Thursday - 4 June 2020 - 10:47 AM

बुरी तरह फंस चुकी शिवसेना के लिए आगे कुआं हैं तो पीछे खाई

जुबिली न्यूज़ डेस्क

महाराष्ट्र में जारी सत्ता संग्राम में अगले 48 घंटे बेहद अहम हैं। राज्य के विधानसभा का कार्यकाल 8 नवंबर को खत्म हो रहा है। ऐसे में शिवसेना और बीजेपी आपस में सुलह करें और सरकार बनाएं या फिर शिवसेना अन्य विकल्प तलाशे और एनसीपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाए और कांग्रेस उसका समर्थन करे।

दो सूरत में कोई भी सिरे नहीं चढ़ती तो 9 नवंबर को देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ेगा और निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा। इसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी फडणवीस को कार्यवाहक मुख्यमंत्री नियुक्त करेंगे। साथ ही सरकार गठन के अन्य विकल्पों को तलाश किया जाएगा। इनमें सबसे बड़ी पार्टी को बुलाकर पूछा जाएगा कि क्या वो सरकार बनाने की स्थिति में है? इसके बाद अन्य पार्टियों या गठबंधन को बुलाया जाएगा। ये सब करने के बाद भी कोई हल नहीं निकला तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करेंगे। हालांकी शिवसेना और एनसीपी के साथ आने पर सहमति न बनने की स्थिति में भाजपा पिछली बार की तरह अल्पमत सरकार बना सकती है।

बता दें कि महाराष्ट्र में सरकार के गठन में जो गतिरोध बना हुआ है उसके लिए शिवसेना जिम्मेदार है। दरअसल शिवसेना खुद अपने बुने जाल में उलझ कर रह गई है। मुख्यमंत्री पद को प्रतिष्ठा का सवाल बनाने वाली शिवसेना अब तय नहीं कर पा रही है कि वह शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से समर्थन ले या फिर भाजपा के उपमुख्यमंत्री पद के प्रस्ताव को स्वीकार करे।

नई सरकार के गठन को लेकर शिवसेना को तय करना होगा कि नई परिस्थिति में वह फिर से भाजपा के साथ रहेगी या फिर एनसीपी-कांग्रेस को सत्ता के लिए नया साथी बनाएगी। मुश्किल यह है कि भाजपा पर ताबड़तोड़ आक्रमण के बाद उसे ही गले लगाना और उप मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मान लेने से शिवसेना की किरकिरी होगी, जबकि एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने की स्थिति में उस पर हिंदुत्व की राजनीति को कमजोर करने का आरोप लगेगा।

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