Monday - 27 January 2020 - 3:48 AM

अपने अपने एजेंडे पर भाजपा और कांग्रेस, वोटर पर निगाहें

उत्कर्ष सिन्हा

कुछ अरसा पहले गुजरात विधानसभा चुनावों से शुरू हुआ सिलसिला 14 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान पर भी जारी रहा । इस दरमियान कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए और देश की संसद का भी चुनाव हुआ, लेकिन कांग्रेस ने अपनी लाइन नहीं बदली है ।

दिल्ली के रामलीला मैदान में भी सोनिया, राहुल और प्रियंका का जोर देश की बदहाल अर्थव्यवस्था, तेजी से होते निजीकरण और बेरोजगारी के मुद्दे पर टिका रहा । प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के हिट नारे “ मोदी है तो मुमकिन है” को कांग्रेस नेताओं ने निशाने पर रखा और “ मोदी है तो एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन का निजीकरण मुमकिन है” , “ मोदी है तो 100 रुपये किलो प्याज मुमकिन है” , ‘‘मोदी हैं तो 15000 किसानों की आत्महत्या मुमकिन है’। …. ‘मोदी हैं तो 4 करोड़ नौकरी नष्ट होना मुमकिन है’ जैसे जुमलों का खूब इस्तेमाल किया गया ।

यानी कांग्रेस भाजपा राज में आर्थिक बदहाली के अपने पुराने एजेंडे को ही धार दे रही है, जिसके जरिए वो आम आदमी को अपना संदेश देना चाहती है ।

दूसरी तरफ प्रचंड बहुमत का भरपूर इस्तेमाल करते हुए अपने एजेंडे पर तो भाजपा भी उतनी ही मजबूती से टिकी हुई है ।

बीते दिनों में केंद्र की भाजपा सरकार ने जो काम मजबूती से किए हैं , वो हैं तीन तलाक बिल , पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक, कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा, और नागरिकता संशोधन बिल ।

ये सारे वो मामले हैं जिससे भाजपा अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देने में लगी हुई है ।

भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि हिन्दुत्व की तेज धार ही वोटों का वो ध्रुवीकरण कराती रहेगी जिसके जरिए भाजपा देश की सत्ता पर काबिज रह सकती है ।इसीलिए भोपाल की संसद प्रज्ञा ठाकुर के बयानों पर नरेंद्र मोदी नाराजगी जताते तो हैं , मगर पार्टी प्रज्ञा को समर्थन बनाए रखती है।

कांग्रेस भाजपा के इस एजेंडे को कमजोर करना तो चाहती है , मगर साथ ही वो खुद पर मुस्लिम तुष्टीकरण का बिल्ला भी अब नहीं चिपकाने देने को तैयार है । इसलिए ऐसे मसलों पर कांग्रेस या तो बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान को आगे रख रही है जैसे नागरिकता बिल के मामले में किया या फिर मानवाधिकारों के सवाल को जैसा उसने कश्मीर के मसले में किया। साथ ही साथ वो मोदी सरकार की सबसे कमजोर कड़ी यानी गिरती हुई अर्थव्यवस्था के जरिए प्रहार करने में नहीं चूकती ।

भाजपा के रणनीतिकार अर्थव्यवस्था की गिरती हालत से फिक्रमंद तो हैं मगर वो इसे अपने सामने बड़ी रुकावट नहीं मान रहे । पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक भाजपा विधायक निश्चिंतता से कहते हैं – “आने वाले दिनों में राम मंदिर का निर्माण शुरू होगा तो जनता एक बार फिर कमल का बटन दबाएगी ही”।

भाजपा के नेता सदन में भी आक्रामक हैं । वे ऐसी किसी बहस में जहां भी गुंजाईश हो , ध्रुवीकरण को धार देने वाले भाषणों से नहीं बचते । दूसरी तरफ कांग्रेस भी आक्रामक होने की कोशिश करती तो जरूर हैं मगर सदन में कमजोर संख्या बल के कारण बहुत कामयाब नहीं हो पाती ।

14 दिसंबर की रामलीला मैदान की रैली भी इसी संकट से पार पाने की एक कोशिश थी । लंबे अरसे बाद कांग्रेस की किसी रैली में बड़ी भीड़ जुटी थी । कांग्रेस नेताओं ने भी ऐसे किसी विवादास्पद मुद्दे को सीधे नहीं छुआ जो ध्रुवीकरण को हवा दे बल्कि उनका सारा जोर बदहाल अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर ही रहा और निशाने पर रहे नरेंद्र मोदी।

महाराष्ट्र विधानसभा में हार और हरियाणा में बमुश्किल जीत के बाद भाजपा के सामने बाद संकट है । अगर झारखंड विधानसभा के नतीजे भी मनमाफिक नहीं आए तो आने वाले दिनों में उसकी राह मुश्किल हो सकती है । इसके बाद दिल्ली, बंगाल, बिहार और फिर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों की बारी है । ऐसे में भाजपा अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को और तेज करना चाहती है ।

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कांग्रेस के सामने भी यही मौके हैं जब वो भाजपा को चुनौती देने की कोशिश में है । ऐसे में वो हर उस मुद्दे को उठा रही है जिसका सरोकार आम आदमी की रोजमर्रा की ज़िंदगी से है । इस जरिए वो खुद को आम भारतीय के साथ खड़ा दिखाने की कोशिश में है ।

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इस सबके बीच है भारतीय वोटर जिसका इतिहास भावुकता में वोट देने का रहा है । अब यह भावुकता धार्मिक आधार पर जोर मारती है या फिर रोजमर्रा की मुश्किलों पर यह देखना अभी बाकी है ।

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