Saturday - 23 November 2019 - 7:17 AM

उत्तर प्रदेश में थानेदारों की तैनाती का यह रियलिटी चेक

केपी सिंह

नियुक्तियों और पदस्थापनाओं में पूरी शिददत से झलकते योगी सरकार के जातिवादी नजरिये की वजह से उसके लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति आयोग ने शासनादेश के हवाले से विभिन्न जिलों में अनुसूचित जाति जनजाति के थानेदारों के अनुपात का ब्यौरा तलब कर लिया है जिससे प्रदेश के पुलिस महकमें में हड़कंप मच गया है।

शासनादेश के मुताबिक हर जिले में अनुसूचित जाति के कम से कम 18 प्रतिशत थानेदार तैनात किये जाना चाहिए। लेकिन मौजूदा राज्य सरकार इसके अनुपालन को लेकर सदाशय नही है। जिससे जिले के मनमानी करने वाले पुलिस कप्तानों को छूट मिल गई है।

दरअसल डीएम और कप्तानों के स्तर पर ही सवर्ण सत्तावाद का प्रभाव छाया हुआ है। जिसके कारण उनके स्तर पर वैसे भी सामाजिक उदारता की गुंजाइश न्यून है। हैरत की बात यह है कि अपने आप को उपेक्षित बहुसंख्यकों की पार्टी मानने वाले सपा और बसपा जैसे दल इस मामले में खामोशी अख्तियार किये हुए है जो उनके पाखण्ड को बेनकाब कर रहा है।

हेमवती नंदन बहुगुणा की नीति

हेमवती नंदन बहुगुणा पहाड़ के कुलीनतम ब्राहमणों में से आते थे लेकिन प्रगतिशील दृष्टिकोण को उन्होंने आत्मसात कर रखा था। जिसकी वजह से वंचितों के लिए उनके फैसलों में सहानुभूति देखी जाती थी। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में अविभाजित उत्तर प्रदेश के हर जिले में डीएम या एसपी में से एक अधिकारी अनुसूचित जाति का होना अनिवार्य था। दृष्टव्य यह है कि उस समय मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होना तो दूर यह आयोग अस्तित्व में भी नही आया था। इसलिए स्वाभाविक था कि प्रशासन में पिछड़ों की भागीदारी को लेकर उनकी सरकार ने कोई गौर नही किया था। हेमवती नंदन बहुगुणा की नियुक्तियों के संबंध में यह नीति और परंपरा कांग्रेस के शासन के प्रदेश में स्थाई अंत के साथ ही दरकती चली गई। खासतौर से पहले सपा-बसपा गठबंधन के टूटने के बाद सरकारों ने प्रशासन में सभी की भागीदारी के सिद्धांत को यथासंभव गौण कर दिया। जन्मजात श्रेष्ठता की कट्टरता से पीडि़त योगी सरकार में तो जैसे इसकी इंतहा हो गई।

ब्राहमणों की उपेक्षा के आरोप से डरती है यह सरकार

इसलिए यह सरकार शुरू से ही जातिवाद के आरोपों का सामना कर रही है। इस सरकार ने महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों की तैनाती में वंचित तबकों के प्रतिनिधित्व को संकुचित करने का काम करते हुए इसे प्रतीकात्मक रह जाने दिया है। मजे की बात यह है कि इस सरकार के जातिवाद पर उंगली उठी भी तो वंचितों के पैरोकारों की ओर से नही, उसे इस मामले में ब्राहमणों के प्रति दुर्भावना बरतने को लेकर घेरा गया और ऐसी हालत में सरकार के मुखिया बुरी तरह से असहज व विचलित नजर आये। चूंकि दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का ठेका स्वयंभू तौर पर जिन राजनैतिक शक्तियों और संगठनों के पास है उन्हें अपने मूल जनाधार से ज्यादा चिंता सवर्णों की नजर में पाकसाफ बने रहने की है। इसलिए प्रशासन में पोषित किये जा रहे सामाजिक अन्याय को अनदेखा करना इनकी मजबूरी साबित हो रहा है।

ट्रांसफर-पोस्टिंग में भेदभाव के खिलाफ अंदर भी सुगबुगाहट

यह दूसरी बात है कि भाजपा के ही अंदर योगी सरकार की प्रशासन संबंधी नीति के खिलाफ सुगबुगाहट है क्योंकि पार्टी के कुछ बडे थिंक टैंक इस नीति के कारण दूरगामी तौर पर बड़ी राजनैतिक क्षति की आशंका से पीडि़त हैं। उनसे मिले फीडबैक को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी गंभीरता से संज्ञान में लिया है। जिसके बाद महत्वपूर्ण पदों पर दलित पिछड़ो और अल्पसंख्यक अधिकारियों का प्रतिनिधित्व थोड़ा बढ़ा दिया गया है। लेकिन अभी भी यह संतुलन के सिद्धांत से बहुत दूर है।

