सफ़र में फंसा हुआ घर जाने को बेकरार हूँ

डॉ. अभिनन्दन सिंह

मैं अपने मालिकों की संवेदना का टूटा हुआ तार हूँ।
मैं शहर और सरकारों के सपनों का शिल्पकार हूँ।।
मैं सफ़र में फंसा हुआ घर जाने को बेकरार हूँ।
मैं भी बचाना चाहता हूँ अपने बच्चों का लाचार जीवन।
हाँ, साहब मैं ही मजदूर हूँ और गाँव का गंवार हूँ।।

सरकार माफ़ करना मुझे, पूछता मैं भी एक सवाल हूँ।
क्या वाकई इस सारी समस्या का मैं अकेला ही जिम्मेदार हूँ।।
मैंने खाई हमेशा मार दुनिया की, मैं आज भी मार खाने को तैयार हूँ।
मैं हमेशा रहा हूँ अछूत, मैं आज भी अछूत और लाचार हूँ।।
हाँ, साहब मैं ही मजदूर और गाँव का गंवार हूँ।

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