Sunday - 5 July 2020 - 9:28 PM

आकृति विज्ञा की भोजपुरी कविताएं

आकृति विज्ञा “दर्पण” ने छोटी सी उम्र में ही भोजपुरी साहित्य में अपनी पहचान बना ली है । उन्होंने हिंदी, भोजपुरी ,अंग्रेजी के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर काव्यपाठ व मंचसंचालन किया है और विभिन्न समूहों से जुड़कर साहित्यिक नवाचारों पर सतत् अध्ययन व क्षेत्रीय कार्य में लगी हैं ।पूर्वाञ्चल के शहर गोरखपुर में युवाओं के मंच द राइटर्स अड्डा की फाउंडर सदस्य है । जुबिली पोस्ट के पाठकों के लिए उनकी दो भोजपुरी रचनाएं

फागुन

लागेला खेतवा में सोना फरल बा
फगुनवा में सरसो लहके गजब के
खेतिहर कहत हे सरसो बेचाई
घरौती कहेली तेल पेराई
जेके लागे लगन ऊ बुकुआ जोहत हे
फगुनवा……
जोखु कहत हैं अधिया दियाई
मलकिन कहेली घरवे पिटाई
सरसौंटा के आगि मोट रोटी जमत है
फगुनवा में सरसो लहके गजब के
फगुनवा……
बैदा कहेलें लहसुन मंगाईब
सरसों के तेले में ओहके पकाईब
खरी बची त गोरु जेवाईब
खरी भला जोहले न मिलत है
फगुनवा में सरसो लहके गजब के….

कोहबर गीत

कूचेली कईनिया जबरि मोरे फूआ
चऊरो मथेली चटकार हो
तेहि चऊरा मनिक लगत जनि डोलिहें
मंगियों में चढ़ें चटकार हो
कोहबरे लिखें फूआ सुन्नर दुअरिया
दुई नीमि बिरिक्षि बा ठार हो
एक बीरिक्षि पीछवां जे कोहबर कोठरिया
दूजवा के पीछवा ओसारि हो
कोठरी में सुन्नर सुसोभे खीरिकिया
नवा जुगलकरे बिसराम हो
आधि राति पिपसा के मारल एक सुगिया
करेली रूदन सो दुआरि हो
ओहि खिरकी राहें दूलरे पिआवेले पनिया
सुगिया तू लेहु अब जुड़ाई हो
धनि तोहरी फूआ दुलहे सिरिजेली कोहबर
धनि दूलहे हमरो बा भागि हो
कोहबर बगली में ठारि सुनरी कनिया
देखनी बिनु देहे मुंहदेखाई हो
जाव ए जुगल फलि फूले तोर बगिया
कटहर आम फूलाई हो
कूचेली कईनिया जब मोरी फूआ
चऊरो मथेली चटकार हो।

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