Saturday - 18 September 2021 - 12:41 PM

डॉक्टरों की कोशिशें और वेंटीलेटर दोनों फेल, नहीं रहे कल्याण सिंह

शबाहत हुसैन विजेता

लखनऊ. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के पूर्व राज्यपाल तथा भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता कल्याण सिंह का लम्बी बीमारी के बाद आज लखनऊ के संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (PGI) में निधन हो गया. चार जुलाई से पीजीआई में भर्ती कल्याण सिंह को इससे पहले जून के महीने में राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था. पीजीआई में विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी देखभाल में जुटी थी लेकिन हालत बिगड़ने पर उन्हें पिछले दिनों वेंटीलेटर पर शिफ्ट किया गया था लेकिन वहां से उनकी वापसी नहीं हो पाई. उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके निधन पर तीन दिन के राजकीय शोक का एलान किया है.

पांच जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अतरौली में पैदा हुए 89 वर्षीय कल्याण सिंह को राजनीति में बाबूजी के नाम से जाना जाता था. कल्याण सिंह हिन्दुत्ववादी छवि के नेता थे लेकिन अपनी शर्टों पर राजनीति करते थे. उन्होंने दो बार भारतीय जनता पार्टी छोड़ी लेकिन उनके क्षेत्र की जनता ने उन्हें जिताकर सदन में भेजा.

कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव को राजनीति का विपरीत ध्रुव माना जाता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद कल्याण सिंह ने न सिर्फ मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा किया बल्कि मुलायम की पार्टी को इतना मज़बूत बनाने की कोशिश में जुट गए कि बीजेपी हार जाए. उन्होंने मुलायम सरकार में अपने बेटे राजवीर सिंह और अपनी करीबी कुसुम राय को मंत्री भी बनवाया.

कल्याण सिंह अतरौली से कई बार विधायक बने. वह दो बार लोकसभा सदस्य भी रहे. कल्याण सिंह पहली बार 1991 में और दूसरी बार 1997 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था. यह अजब इत्तफाक है कि अपनी सरकार में बाबरी मस्जिद को गिरते हुए देखने वाले कल्याण सिंह न तो राम मन्दिर देख पाए और न ही उनकी आँख बंद होने से पहले उनका गृह जनपद अलीगढ़ ही रह गया. दो दिन पहले ही उसका नाम यूपी सरकार ने बदलकर हरीगढ़ कर दिया है.

कल्याण सिंह राजनीति के महारथी माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उन्हें धोखे भी खूब मिले. छह दिसम्बर 92 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद को न बचा पाने की वजह से इस्तीफ़ा दे दिया था लेकिन राज्यपाल ने इस्तीफ़ा अस्वीकार करते हुए उनकी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. राष्ट्रपति सासन लागू होते ही कल्याण सिंह बाबरी विध्वंस के महानायक बन गए. 1993 में चुनाव हुआ तो कल्याण सिंह कासगंज और अतरौली दोनों सीटों से चुनाव जीत गए. चुनाव में बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी लेकिन सरकार मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी. यह सपा-बसपा गठबंधन था. कल्याण नेता विपक्ष बने. इसके बाद 1997 से 99 तक कल्याण सिंह फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

कल्याण सिंह की सरकार में नरेश अग्रवाल ऊर्जा मंत्री थे. नरेश लोकतान्त्रिक कांग्रेस के नेता थे. नरेश अग्रवाल ने जगदम्बिका पाल को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था. राज्यपाल ने शपथ भी दिलवा दी थी. कल्याण हक्का-बक्का थे लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी कल्याण के लिए धरने पर बैठे. कल्याण ने अदालत का रुख किया. अदालती आदेश पर जगदम्बिका पाल और कल्याण सिंह दोनों को सदन में बहुमत साबित करने का आदेश दिया गया. ढाई दिन उत्तर प्रदेश में दो मुख्यमंत्री रहे. नरेश अग्रवाल ने फिर पाला बदला और सदन में कल्याण सिंह की जीत हो गई और जगदम्बिका पाल को कुर्सी छोडनी पड़ी.

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कल्याण सिंह भारतीय जनता पार्टी में तेजतर्रार छवि के नेता थे. कल्याण सिंह का न रहना उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए नहीं बल्कि पूरे देश की भारतीय जनता पार्टी के लिए कभी पूरा न होने वाला नुक्सान है. कल्याण सिंह बुलंदशहर से बीजेपी सांसद रहे हैं जबकि एटा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा गए थे.

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