Wednesday - 1 April 2020 - 7:53 PM

छोटी सी कथा एक दिन की…. ‘जनता कर्फ़्यू !’

मनीष पांडेय

एक ऐसी जगह का घर, जो अब न गाँव है न शहर! अतीत से दूर है, नए को पाने में डूब-उतरा रहा! दोपहरी में ओठन्गने के समय बगल गाँव से घर मे काम करने आने वाली महिला मुन्नर के माई हरहराते हुए आती है, बम्मई से दमदा के फोन आइल बा केरौना के नाते सब घर में बंद बा, पुलिसवावाले बहुत मारत बाटन।

‘आज हल्ला बाय कि जहाजी से दवाई छिरकल जाई’ नेपथ्य से नजर गड़ाए सोग्गन बोल पड़े, जो अभी ही एक बोझ केराव पटक कर खड़े हो रहे थे।

‘भक सारे बिना मतलब फर्जी बाति फैलावाला’, सोग्गन को टोकते हुए सिद्धू ने बात आगे बढ़ाई, ‘ऐसे हमरे भयवा शेषवा सवेरव हल्ला कइले रहल कि केरमुआ के छांगुर के लड़िकवा दुबई से आइल बाय, रतिया पुलिसिया वाले मारत लै गइन ओके, और हमार लौंडवा सवेरवा ओके टहरत देखलिस है, हम कहली कि ए मर्दे सामी अफ़वाह न फैलावा, ऐसे परधानव (नाम का व्यक्ति) चिल्लात जात रहल कि हरियाना में पूरा स्कुलवा क लैके साफ होई गईन, अब बतावा स्कूल बंद बाय हर जगहे और उ हल्ला कइले बाय झुट्ठे”

“कोरोना (कोविड-19) के वायरस के बढ़ते खौफ़ के बीच सेल्स आइसोलेशन और सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व हर किसी के समझ आ रहा है। कोई सतर्क-सावधान है, तो कोई डरा हुआ है। लेकिन, न केवल भारतीय परंपरा में बल्कि दुनिया भर में एकांत, मौन और उपवास एक आध्यात्मिक साधना का हिस्सा रहा है।

महात्मा गांधी ने तो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी इसके फायदे महसूस किए थे, और आज उसी कड़ी में कोरोना वायरस के फैलाव और उसकी साथ आई अनिश्चितता, भय और घृणा के प्रसार को रोकने के लिए लाया गया ‘जनता कर्फ्यू’ एक प्रभावी कदम होगा। यह संक्रामकता के प्रसार को भी रोकेगा और सोशल डिस्टनसिंग की बनी अपरिहार्यता के बीच सामूहिक दायित्वबोध को भी पैदा करेगा।” फेसबुक पर पोस्ट लिख करके कमरे से बाहर निकले शिक्षक आशीष ने गंभीरता के साथ टिप्पणी किया कि “बस दूसरे लोगों से दूरी बनाए रखा, बाकी अफवाह से बचा।”

इतने में घूमकर फेसबुक चेक किया तो लाइक्स के साथ nice, very nice, correct, great, excellent,
बहुत सुंदर, प्रासंगिक आलेख इत्यादि के बीच व्यास अनुरागी की टिप्पणी थी,
“कि पुरुष बली नहि होत है, कि समय होत बलवान,
कि भिल्लन लूटीं गोपिका, कि वहि अरजुन वहि वान।”

यहाँ औरों के पोस्ट पर भी तलवारें खिंची हुई थी। भक्त और चमचों के बीच खटिया के पावा और गोडा बीच चपें खटमल की स्थिति को कौन देखेगा जिसे दोनों ही की बातें अतिवादी लगती हो।

उधर मां तेज कदमों में बेटे के कमरे जाकर कागज में लपेट कपूर और लौंग पकड़ाती है, “इसे पर्स में रखो, कोरोना से बचाएगा। फलाना, फलाना…डॉट डॉट डॉट डॉट का फोन आया सबके यहाँ सरसो के तेल का दिया जलाया जा रहा। कोई देवी नाराज़ हैं।”