डुबो रहा है सवर्णों की क्षमताओं पर अंधविश्वास

योग्यता और क्षमता को जाति से जोड़कर देखने के दूषित दृष्टिकोण के कारण जगह-जगह सवर्ण अधिकारियों को थोपने का राज्य सरकार का रवैया ज्यादातर मामलों में उनके विफल साबित होने से भारी पड़ रहा है। पर असफल सवर्ण अधिकारी लापरवाही या भ्रष्टाचार के कारण हटाये भी जाते हैं तो कुछ दिनों के लिए इसके बाद हाशिये से वे फिर और ज्यादा आकर्षक पद पाकर मेनस्ट्रीम में आ जाते हैं। दूसरी ओर वंचित तबके के तमाम अफसर ऐसे हैं जिन्हें न तो मायावती के जमाने में बेहतर पोस्टिंग मिली थी और न अखिलेश के जमाने में लेकिन निष्पक्ष और साफ-सुथरे रिकार्ड के बावजूद उन्हें संदिग्ध मानकर महत्वपूर्ण पोस्टिंग नही दी जा रही है।

कांप्लेक्स से नही उबर पा रहा संघ

इसके साथ-साथ कुछ और समस्यायें भी सामने आ रही हैं। जहां वंचित तबके के दबंग और फैसला लेने वाले अधिकारी तैनात हैं वहां उनके खिलाफ कांप्लेक्स के शिकार परंपरावादी भाजपा नेता मोर्चा खोल रहे हैं। संघ ने कुछ हद तक सामाजिक समरसता के लिए ईमानदार प्रयास किये हैं लेकिन संघ के प्रयास की सीमाएं तय हैं। इसके चलते हाशिये के तबकों से आने वाले नेताओं, अधिकारियों में शासन, प्रशासन कायम रखने का गुण हजम करना उसे मुश्किल होता है। इस विरोधाभास की जद्दोजहद भी इसकी एक वजह है।

आयोग ने आंकड़े तलब कर मचाई खलबली

इसी बीच मायावती सरकार द्वारा थानेदारों की तैनाती में जातिवाद प्रतिनिधित्व के लिए जारी किये गये शासनादेश के हवाले से उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति आयोग ने वर्तमान प्रदेश सरकार को आइना दिखा दिया है। आयोग ने जब इसके संबंध में जिलावार आंकड़े तलब किये तो खलबली मच गई। कई जिलों में तो अनुसूचित जाति के थानेदारों की संख्या निर्धारित अनुपात से बहुत ही कम है। इसके बावजूद सवर्ण पुलिस प्रमुख इस कोटे को पूरा करने के लिए इच्छुक नही हैं। लेकिन अब जब इस वजह से उन्हें आयोग का कोपभाजन बनने की नौबत नजर आने लगी है तो ये कप्तान आयोग को जानकारी भेजने के पहले जल्दी-जल्दी इस कोटे की पूर्ति करने में लग गये हैं।

महानगरों में है सबसे ज्यादा खेल

सबसे दयनीय स्थिति महानगरों में है। महत्वपूर्ण पदों पर सवर्ण एकाधिकार के कारण प्रशासन और पुलिस में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है भले ही सरकार इसे स्वीकार न करे। गांधी जयंती पर उत्तर प्रदेश विधान मंडल के 36 घंटे अनवरत चले द्विदिवसीय विशेष सत्र में विपक्ष के कुछ सदस्य अपनी पार्टी के बहिष्कार के फैसले को ठुकराकर सदन में पहुंचे और उन्होंने सरकार का यशोगान किया। लेकिन इन सदस्यों ने भी सरकार का ध्यान प्रदेश में नौकरशाही और पुलिस के बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर आकृष्ट कराया। कम से कम मुख्यमंत्री को अपने इन शुभचिंतकों के उलाहने का तो विश्वास करना ही चाहिए।

महानगरों में कई थानों में करोड़ो रुपये की कमाई का स्कोप है। इसलिए महानगरों के हर थाने में अघोषित रूप से सवर्ण थानेदारों का आरक्षण नजर आता है। आयोग की टेढ़ी नजर के बावजूद भी महानगर वाले जिलों में इसी कारण अनुसूचित जाति जनजाति के कोटे का पालन करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। सवाल यह है कि थानेदारो के बाद क्या आयोग डीएम और एसपी के स्तर पर भी अनुसूचित जाति के अधिकारियों के प्रतिनिधित्व को ठीक करने पर ध्यान देगा।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

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