Thursday - 9 July 2020 - 1:18 PM

कितना कारगर होगा पुलिस कमिश्नर सिस्टम?

राजीव ओझा

खबर आ रही है कि लखनऊ और नोएडा में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होगा। सूत्रों के हवाले से खबर है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फैसले पर अंतिम मोहर लगा दी है। सम्भवतः मंगलवार को कैबिनेट में यह औपचारिक रूप से पास होगा। इसीके चलते अभी तक लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर में एसएसपी की नियुक्ति अभीतक नहीं की गई है।

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के बीच वर्चस्व की जंग में सुशासन का सपना पूरा नही हो पा रहा है। यह लड़ाई कभी पुलिस महकमे के भीतर होती है और कभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों में टकराव शुरू हो जाता। ताजा उदाहरण पुलिस अधिकारियों का आडियो और वीडिओ प्रकरण है। इन सब के मद्दे नजर शासन की मशीनरी को और प्रभावशाली बनाने के लिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने पर मंथन चल रहा है। कमिश्नर सिस्टम के बारे में यूपी के डीजीपी ओपी सिंह भी कह चुके हैं कि कुछ जिलों में कमिश्नरी बनाने की चर्चा शासन स्तर पर चल रही है और मुख्यमंत्री जो फैसला लेंगे उसे लागू किया जायेगा।

पुलिस के अधिकार बढ़ेंगे डीएम के घटेंगे

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और नोएडा जैसे महत्वपूर्ण जिलों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने की बात पहले भी हो चुकी है। अगर ऐसा होता है तो पुलिस अधिकारियों की ताकत बढ़ जाएगी। डीएम का मुख्य काम राजस्व एकत्रित करना ही रह जायेगा। लेकिन फायदा यह होगा कि इससे पुलिस अधिकारियों को हर निर्णय के लिए के लिए डीएम का मुहं नहीं ताकना पड़ेगा। पुलिस शहर में कानून-व्यवस्था को बेहतर ढंग से मेंटेन करेगी। कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के लिए सीधी जवाबदेही पुलिस की होगी।

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अब सवाल उठता है कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम क्या है और इससे क्या फयदा होगा? आपको याद होगा कि वर्ष 2011 में तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर ने थानेदार की पोस्टिंग के लिए डीएम की लिखित अनुमति अनिवार्य होने का आदेश जारी किया था। तब पुलिस अधिकारियों की बैठक में डीएम के लिखित अनुमोदन को लेकर व्यवहारिक दिक्कतों को भी उठाया गया था। कई बार एक सप्ताह तक भी डीएम का अनुमोदन न मिल पाने की वजह से ट्रांसफर लिस्ट जारी करने में दिक्कत आती है।

पहले भी हो चुका है टकराव

आपको याद होगा 7 सितंबर 2017 को कार्यक्रम क्रियान्वयन विभाग के उस शासनादेश के बाद टकराव बढ़ गया था जिसमें निर्देश दिया गया था कि प्रत्येक माह की 7 तारीख को जिलाधिकारी की अध्यक्षता में क्राइम मीटिंग होगी। यह आदेश जारी होते ही आईपीएस असोसिएशन ने इसका विरोध किया था। फिर 9 मई 2018 को तत्कालीन प्रमुख सचिव राजीव कुमार ने एक और फरमान सुना दिया कि जिलों में थानेदार और इंस्पेक्टर की नियुक्ति बिना जिलाधिकारी के लिखित अनुमोदन के नहीं की जा सकेगी। इस संदर्भ में 2001 व 2009 के शासनादेश का हवाला दिया गया था। लेकिन डीएम की बिना इजाजत के थानेदार और कोतवाल की पोस्टिंग करना आईएएस लॉबी अपने अधिकारों का हनन मानती है, तो जिले के आईपीएस कप्तान इस आदेश को बिना वजह पुलिसिंग में अड़ंगा मानते हैं।

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ज्यादातर शहरों की पुलिस प्रणाली पुलिस अधिनियम, 1861 पर आधारित है। भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के भाग 4 के तहत जिलाधिकारी के पास पुलिस पर नियंत्रण के कुछ अधिकार होते हैं। इसके अतिरिक्त, सीआरपीसी, एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को कानून और व्यवस्था को विनियमित करने के लिए कुछ शक्तियाँ प्रदान करता है। मतलब पुलिस अधिकारी कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नही हैं, वे आकस्मिक परिस्थितियों में डीएम या मंडल कमिश्नर या फिर शासन के आदेश तहत ही कार्य करते हैं। लेकिन पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो जाने से ये अधिकार पुलिस अधिकारियों को मिल जाते हैं।

बड़े शहरों में अक्सर अपराध नियंत्रण और बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए पुलिस को तत्काल निर्णय लेना होता है। ऐसे में पुलिस कमिश्नर प्रणाली को अधिक कारगर माना जाता है। कमिश्नर प्रणाली में पुलिस मजिस्ट्रेट की भूमिका भी निभाती है। इस सिस्टम से पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के पास सीआरपीसी के तहत कई अधिकार आ जाते हैं। कमिश्नर सिस्टम लागू होने से पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही भी बढ़ जाती है।

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पुलिस पुलिस कमिश्नर, जिला पुलिस अधीक्षक, पुलिस महानिदेशक को अपने कार्यों की रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह मंत्रालय) को देनी होती है, इसके बाद यह रिपोर्ट मुख्य सचिव को जाती है। आमतौर पर पुलिस आयुक्त पद राज्य सरकार के आधार पर डीआईजी और उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों को दिया जाता है। जिनके अधीन एनी पुलिस अधिकारी इस प्रकार होते हैं-1. पुलिसकमिशनर(सीपी), 2 संयुक्त आयुक्त(जेसीपी), 3. डिप्टीकमिश्नर(डीसीपी), 4.सहायकआयुक्त(एसीपी), 5.इंस्पेक्टर, 6.सब इंस्पेक्टर

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पुलिस आयुक्त शहर में उपलब्ध स्टाफ का उपयोग अपराधों को सुलझाने, कानून और व्यवस्था को बनाये रखने, अपराधियों और असामाजिक लोगों की गिरफ्तारी, ट्रैफिक सुरक्षा आदि के लिये करता है। इसका नेतृत्व डीसीपी और उससे ऊपर के रैंक के वरिष्ठ अधिकारी करते हैं।

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