Friday - 28 February 2020 - 7:42 AM

देश के लोकतंत्र की बदरंग होती तस्वीर का खुलासा

केपी सिंह

तमाम मुददो पर अतंराष्ट्रीय/राष्ट्रीय रैकिंग में पिछड़ रहे देश को इस मामले में अब एक और झटका लगा है। अर्थ व्यवस्था जैसे गवर्नेंस के बुनियादी क्षेत्र में देश की हालत लगातार पतली होती जा रही है। लेकिन सरकार की सेहत पर कोई असर नही पड़ रहा है।

अब दुनियां के सामने विधिवत भारत के लोकतंत्र की भी ऐसी तस्वीर उजागर हुई है जो प्रतिष्ठा के अनुकूल नही कही जा सकती। यह दूसरी बात है कि सरकार समर्थक भी दम के पक्के हैं। उनका नजरिया इस मामले में मीठी-मीठी गप और कड़वी थू-थू जैसा है।

पेशेवर दृष्टि से बेहतरीन माने जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय मीडिया मंचों पर जब कभी सरकार की आलोचना हुई तब इस हठधर्मिता को देखने का खूब मौका मिला। यहां तक कि रवीश कुमार को मैगसायसाय अवार्ड मिलने पर इसे भी देश विरोधी साजिश के एक नमूने के रूप में करार दे दिया गया था। यह दूसरी बात है कि कोई रेटिंग करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था हो या मीडिया अगर उसमें मोदी और सरकार को बेहतरी का प्रमाण पत्र नजर आया तो फिर धिक्कारी जाने वाली इन्हीं बाहरी शक्तियों में सरकार समर्थकों को देवदूत का अक्स नजर आने लगता है।

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द इकोनोमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट ने 2019 के लिए लोकतंत्र सूचकांक के आधार पर दुनियां के तमाम देशों का दर्जा निर्धारित किया है जिसमें भारत पहले से 10वें स्थान पर नीचे लुढ़क गया है जो एक शर्मनाक स्थिति है। हालांकि यह सूचकांक कुछ ऐसा नही है जिसने किसी अनछुए सत्य का अनावरण कर दिया हो। देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के लिए बढ़ते खतरे का एहसास पहले से ही आमतौर पर किया जा रहा है।

इस मामले में हद यह है कि पेशेवर ईमानदारी के मामले में पूरी दुनियां में पहचान रखने वाले देश के अंग्रेजी अखबार द हिन्दू तक के विज्ञापन प्रतिबंधित करने का दुस्साहस यह सरकार दिखा चुकी है। द हिन्दू पर यह कोड़ा इसलिए फटकारा गया था क्योंकि उसने राफेल सौदे के बारे में सरकार को अप्रिय लगने वाली खबरे छाप दी थीं। यही हिन्दू अखबार सरकार समर्थक ताकतों की आंख का तारा बन गया था जब इसने अपनी संवाददाता चित्रा सिंह को स्वीडन भेजकर बोफोर्स तोप सौदे को लेकर तत्कालीन सरकार की धज्जियां उड़ा दी थी। तब भी खबर रक्षा सौदे की पड़ताल पर आधारित थी। लेकिन आज ऐसी पड़ताल देश द्रोह का पर्याय बना दी गई है। कब तक के लिए- जब तक भाजपा सत्ता में है सिर्फ तब तक के लिए।

 

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तो द इकोनोमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट यानी ईआईयू ने केवल इस तरह की पहले से बन रही धारणा को पुष्ट किया है जिसे सरकार के ढीठ और प्रगल्भ समर्थकों ने बहुत ही धृष्टता के साथ नकारने का अभियान चला रखा है। उन्होंने ज्ञान, शील, एकता के नारे की धज्जियां उड़ाते हुए गालियों के प्रयोग की ऐसी शैली ईजाद की है जिसे आज सराहना मिलने लगी है। हालांकि ईआईयू की रेटिंग सही होने का सबसे बड़ा सबूत लोकतंत्र में जोड़ा गया यही आयाम साबित हो रहा है। नये मोड़ के इस आतंकवाद के कारण किसी की सरकार की समालोचना करने की हिम्मत नही रह गई है।

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हालांकि यह सही है कि एक समय कहा जाने लगा था कि भारत में लोकतंत्र जरूरत से ज्यादा हो गया है। यह स्थिति भी कुछ ठीक नही थी। इससे बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के क्षितिज पर अंदेशे के बादल घने होते जा रहे थे। मोदी सरकार ने इस पर सफलता पूर्वक लगाम लगाई है लेकिन भारत को अतिवादी देश बनाने से प्रतिष्ठा के मामले में देश की उस बहुमूल्य कमाई को क्षति हो रही है जो उसने अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं में उच्च मानदंडों का निर्वाह करके अर्जित की थी।

लखनऊ में सीएए के सर्मथन के लिए आयोजित रैली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की भाषा और टोन का उन्मादी स्तर बताता है कि बावजूद इसके ध्रुवीकरण को उत्तेजना मिलती देख जिम्मेदार मौजूदा स्थिति को लेकर ग्लानि की भावना का शिकार होने की बजाय उत्साहित हो रहें हैं।

ऐसे में किसी भी रेटिंग में भारत की अवनति स्वाभाविक है। इसे पूर्वागृह करार देकर खारिज नही किया जा सकता क्योंकि 167 देशों की इस रैंकिंग में लोकतंत्र के मामले में चीन और पाकिस्तान की स्थिति भारत से बहुत शर्मनाक है। भारत अभी 51वे स्थान पर है जबकि चीन अंतिम पायदान के करीब 153वें और पाकिस्तान 108 वें स्थान पर है। रूस को भी 134वें स्थान पर रखा गया है। लोकतंत्र की सबसे बेहतर स्थिति नार्वे में दर्शाई गई है जो सूची में शीर्ष पर है। जबकि उत्तर कोरिया सबसे निचले पायदान पर है।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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