Wednesday - 3 June 2020 - 10:03 PM

आदमी अपने हर सही-ग़लत के पक्ष में दार्शनिक तर्क गढ़ लेता है : संजीव पालीवाल

संजीव पालीवाल

ऐसा बहुत कम देखा गया है कि किसी राइटर की पहली ही रचना धूम मचा दे, इतनी चर्चा बटोरे कि यक़ीन करना मुश्किल हो कि राइटर ने इससे पहले, पढ़ा तो ख़ूब पर लिखने के नाम पर उसके ख़ाते में कुछ ख़ास दर्ज़ नहीं। वरिष्ठ टीवी पत्रकार संजीव पालीवाल की नैना : एक मशहूर न्यूज़ एंकर की हत्या हाल में आया एक ऐसा ही उपन्यास है।

 उपन्यास का दावा तो क्राइम फ़िक्शन का है, लेकिन जिन्होने पढ़ा उन्हें ये अपराध कथा से आगे की चीज़ लगा। संजीव टीवी जर्नलिज़्म में ढ़ाई दशक पूरे कर चुके हैं, और फिलहाल इण्डिया टुडे के चैनल “आजतक” से जुड़े हैं । नॉवल की आधार भूमि भी न्यूज़ चैनल है, मगर कहानी न्यूज़रूम का दायरा तोड़ कर कब बाहर आ जाती है पता ही नहीं चलता। मूलत: यूपी के बरेली से दिल्ली आए संजीव की पृष्ठभूमि एक `मिडिल क्लास हिंदी भाषी परिवार की है। इस उपन्यास में वो हर गैप को एड्रेस करते हैं चाहे वो क्लास का हो, शहरों का हो या फिर हिन्दी भाषा के समाज का। उनका मानना है कि हिन्दी फिक्शन का कमर्शियल फ्यूचर है। जुबिली पोस्ट के लिए संजीव पालीवाल से सवाल किए जुबिली पोस्ट की डेप्युटी न्यूज एडिटर  प्रीति सिंह ने।

 

प्रीति :संजीव, नैना आपका पहला ही नॉवल है, लेकिन कलम की धार देखकर तो लगता है कि ‘फिक्शन’ पर आपका हाथ बहुत साफ़ है। पहले भी कहानियां वग़ैरह लिखते रहे हैं क्या ?

संजीव : जी बहुत शुक्रिया ! आप यक़ीन करें या न करें लेकिन लिखना, या राइटर बनना तो मेरे मेंटल फ्रेम में कहीं था ही नहीं। हां पत्रकार होने के नाते जितना लिखना होता है वो लिखता रहा। मगर कहानी की बात तो कभी सोची भी नहीं। हां मीडिया में रहते हुए कहानियों से वास्ता ज़रूर पड़ता रहा, इस वजह से कुछ कहानियां दिमाग़ में ज़रूर चलती रहीं हैं। मगर लिखूंगा ऐसा कभी सोचा नहीं था।

इससे पहले ज़रूर मेरी एक कहानी हंस के मीडिया विशेषांक में छपी थी। उसका श्रेय मेरे मित्र और वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम को जाता है। अजीत ने हिंदी मीडिया के चर्चित चेहरों से कहानियां लिखवाकर हंस का वो विशेषांक निकाला था। उनकी ज़िद पर मैने भी अपना योगदान दिया था। मगर वो बस वहीं तक सीमित था। इसके अलावा कभी कोई ‘फ़िक्शन’ नहीं लिखा ।

जहां तक कलम की धार का सवाल है तो ये आपका बड़प्पन है। पढ़ने वालों का प्यार है, उन्हें मेरे लेखन में परिपक्वता दिख रही है। इससे बड़ी हौसला अफ़जाई क्या हो सकती है। इसकी एक वजह टीवी में लम्बे समय तक मेरा काम करना भी हो सकता है, यहां कोई ‘न्यूज स्कूप’ भी सपाट खबर नहीं होती। एक स्टोरी से ही शुरुआत होती है। दरअसल टीवी न्यूज का एक ‘कॉम्पीटीशन’ तो ‘एंटरटेनमेंट चैनलों’ से भी है न !

प्रीति : आप जिस प्रोफेशन में हैं उसे ही अपने नॉवल का आधार बनाया, ये केवल अपनी बात रखने के लिए एक ढांचा था या मक़सद चैनलों के ‘ग्रे एरिया’ से वाक़िफ भी कराना था ?

संजीव : मेरे पास एक कहानी थी। मैं सिर्फ उस कहानी को कह रहा था। इस कहानी को कहने के लिए एक ढांचा तो चाहिए था। अब जिस दुनिया से मेरा रोज़ का वास्ता है, उससे बेहतर ढांचा कहां मिलता। ये दुनिया मेरी रोज़ की देखी हुई है। इसी में जी रहा हूं। फिर क़िरदार बनते चले गए और मैं अपनी कहानी कह गया। मोड़ आते गये। मैं उसके साथ-साथ बहता गया। मगर आप ग़ौर से देखें तो ये कहानी सिर्फ टीवी न्यूज इंटस्ट्री की नहीं है। आज के दौर में इंसानी और इंसानी ‘इमोशंस’ के जद्दोजहद की है। जहां तक ‘ग्रे’ का सवाल है तो ज़िंदगी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ हो ही नहीं सकती, वर्ना बहुत नीरस होगी। हर इंसान में कुछ ‘ग्रे’ है जो आसानी से दिखता नहीं, समझ में नहीं आता। ये ‘ग्रे’ ही है जो उत्सुकता जगाता है तो कहानियों में रस आता है। यूं भी ‘क्राईम’ होगा तो ‘ग्रे’ तो होगा ही। मूल मकसद मनोरंजन है कुछ उजागर करना नहीं। कहानी के लिये जितने मसाले चाहिये सब इसमें हैं। उपन्यास पाठक को बांधे रखने के लिये है। उसे कुछ और मिल जाता है तो ये एक उपलब्धि है।


प्रीति : बात आपकी हिरोइन नैना की, जो एक ही वक्त में एक साथ कई मर्दों से रिलेशन में है। 2-टाइमिंग नहीं बल्कि कायदे से कहें तो 4 टाइमिंग- इसके पीछे औरत की उन्मुक्तता है, आज़ादी का कोई कॉन्सेप्ट है, या जस्ट थ्रिल ?

