नेपाल: निकाय चुनाव परिणाम के बाद बदलेंगे राजनीतिक समीकरण

यशोदा श्रीवास्तव

नेपाल में जो गांव पालिका से लगायत नगरपालिका व मेयर के चुनाव हो रहे हैं, दरअसल यह आम चुनाव का लिटमस टेस्ट है। संपूर्ण नेपाल में इन पदों का परिणाम इस बात का संकेत होगा कि सात आठ महीने बाद नेपाल में होने वाले संसद व विधानसभा चुनाव में किस पार्टी का पलड़ा भारी होगा अथवा केंद्र और प्रदेशों में किसकी सत्ता आनी है।

 

लेकिन मौजूदा सरकार के समर्थक दलों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से यह आकलन थोड़ा मुश्किल होगा। पूर्व पीएम ओली की एमाले कम्युनिस्ट पार्टी इस चुनाव के बहाने अकेले दम पर पूरे नेपाल में कहां खड़ी है,यह देखना दिलचस्प होगा। नेपाली राजनीति के जानकार कहते हैं कि ओली की स्थिति बेहतर हुई तो आम चुनाव तक नए गठबंधन की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

6 नगर निगम सहित गांव पालिका , नगरपालिका के लिए कुल 753 पदों के लिए यह चुनाव हो रहा है, इसमें 490 गांव पालिका है। गांव पालिकाओं की संख्या सबसे अधिक है जबकि नगर निगम की संख्या सबसे कम है।

केंद्र की सत्ता का भविष्य गांव पालिका के चुनाव परिणाम तय करेंगे जहां विभिन्न दलों के प्रत्याशियों की भीड़ से सबकुछ गड्ड-मड्ड दिख रहा है क्योंकि यहां सत्ता रूढ़ दल भी अपने समर्थक दलों का सामंजस्य बिठाने में कामयाब नहीं हो सका।

मसलन नेपाली कांग्रेस की देउबा सरकार प्रचंड और माधव नेपाल गुट के कम्युनिस्ट पार्टी सहित पांच दलों के समर्थन से सत्ता सीन है लेकिन गांव पालिका और अधिकांश नगर पालिकाओं में सभी दलों के उम्मीदवार मैदान में हैं। केवल 6 नगर निगमों में ही सहयोगी दल समझौते के तहत चुनाव लड़ रहे हैं।

इस चुनाव में अभी केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली एमाले का किसी दल से गठबंधन नहीं है और वह गांव पालिका समेत नगरनिगम तक का चुनाव अकेले दम पर लड़ रही है। कहीं कहीं नितांत क्षेत्रीय दलों से समझौता है जिसका बहुत मतलब नहीं है। गांव से लेकर राजधानी काठमांडू तक इस चुनाव का प्रचार केंद्र और प्रदेश के चुनाव की तरह दिख रहा है।

सारी पार्टियों के बड़े नेता अपने अपने उम्मीदवारों के पक्ष में जी जान से जुटे हुए हैं। राजधानी काठमांडू में इन दिनों बड़े नेताओं की उपस्थिति न के बराबर है। राजधानी और आसपास के 6 नगर निगमों के चुनाव में तो सत्ता धारी दल की एक जुटता जरूर दिख रही है वहीं नगरपालिका और गांव पालिका के चुनाव में सत्तारूढ़ दल के सभी सहयोगी दल अपनी डफली अपना राग अलापते हुए देखे जा सकते हैं।

जहां तक उम्मीदवार चयन की बात है तो सभी दलों ने जातिय अंकगड़ित का पूरा ख्याल रखा है। महिला उम्मीदवारों के मामले में नेपाल कुछ ज्यादा सजग है। यहां इनका आरक्षण जाति वार है और सभी दलों ने इसके चयन में रुचि दिखाई है।

मजेदार बात यह है कि अभी हाल ही नेपाल के पीएम देउबा और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की वाराणसी में मुलाकात के बाद नेपाल के हिंदू राष्ट्र की चर्चा खूब जोर पकड़ी थी।

भारत सीमा से सटे नेपाल के गांव पालिका व नगरपालिका के चुनाव में इसका असर यह है कि नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार बिल्कुल हिंदुत्व की तर्ज पर चुनाव लड़ रहे हैं। तमाम जगह तो जय श्रीराम और बुलडोजर बाबा की जयकारा तक लग रहे हैं।

