Wednesday - 17 August 2022 - 10:24 PM

अखिलेश यादव : मछली का बच्चा समुंद्री तूफानों से लड़ना सीख गया

नवेद शिकोह 

एक कहावत है- मछली के बच्चे को कोई तैरना नहीं सिखाता, वो पैदाइशी तैराक होता है। धीरे-धीरे पानी की गहराई के ख़तरों और तूफानों से लड़ने की जांबाज़ी भी सीख लेता है। कब मुखर हों और कब निष्क्रिय, किस वक्त दुश्मन के जाल से सावधान रहना है और कौन से मूहर्त में शत्रु पर आक्रामक हों। कैसे अपना समूह बनाना है और कैसे विरोधी की यूनिटी को छोड़कर उसकी ताकत को कमजोर करना है।

ऐसे कौशल में कुछ ख़ून का असर होता है, कुछ अनुभव और संघर्ष काम आता है, कुछ विरासत की दौलत का जादू चलता है। इसके साथ ही धैर्य, मेहनत और संघर्ष की ताकत विशालकाय प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले का हौसला देती है।

ज़रुरी नहीं कि पहाड़ से टकराने वाला ख़ुद चकनाचूर हो जाए। प्रवाह, चुस्ती-फुर्ती, धार, दिशा, हौसला, एकाग्रता और सधी हुई रणनीति से पहाड़ भी दरक जाते हैं। हाथी से बहुत छोटा होता है चीता, लेकिन वो अपनी चुस्ती-फुर्ती, हिम्मत-हौसलों से हाथी को चुनौती दे देता है।


उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसी लोकप्रिय और ताकतवर राजनीति हस्तियों वाली भाजपा पहाड़ जैसी है।

यूपी विधानसभा चुनावी रण में भाजपा को पसीना छुड़ाने वाले अखिलेश यादव की राजनीतिक दक्षता और परिपक्वता आजकल चर्चाओं में हैं। समाजवादी विचारधारा के लोग कहने लगे हैं कि अखिलेश में मुलायम की क्षमताएं और दक्षताएं झलकने लगी हैं।

क़रीब तीन दशक पहले देश में कांग्रेस की विशालकाय सियासी ताकत और हुकुमतों के होते यूपी में एकक्षत्र राज करने वाली कांग्रेस को मुलायम सिंह यादव ने हाशिए पर लाकर साबित किया था कि रणनीति सधी हुई हो तो एक सिपाही विशाल सेना पर भारी पड़ सकता है।

इधर तीस वर्षों में लखनऊ में गोमती का बहुत बह चुका है। जिस तरह कभी यूपी में कांग्रेस अजेय लगती थी आज भाजपा उतनी ही ताकतवर है।

भाजपा के लम्बे संघर्ष के पसीने से सींची हिन्दुत्व की उर्वरा भूमि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने और भी उपजाऊ बना दी, ऐसे में कमंडल को चुनौती देकर मंडल के जातिगत समीकरण से सपा में भाजपा को टक्कर देने की ताकत पैदा करके अखिलेश यादव ने भाजपा के ओबीसी नेताओं को अपने पाले में लाकर यूपी की सियासत में एक हलचल पैदा कर दी है।

भाजपा और भाजपा गठबंधन के पिछड़ी जातियों के नेताओं को अपने पाले में लाकर अखिलेश यादव ने अपने गठबंधन को मजबूत और भाजपा को कमजोर करने की हर संभव कोशिशें जारी रखी हैं।

कभी योगी सरकार में मंत्री रहे बागी ओमप्रकाश राजभर सपा का सहारा बन कर भाजपा को दलित-पिछड़ा विरोधी होने की दोहराई दे देकर थक नहीं रहे थै कि योगी सरकार के दो कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मोर्य, दारा सिंह चौहान और कुछ विधायक भाजपा से बगावत कर सपा की ताकत बन गए। इससे पहले भी सपा जनगणना को लेकर जाति की गोटियां खेलना शुरू कर चुकी थी।

सपा से बेदखल होकर अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाने वाले शिवपाल यादव से दूरियां खत्म करके अखिलेश यादव ने अपने चाचा को अपनी ताकत बना लिया। साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट समुदाए में पकड़ रखने वाला राष्ट्रीय लोकदल और कई छोटे दलों को अपने गठबंधन में शामिल किया।

