Tuesday - 11 August 2020 - 9:53 PM

दर्द भी होता रहे, होती रहे फरियाद भी… मर्ज भी कायम रहे, जिंदा रहे बीमार भी

रजनीश पांडेय

स्वास्थ्य कारण से 5 अगस्त को होने वाले ऐतिहासिक पल का गवाह नही बन पाऊंगा। लेकिन अपनी पत्रकारिता की अल्प आयु में मुझे अयोध्या जाने का बार- बार मौका मिला। एक बात जरूर है, जितने बार गया उतना ही अयोध्या के बारे में ज्ञान का विस्तार हुआ… चाहे वो योगी सरकार द्वारा हर साल मनाये जाने वाला दीपोत्सव का कार्यक्रम हो या श्री श्री रविशंकर द्वारा नवम्बर 2017 में इस पेचीदा मामले को हल कराने के उद्देश्य से अयोध्या आना हो….या नवम्बर 2018 में मंदिर बनाने के लिए विहीप की सभा हो या इस माह में शिव सैनिको का मंदिर के लिए सभा हो।

इस पल का मैं खुद गवाह रहा… और देशवासियों को पल- पल की खबर बता रहा था कि उनके अयोध्या में क्या हो रहा है? एक बार जरूर लगा की जिस प्रकार अयोध्या की छवि हिन्दू- मुसलमान के विवाद को लेकर बनाया गया है, उससे इतर है अयोध्या का स्वरूप… हां एक बात है अयोध्या हमेशा से राजनैतिक दलों के लिए एक लहलहाती फसल रही है…और उस फसल को अपने हिसाब से सारे राजनैतिक दलों ने कटाई की।

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हमारी मुलाकात वहां के साधु- संतों से लेकर मुस्लिम समाज के लोगों से भी होती थी… उस गांव में भी जाना हुआ, जहां फूल की खेती मुस्लिम समुदाय के लोग करते थे… और उन फूलों से मंदिर का श्रृंगार होता है… ऐसे ही मुसलमान जिनका फूलों के माला बनाने का कारोबार है असरफ से बात हुई …उनका साफ कहना था कि जब हम फूल की माला बनाते है तब यह नही सोचते कि यह माला मंदिर पर चढ़ेगा या मजार पर… अगर आप कभी अयोध्या गए होंगे तो जरूर देखे होंगे की मंदिरों के सामने दाढ़ी बढ़ाये मुसलमानों की दुकान है जिस पर पटरंगा से लेकर कंठी माला और खड़ाऊ मिलता है…

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खरीदार हिन्दू यह जानने में दिलचस्पी नहीं रखता है की जिस दुकान से खरीदारी कर रहे है… वह दुकान मुसलमान की है… वहां एकता और सौहार्द है… वहां के स्थानीय लोगों का कोई लेना देना नही है की वो अयोध्या में है या फैजाबाद में है…वहां के लोग सकून और शांति चाहते है…उन लोगो का आरोप है कि यहाँ की शांति में बाहरी लोग खलल डालते है….

हमारी उन हिन्दू- मुस्लिम परिवारों से भी बात हुई जो 5- 6 दिसंबर 1992 की रात को याद कर सिहर जाते है….कैसे उनके घरों के सामने से बाहरी उन्मादी लोगो की भीड़ नारे लगाते हुए जा रहे थी…

एक बात जरूर है राम के मंदिर बन जाने के बाद सियासी पार्टियों के लाहलाती फसल खत्म हो जायेगी… लेकिन ऐसा नही यहां ना सही वहां सही के तर्ज पर ये सियासी पार्टियां दूसरे जगह लाहलाती फसल की खेती करने की कोशिश जरूर करेंगे… क्योंकि ये कभी नही चाहेंगे इसका मर्ज परमानेंट हो….बीमार को बीमार रखना इनकी मंशा है….दर्द भी होता रहे, होती रहे फरियाद भी।
मर्ज भी कायम रहे, जिंदा रहे बीमार भी।।

(लेखक पत्रकार है)

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