चीन से भारत तक… किन देशों में फंसी है ईरान की ज़ब्त संपत्ति, जानिए पूरी तस्वीर

ईरान और पश्चिमी देशों के बीच वर्षों से चला आ रहा सबसे जटिल और विवादित मुद्दा एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। विदेशों में फंसी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियां अब अमेरिका के साथ हुए नए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का अहम हिस्सा बन गई हैं। अगर इन फंड्स तक ईरान की पहुंच बहाल होती है तो इससे उसकी संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी, राजनीतिक और वित्तीय बाधाओं के चलते यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी।

ईरान की जब्त या फ्रीज़ की गई संपत्तियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन विभिन्न अनुमानों के मुताबिक इनकी कुल कीमत 27 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से अधिक हो सकती है।

इन संपत्तियों में शामिल हैं—

  • विदेशों में तेल और गैस निर्यात से हुई कमाई
  • विदेशी बैंकों में जमा विदेशी मुद्रा भंडार
  • बिजली निर्यात से प्राप्त राजस्व
  • दशकों पुराने कानूनी विवादों में फंसी संपत्तियां

असल में जब ईरान दूसरे देशों को तेल बेचता है तो भुगतान खरीदार देशों के बैंकों में जमा हो जाता है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और बैंकिंग पाबंदियों के कारण ईरान इन पैसों को अपने देश नहीं ला पाया।

ईरान की संपत्तियां पहली बार 1979 की इस्लामी क्रांति और तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास बंधक संकट के बाद बड़े पैमाने पर फ्रीज़ की गई थीं।

इसके बाद 2011-12 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध और कड़े हुए। 2018 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर निकाल लिया, जिसके बाद प्रतिबंध और बढ़ा दिए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान की तेल बिक्री से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशों में ही फंस गया।

ईरान के अधिकांश फंड अमेरिका में नहीं, बल्कि अन्य देशों में रखे हुए हैं।

अनुमान के मुताबिक—

  • चीन में 20 से 50 अरब डॉलर तक की राशि है, क्योंकि चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है।
  • इराक में गैस और बिजली निर्यात से जुड़े 10 से 15 अरब डॉलर फंसे हुए हैं।
  • दक्षिण कोरिया के पास लगभग 6 अरब डॉलर थे, जिन्हें 2023 में कतर के खातों में ट्रांसफर किया गया।
  • इसके अलावा भारत, जापान और लक्जमबर्ग जैसे देशों में भी ईरान की संपत्तियां मौजूद हैं।

वहीं अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में लगभग 2 अरब डॉलर की संपत्तियां हैं, जिनका अधिकांश हिस्सा कानूनी विवादों और मुआवजे के मामलों से जुड़ा है।

हालांकि अधिकांश फंड अमेरिका के बाहर हैं, लेकिन उन तक पहुंच का फैसला काफी हद तक अमेरिका के हाथ में है।

इसकी वजह हैं अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शंस। इन प्रतिबंधों के तहत अगर कोई विदेशी बैंक या कंपनी ईरान के साथ वित्तीय लेनदेन करती है तो उसे अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर किया जा सकता है या उस पर भी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

यही कारण है कि जिन देशों में ईरान का पैसा जमा है, वे अमेरिका की अनुमति के बिना इन फंड्स को जारी करने से बचते हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन में आर्थिक राहत के दो प्रमुख रास्ते बताए गए हैं—

  • ईरान को तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की अनुमति में राहत।
  • विदेशों में फंसे फंड्स तक ईरान के केंद्रीय बैंक की सीमित पहुंच।

इसके अलावा समझौते में करीब 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण और विकास कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्रों में निवेश की योजना है।

हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान को सीधे नकद सहायता नहीं देगा। उसकी प्राथमिकता निवेश आधारित सहयोग होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि व्यवहारिक स्तर पर यह प्रक्रिया बेहद जटिल होगी।

ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक बोर्स एंड बाजार फाउंडेशन के संस्थापक एस्फंदियार बतमंगेलिद्ज़ के मुताबिक ईरान कुछ देशों के भीतर तो इन फंड्स का उपयोग कर सकता है, लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रांसफर करना अब भी कठिन रहेगा।

इसके अलावा कई अमेरिकी प्रतिबंध कांग्रेस द्वारा कानून के रूप में लागू किए गए हैं। ऐसे में कोई भी राष्ट्रपति उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, बल्कि केवल सीमित अवधि की छूट दे सकता है।

2015 के परमाणु समझौते के बाद भी कुछ समय के लिए राहत मिली थी, लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से हटते ही प्रतिबंध दोबारा लागू हो गए।

हाल ही में ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि अमेरिका 12 अरब डॉलर की फ्रीज़ संपत्तियां जारी करने पर सहमत हो गया है।

हालांकि अमेरिका ने इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

इस बीच अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया था कि ईरानी खातों की कुछ राशि का इस्तेमाल खाड़ी देशों को युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए किया जा सकता है।

ईरान ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उसकी संपत्तियां किसी भी देश के लिए “युद्ध की लूट” नहीं हैं।

विश्व बैंक के अनुसार 2024 में ईरान की अर्थव्यवस्था का आकार करीब 475 अरब डॉलर था।

ईरानी अधिकारियों का अनुमान है कि हालिया युद्ध के कारण देश को लगभग 300 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है और इस वर्ष अर्थव्यवस्था में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।

अगर फ्रीज़ फंड्स का कुछ हिस्सा भी जारी होता है तो इससे—

  • विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा।
  • रियाल की गिरती कीमत को सहारा मिलेगा।
  • जरूरी वस्तुओं के आयात में आसानी होगी।
  • महंगाई के दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।

हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि केवल पैसा मिलने से ईरान की गहरी आर्थिक समस्याएं खत्म नहीं होंगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के सामने सिर्फ विदेशी मुद्रा की कमी नहीं, बल्कि निवेश में गिरावट, पुराने पड़ चुके उद्योग, लगातार बढ़ती महंगाई और राजनीतिक अनिश्चितता जैसी गंभीर चुनौतियां भी हैं।

उनका मानना है कि जब तक ईरान क्षेत्रीय तनाव कम नहीं करता और निवेशकों का भरोसा बहाल नहीं करता, तब तक केवल फ्रीज़ संपत्तियों तक पहुंच से उसकी अर्थव्यवस्था में स्थायी सुधार संभव नहीं होगा।

फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है। यदि अंतिम समझौता होता है और प्रतिबंधों में व्यापक राहत मिलती है, तो ईरान को दशकों बाद अपनी विदेशों में फंसी संपत्तियों तक बड़ी पहुंच मिल सकती है। लेकिन अगर बातचीत विफल रही या प्रतिबंध दोबारा सख्त हुए, तो यह पूरा मामला फिर अनिश्चितता में फंस सकता है।

यानी ईरान की अरबों डॉलर की फ्रीज़ संपत्तियां केवल आर्थिक मुद्दा नहीं हैं, बल्कि वे पश्चिम के साथ उसके रिश्तों, क्षेत्रीय राजनीति और भविष्य की कूटनीति का भी अहम आधार बन चुकी हैं।

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