संजीव : दरअसल, नैना को समझने के लिये हमें अपने आज के समाज को समझना पड़ेगा। क्या आज हमारे समाज में नैना जैसी लड़कियां नहीं हैं। क्या नैना ने कुछ बहुत गलत किया ? क्या उसकी ज़िंदगी में जो लोग थे उनका कोई कुसूर नहीं है। उपन्यास में अगर हम मर्दों की हरक़तों को नज़रअंदाज़ करके औरत को निशाने पर रखेंगे तो जानिये की निजी ज़िंदगी में हम क्या करते होंगे ! मेरी नज़र में नैना अपनी मर्ज़ी की मालकिन है। आत्मनिर्भर है। इंडस्ट्री में मेहनत से जगह बनायी है, तो इसका ‘ओवर कॉन्फिडेंस’ भी है। इस दौर में जगह बनाने के लिए बहुत सी `मैनूवरिंग’ भी करनी पड़ती है तो वो भी कर रही है। अब आप इसे उनमुक्तता कहें या कुछ और, मगर थ्रिल के लिए गढ़ा गया हो ऐसा नहीं है। हां, नैना हमारे समाज की आज के दौर की कॉन्फिडेंट महिलाओं की नुमाइंदगी ज़रूर करती है।

प्रीति : राजा राघवेन्द्र प्रताप सिंह से होने वाली नैना की बातों में बड़ी गहराई है…ये दोनों क़िरदार…या इनके बीच जो घट रहा है वो सच के कितना क़रीब है ?

संजीव :  है तो पूरी तरह कल्पना ही, मगर नहीं भी ! कल्पना इसलिए कि इस बातचीत में कई बातें ऐसी हैं जो अलग-अलग वक्त में अलग-अलग तरीके से मेरे  सामने आयीं, मैने उन्हें अपनी कल्पना से जोड़कर एक जगह इकट्ठा कर दिया है। मगर उससे अहम बात ये कि इंसान दरअसल बड़ा ईमानदार प्राणी है, ईश्वर ने उसे तेज़ दिमाग दिया है तो तर्क गढ़ने की क्षमता भी। लिहाज़ा इंसान सही करे या गलत उसके पक्ष में दार्शनिक तर्क गढ़ लेता है और अपनी आत्मा के आगे ईमानदार बना रहता है। राजा साहब में नैना एक ‘माचो मैन’ तलाश तो लेती है, लेकिन शायद जानती है कि इसके आगे राजा साहब भी महज एक मर्द साबित होंगे। इस लक्ष्मण रेखा को बनाए रखने के लिए वो तमाम तर्क गढ़ती है, और खुद को जायज़ ठहराने के लिए भी। हो सकता है ये तर्क बहुत से पाठकों को वाजिब लग रहे हों, उनके अपने तर्कों को इनसे मदद मिल रही हो, इसलिए भी इस बातचीत में बहुतों को गहराई दिखी है।

प्रीति : आज हिन्दी में ‘नैना’ जैसी रचनाओं का ‘कमर्शियल फ़्यूचर’ देखते हैं क्या…और अगला नॉवल कब आ रहा है ?  

संजीव : मैने काफी लंबा अरसा इस कहानी को मन में पकाने के बाद उपन्यास लिखा। अपने आलस को छुपाने के लिये भी मैं ये कह रहा हूँ। फिर बीच में कुछ वक़्त भी मिल गया जब मैं इस पर गंभीरता से सोच पाया। जहां तक कमर्शियलफ़्यूचर का सवाल है तो हिन्दी में एक ठीक-ठाक पाठक वर्ग इधर विकसित हुआ है जो भाषा को लेकर सचेत भी है और संवेदनशील भी। मैंने तो पूरी तरह ‘बाज़ार’ को ध्यान में रखते हुए ही ये उपन्यास लिखा, मगर इसे ‘बाज़ारू’ नहीं बनाया। ना तो इसमें आपको गालियां मिलेंगी ना बेवजह का सेक्स। भाषा की मर्यादा का मैंने ख़्याल रखा है। मेरे दोस्त मुझसे ख़फा होते हैं कि मैं इसे क्राईम फिक्शन क्यूं कहता हूं। उनका कहना है कि ये कहकर आप इसका दर्ज़ा गिराते हो। मेरा मानना है कि मेरी रचना मैं उन लोगों को पढ़ाना चाहता हूं जो साहित्य की गंभीरता से घबराते हैं। मैं अपने उपन्यासों के लिये एक नया पाठक वर्ग भी चाहता हूं। शायद मैं इसमे कामयाब भी हो रहा हूं। कम से कम 10 लोग मुझे मेल कर चुके हैं, जिन्होंने कहा कि उन्होने पहली बार हिन्दी में इस तरह की किताब पढ़ी। वो एक बार में बैठ कर पूरा नॉवल पढ़ गये। तो यही नैना की क़ामयाबी है।

…. ‘नैना’ ने हौसला बढ़ाया है, मैने बताया है कि कुछ आधे-अधूरे उपन्यास मेरे शेल्फ में पड़े हैं। लिखना शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि साल के अंत तक अगला नॉवल भी आ जायेगा।

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