भाग्यशाली नहीं थी नही उसके पेरेंट्स नवोदय विद्यालय के हालात ने उसे मार डाला। सोलह साल की अनुष्का मेधावी थी, जिसकी आँखों में डाक्टर बनने के सपने थे। कहा जा रहा कि उसने आत्महत्या का ली। लेकिन विद्यालय की प्रिंसिपल और हॉस्टल वार्डन इस पर बात नहीं कर रहे कि उसने अत्महत्या क्यों की। वारदात के बाद कुछ दिन तक मैनपुरी के अखबारों में यह घटना सुर्ख़ियों में रही।

प्रिंसिपल समेत कुछ लोगों के खिलाफ FIR हुई, प्रिंसिपल को सस्पेंड कर दिया गया लेकिन एक हफ्ते बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई। किसी बड़े टीवी चैनलों में यह खबर नहीं दिखी। वरदान के एक हफ्ते बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई। अब अनुष्का के माता-पिता सीबीआई जाँच और अभियुक्तों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर मैनपुरी में बेमियादी भूख हड़ताल पर बैठ गये हैं। लेकिन सवाल तो वही है अनुष्का की मौत के लिए कौन जिम्मेदार है।

तीन साल पहले हॉस्टल में अनुष्का को 48 अनुष्का को तालिबानों की तरह सजा दी। आज बात इसी गंभीर मुद्दे पर कि किस तरह प्रिंसिपल, वार्डन और कुछ छिछोरे छात्रों ने मिलकर एक बेटी, उसके सपनों और अरमानो का खून कर दिया।

किसी स्कूल को तालिबानों की तरह सजा देने का अधिकार किसने दिया?

जवाहर नवोदय विद्यालय में 11वीं की छात्रा अनुष्का मेधावी थी। उसे हाईस्कूल में 93 प्रतिशत नंबर मिले थे। वह डाक्टर बनना चाहती थी। बताते हैं कि करीब तीन-चार महीने पहले उसने छात्रों के कमेन्ट से परेशान होकर मां से शिकायत की थी। अनुष्का जब आठवीं कक्षा में थी तब उसने एक छात्रा का नमकीन बिना पूछे खा लिया था। इस पर हॉस्टल की वार्डन के कहने पर सजा के तौर पर 48 स्टूडेंट्स ने अनुष्का को एक-एक थप्पड़ लगाये थे। इसके बाद से अनुष्का अलग-थलग पड गई थी। उसे इस छोटे से गुनाह की कीमत जान दे कर चुकाई। इसके बाद से ही विद्यालय का छात्र अजय और उसको दोस्त उस पर फब्तियां कसते थे और जान से मारने की धमकी देते थे।

बताया जा रहा है इनमें प्रिंसिपल का बेटा भी शामिल है। अनुष्का ने अपने पेरेंट्स से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन वो इसकी गंभीरता को न समझ सके। अनुष्का की मौत के बाद प्रिंसिपल सुषमा सागर ने टिप्पणी की थी की एक दिन मरना तो सभी को है।

प्रिंसिपल सुषमा, वार्डन विश्ववती और दो अन्य के खिलाफ FIR में दुष्कर्म का प्रयास उअर पाक्सो एक्ट की धाराएँ भी शमिल हैं। लेकिन एक हफ्ते से दोनों फरार हैं। प्रशासन मामले की लीपापोती में जुटा है क्योंकि नवोदय विद्यालय का मैनेजर डीएम होता है और जवाबदेही उसकी है।

जारी है लीपापोती

बताया जा रहा है कि स्कूल की प्रिंसिपल सुषमा सागर का बेटा और उसके दोस्त अनुष्का को तंग कर रहे थे और मारने की धमकी भी देते थे। घरवाले अभी कुछ करने का सोच ही रहे थे कि 15 सितंबर की शाम अनुष्का का फोन आया। उन्होंने बताया कि फिर से जान से मारने की धमकी दी गई।

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16 सितंबर की सुबह अस्पताल से अनुष्का के परिजनों के किसी जानने वाले का फोन आया कि आपकी बेटी की लाश अस्पताल में देखी। घरवाले पहुंचे तो प्रिंसिपल मौजूद थीं। उन्होंने न पुलिस बुलाई, न अनुष्का के घरवालों को बताया, उसकी बॉडी लेकर खुद अस्पताल पहुंच गईं।

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वजह पता लगी कि अनुष्का ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घरवालों से सामना हुआ, प्रिंसिपल से कहासुनी हुई और उसके बाद प्रिंसिपल फ़रार। प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या है। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर जो निशान हैं वो ‘V’ शेप (जो कि फांसी पर झूलने से बनते हैं) हैं, बल्कि पूरे राउंड हैं। पूरे मामले पर भयंकर लीपापोती जारी है।

क्या छोटे शहर और गाँव की बेटियों को बड़े सपने देखने का अधिकार नही?

अनुष्का के सपने बड़े थे। उसके सपनो का गला घोंट दिया गया, वह समय से पहले चली गई। इमें दोष किसका है? अनुष्का अपने परिवार से प्यार करती थी फिर क्यों परेंट्स अपनी बेटी की पीड़ा नहीं समझ सके? बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार को गाँव-कस्बों की बेटियों का दर्द क्यों नहीं महसूस होता?

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