यूपी में भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चाओं पर यक़ीन करके ब्राह्मण नेताओं को भी सपा में शामिल किया। रैलियों पर पाबंदी से पहले समाजवादी विजय रथ यात्राओं में जबरदस्त भीड़ ने साबित किया कि जातिगत सामाजिक समीकरण रंग लाने लगे और सपा गठबंधन भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में आ गया।

यूपी में कांग्रेस की जमीन तैयार कर रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा की मेहनत और जनाधार वाली बहुजन समाज पार्टी को पीछे करके भाजपा को सीधी टक्कर देने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साबित कर दिया कि वो मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत को संभालने की क़ूबत रखते हैं।

यूपी की राजनीति में अपने चरखा दांव से बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं को पछाड़ देने वाले मुलायम सिंह यादव पुत्र पूर्व मुख्यमंत्री/सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के छोटे से राजनीतिक करियर में बहुत सारे उतार-चढ़ाव आए।

उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में विकास कार्यों को लेकर उनकी जितनी प्रशंसा हुई उससे अधिक विपक्षी भूमिका में वो आलोचनाओं का भी शिकार हुए।

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पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की मंडल की राजनीति को यूपी की सियासी जड़ों में पेवस्त कर उत्तर प्रदेश में कब्जा जमाए कांग्रेस को हाशिए पर लाने वाले मुलायम सिंह यादव ने एम वाई (मुस्लिम-यादव)के साथ पिछड़ी जातियों को लामबंद कर सामाजिक न्याय की लड़ाई नाम दिया था।

पिता के सियासी नक्शे-कदम पर चलकर अखिलेश एक बार फिर सपा में पुराने रंगों की ताकत भरने की जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। उन्हीं अखिलेश की परिपक्व राजनीति की लोग तारीफ कर रहे हैं जिनपर तोहमतें लगती थीं कि वो सिर्फ ट्वीटर की राजनीति करते हैं।

विपक्षी भूमिका में उन्होंने सब से बड़े विपक्षी नेता होने के नाते पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल यादव की तरह ज़मीनी संघर्ष नहीं किया। वो सत्ता से डर कर उतना सड़कों पर नहीं उतरे जितना उतरना चाहिए था। वो भाजपा को कैसे हरा पाएंगे !

अपनों की भी ऐसी टिप्पणियों-तंज़ों,शिकवों-शिकायतों और तोहमतों से घिरे अखिलेश आज जब पूरी परिपक्व और संतुलित राजनीतिक दक्षता के साथ यूपी में भाजपा को हलकान करके तगड़ी चुनौती दे रहे हैं तो उनकी प्रशंसा करने लगे हैं। जो अपने उनकी कमियों को गिनाते थे।

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सोशल मीडिया या नुक्कड़बाजी में ज्ञान देते थे वहीं कह रहे हैं कि आज अखिलेश के पक्ष में जो माहौल दिख रहा है वो उनकी कल की सूझबूझ और दूरदर्शिता का इनाम है। उनकी खामोशी,धैर्य और निष्क्रियता के भी गहरे माइने थे।

राजनेता हो या आम इंसान हर मौसम वैज्ञानिक समाजवादी खेमें की तरफ कदम बढ़ा रहा हैं। चढ़ते सूरज को सलाम होने लगे हैं। कहा जा रहा है कि अखिलेश ने जो किया अच्छा ही किया। पहले अपने पत्ते खोलते थे उन्हें एजेंसियां घेर लेतीं। कोई ताज्जुब नहीं कि झूठे आरोपों में उन्हें जेल तक में डाल दिया जाता। ज्यादा विपक्षी चहलकदमी करते तो हिंदू-मुस्लिम की पिच पर लाकर गिरा दिए जाते।

इन सब से बचने के लिए निष्क्रियता और खामोशी परिपक्व रणनीति का हिस्सा थी। चढ़ते सूरज को सलाम करने वाले अब ये भी कह रहे हैं अखिलेश यादव मुस्लिम और यादव को सेफ साइड मानकर पिछड़ों-दलितों, ब्राह्मणों और समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतने का क़ाबिले तारीफ काम कर रहे हैं। इधर राजनीति पंडितों का मानना है कि यदि सपा ग़ैर मुस्लिम-यादव को ज्यादा टिकट देगी तो ये पार्टी के हक़ में होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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