Mother’s day : अगर वास्तव में माँ बनना आसान होता

जूही श्रीवास्तव

अगर वास्तव में मां बनना आसान होता
तो भगवान ये वरदान हर एक को देता
मां होने को केवल शरीर ही नहीं
मन भी कोमल चाहिए होता

काश मुमकिन होता सभी का जिम्मेदारी निभा पाना
बिना सोये ही सारी रात बिता पाना
वो पांच महीने बिना खाये पिये रहना
उल्टियां करते करते हर दर्द सहन करना

आसान नहीं तानों को सुनते सुनते आगे बढ़ना
कभी ब्रैस्ट फीडिंग तो कभी लड़की पैदा करने पर बातें सुनना
वो पूरे नौ महीने दर्द सहना
एक ही करवट में बिस्तर पर पड़े रहना

दवाइयों के हैवी डोज़ और गर्मी को सहन करना
दर्द होने पर भी मुस्कुराना कभी मूड स्विंग तो कभी
अपने महँगे कपड़ों में फिट ना हो पाना
स्ट्रेच मार्क्स के साथ सारी जिंदगी बिता पाना

काश मुमकिन होता तुम्हारा ये समझ पाना कि
समय अब बदल चुका है तुम्हारी माँ ने जो किया
अब मैं नहीं करूंगी
अपने बच्चे की परवरिश अपने मुताबिक करूँगी

सोचती हूं कभी कह दूं कि थक गई हूं
आज मन नहीं है खाना तुम ही बना दो
लेकिन तब ये सो कॉल्ड जमाना मुझे सिखाएगा
जेंडर डिस्क्रिमिनेशन और मुझे मेरी ड्यूटी याद दिलाएगा

तुम भाग सकते हो अक्सर जिम्मेदारियों से
पर मैं किसके भरोसे बच्चों को छोडूंगी
आज जॉब छोड़ी है कल शौक भी छोडूंगी
कभी मायका तो कभी दोस्ती भी तोड़ूंगी

मैं स्वार्थी होती हूँ अगर खुद के लिये सोचती हूँ
कभी दोस्तों के संग बाहर नहीं जा सकती हूँ
मुझे हक़ नहीं तुम पर उँगली उठाने का
पर तुम्हे जरूर हक़ है मुझपे हाथ उठाने का

तुम चाहो जो भी कर सकते हो
लेकिन मेरे लिए खुद के बारे में सोचना भी गलत है कहते हो
तुम्हे शायद पता नहीं मैंने मां बन कर क्या खोया है
पाया लाख है पर उनका मोल भी चुकाया है

फिर भी आज खुश हूं जो भी हूँ
मैं तुम्हारे भरोसे तो नहीं पर जरूरत मंद जरूर हूँ
मुझे चाहिए तो सिर्फ़ साथ तुम्हारा
कभी मैं रात भर न सोऊ तो सुबह तुम बच्चे सम्भाल लेना

मैं बाथरूम में हूँ तो नाश्ता तुम बना देना
कभी बच्चे की पॉटी साफ़ करना कभी खाना खिला देना
काश कि मेरा मी टाइम तुम्हे भी याद रहे
मुझे मेरी पर्सनल स्पेस तो कभी सुकून की चाय भी पिला देना

गर काम करे कोई मेरे हिस्से का
तो मुझपे एहसान न जताए
मैं मां हूँ मेरी जिम्मेदारी है ये
हर बार इस बात का एहसास न कराये

मैं कमाती हूँ तुम्हारे बराबर इससे तुम्हे डर क्यों है
तुम्हारा मेल ईगो बात बात पर हर्ट क्यों है
मैं सुंदर बन कर रहूँ तो तुम्हे शक होता है
खुद पर ध्यान न दूं तो समाज हँसता है

तुम्हे ये बात फिर भी समझ नहीं आती है
कि सिर्फ औरत ही मां क्यों बन पाती है
क्योंकि वो अपने प्यार से दुनिया को बसाती है
तुम लाख मकान बना लो, घर वो ही बनाती है

माँ सिर्फ कोमल नहीं ओज का भी प्रतीक है
वो सीता मैया जैसी है पर पार्वती का भी रूप है
तुम कुछ भी कहो पर सच यही है
माँ धरती पर भगवान का स्वरूप है ।

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