“अरे फ़ोन पर ज्यादा बात न किया करिए, सबलोग आपको पगलवा देंगे, ऐसा कुछ नहीं है, बस साफ सफाई रखना और लोगों को छूने से बचना है” छोटी बहू ने टिप्पणी की।

“अब तुहि हममें सिखाइबू” कहते हुए मां ‘शनि देव’ सीरियल देखने अपने कमरे में चली गई।

उधर फेसबुक पर युद्ध जारी था, व्हाट्सएप अर्जी-फर्जी सूचनाओं के बोझ से कराह रहा था। ट्विटर तो हाई प्रोफाइल लोगों का शिगूफा है। “जनता कर्फ़्यू ऐतिहासिक है! भारत की एकता का नाद है! मोदी थरिया बजवा रहे! दलिद्र बना देंगे! चीन अमेरिका, इटली में वेंटिलेटर और साउथ कोरिया बिना लॉकडाउन किये कोरोना परीक्षण का अनुपात बढ़ा रहा! मोदी इस आपदा को भी इवेंट बना रहे! ये देशद्रोही समझेंगे नहीं, शंख, मजीरा, थाली, चम्मच, घंटी-घंटा से जो नाद पैदा होगा, सब वायरस मर जायेंगे! 14 घंटे का जनता कर्फ़्यू! अमेरिका हैरान है मोदी जी के इस विजन से, बारह घन्टा में ही तो कोरोना का वायरस मर जायेगा! यहां सिर्फ भाषण सुनिये और ताली पीटिये। पैनिक क्रिएट कीजिए। अमेरिका यूरोप में भाषण नहीं अरबों डालर की मदद और सेवाभाव! नोटबन्दी कर लाइन में खड़ा किये, अब थाली बजवा रहे, हाय रे भक्तों! अद्भुत है देश की एकजुटता का प्रदर्शन। 5 मिनट को आने वाली पीढियां याद रखेंगी!” जैसी टिप्पणियां उनके लिए सर दर्द बन रही, जो किसी खेमें में नहीं!

ख़ैर शंख और घंटी की आवाज़ से शाम 4 बजकर 55 मिनट पर ही आशीष की नींद ख़राब होती है, भनभनाते हुए “ये क्या मूर्खता है, उत्साहवर्धन के लिए ताली तक तो बात ठीक थी, अब झाल-मजीरा सब बजेगा!” घर के अक्की, अवनीश, नमन, अमय सब बच्चे व्हाट्सप्प स्टेटस पर बजाने का वीडियो अपलोड करके मौसी, बुआ के बच्चों की थरिया बजाऊं प्रतिभा का अभिमान करते हुए थोड़ा शोरगुल करते हैं, तब तक आस पड़ोस, टीवी, मोबाइल हर जगह वही ध्वनियाँ आती सुनाई देती हैं; सुबह से निश्चिंत चहचहा रही चिड़ियों का भगदड़ आसमान में दिखाई देता है।

डर, बेचैनी और अफ़सोस में रात होती है। लोग तो जो हैं, वो हई हैं, 5 मिनट के अभिमूल्यन को 50 मिनट में बदलकर थाली तोड़ जुलूस निकाल दिया। गांव में तो कुछ को टूटा सूप लेकर दलिद्दर भगाने का अनुभव याद आया, टोटका मानकर खूब कोरोना भगाया। पता चला प्रधान जी सकते में! ‘

‘जनता कर्फ़्यू’ लॉकडाउन में बदलती है…और जारी है….मानव ने तो अपने अस्तित्व के साथ ही प्रकृति को हर क्षण नियंत्रित करने की ही कोसिस की है, लेकिन विज्ञान और तकनीकी ने इसकी अति कर दी। फिर भी विडंबना देखिए प्रकृति की थोड़ी नाराज़गी भी मानव जगत को बेबस कर सकती है…. हम इसे समझने की स्थिति में हैं भी या नहीं!

इस बीच वरिष्ठ पत्रकार सिन्हा जी के व्हाट्सएप प्रोफाइल पर नज़र जाती है…

“धूप और छाँव की पतली लकीर पर खड़ा हूँ,
दोनों पार यादें हैं सपने हैं उम्मीदें हैं
और है बहता हुआ वक्त भी…”

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