देखना यह होगा कि हिंदुत्व के नाम पर चुनाव लड़ रहे कितने उम्मीदवार चुनाव जीत पा रहे हैं। भारत के यूपी सीमा से सटे नेपाल का एक नगरपालिका है कृष्णानगर! यहां नेपाली कांग्रेस और एमाले दोनों ने ही एक ही परिवार से अपने उम्मीदवार उतारे हैं जिनका यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से गहरे ताल्लुकात हैं।

यहां एमाले और नेपाली कांग्रेस उम्मीदवार में हिंदुत्व के नारे पर अधिक से अधिक हिन्दू वोट हासिल कर लेने की होड़ है। यूपी और बिहार सीमा से सटे नेपाल के ढेर सारे गांव पालिका और नगर पालिका के चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण की होड़ देखी जा रही है।

चुनाव 13 मई को है और परिणाम दो तीन रोज बाद आ पाएंगे। इस बार सत्ता को आतुर उन पार्टियों को निराशा हो सकती है जिन्हें इस चुनाव परिणाम से केंद्रीय या प्रदेशों की सत्ता की राह दिखती है लेकिन एक बात सच है वो ये कि चाहे प्रचंड की कम्युनिस्ट हो या ओली की,भारतीय प्रभाव वाले नेपाली भू-भाग के मधेश क्षेत्र में इनका प्रभाव बढ़ना तय है जो भारत के लिए चिंता का सबब हो सकता है।

नेपाल की राजनीति में ओली सरकार बदलने के बाद भी सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा। पांच दलों के समर्थन से सत्ता में आई नेपाली कांग्रेस के लिए सहयोगी दलों को साधना मुश्किल हो रहा है। पीएम शेर बहादुर देउबा के समक्ष असमंजस यह है कि वे अपनी सरकार का असल खेवनहार किसे मानें? प्रचंड को या माधव कुमार नेपाल को?

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जनता समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता उपेंद्र यादव भी पीएम देउबा से बराबर की तरजीह चाहते हैं। नेपाल की पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी टूट गई है।वह कम्युनिस्ट पार्टी जिसे स्व.मनमोहन आधिकरी सरीखे नेताओं ने ऐसे समय आबाद कर रखा था जब दुनिया के कम्युनिस्ट देशों में कम्युनिस्ट कमजोर पड़ रहा था।

यूएमएल कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर पूर्व पीएम माधव कुमार नेपाल ने यूएमएल समाजवादी कम्युनिस्ट के नाम से नई कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कर लिया है। पूर्व पीएम ओली यूएमएल के अध्यक्ष हैं ही। नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी का पहले ही दो गुट था। माओवादी सेंटर और यूएमएल। अब तीन हो गई। कम्युनिस्ट पार्टी का एक क्षेत्रीय गुट भी है जिसे विप्लव गुट के नाम से जाना जाता है। खंड खंड हो चुकी सभी कम्युनिस्ट पार्टियां निकाय चुनाव लड़ रही हैं।

टूट तो मधेसी दलों में भी हुई है। मधेशी दल नेपाल की राजनीति में दिग्भ्रमित दल के रूप में देखे जाने लगे हैं। महंत ठाकुर और उपेंद्र यादव अब अलग अलग हैं। इधर मधेश क्षेत्र के एक अन्य बड़े नेता हृदयेश त्रिपाठी ने भी एक और मधेशी दल का गठन कर लिया है। इनका दल भी निकाय चुनाव लड़ रहा है।

मधेस क्षेत्र में जहां इनका जनाधार हुआ करता था,ये वहां बहुत कमजोर हो चुके हैं। मेधेसी दल को संजीवनी की दरकार है जो किसी वसूल वाले नेता के नेतृत्व के बिना संभव नहीं है।

मधेसी दल को पूर्व पीएम डा.बाबू राम भट्टाराई जैसे वसूल वाले नेता के नेतृत्व की जरूरत है,जो अभी उपेंद्र यादव के जनता समाज पार्टी के साथ हैं लेकिन उनकी कोशिश अलग-अलग गुटों में भटक रहे महंत ठाकुर,राजेंद्र महतो, हृदयेश त्रिपाठी जैसे मधेसी नेताओं को एक मंच पर लाने की है।

मुमकिन है निकाय चुनाव परिणाम के बाद डा.भट्टाराई की यह कोशिश रंग लाए। निकाय चुनाव का यह परिणाम मधेशी दल समेत कुछ बड़े दलों की आंख की पट्टी खोलने वाला होगा। घोर निराशा टुकड़ों टुकड़ों में बंटे मधेशी दलों को होने जा रही है।

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