सीजफायर के बाद भी अस्थिरता: ट्रंप-इजरायल का अस्पष्ट रुख और मध्य पूर्व के बढ़ते खतरे

मध्यपूर्व में युद्ध की आग अभी ठंडी नहीं हुई है। 8 अप्रैल 2026 को अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच दो हफ्ते का सीजफायर घोषित हुआ, जिसकी मध्यस्थता पाकिस्तान ने की थी। लेकिन 9 अप्रैल को लेबनान में इजरायली हमलों ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली , स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर बंद हो गया है और ट्रंप ने फिर से ‘शूटिन’ शुरू होने की धमकी दे दी है। स्थिति जस की तस है—बल्कि और बिगड़ती जा रही है। यह सीजफायर ‘विजय’ नहीं, बल्कि एक नाजुक समझौता है, जिसके आसपास भ्रम, विरोधाभास और खतरों का घेरा बनता जा रहा है।

वर्तमान हालात स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि सीजफायर सिर्फ कागजों पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान के साथ दो हफ्ते का युद्धविराम हो गया है, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि लेबनान और हिजबुल्लाह इसमें शामिल नहीं हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी यही दोहराया—“सीजफायर ईरान के साथ है, लेबनान के साथ नहीं।” नतीजा? इजरायल ने बेरूत के केंद्रीय इलाकों पर बिना चेतावनी के भारी हमले किए। लेबनान के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 182 से 254 लोग मारे गए और 1,165 से ज्यादा घायल हुए। यह इस लेबनान-इजरायल संघर्ष का सबसे घातक दिन बन गया। हिजबुल्लाह ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन इजरायल ने दक्षिण लेबनान में बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना जारी रखा।

ट्रंप का रुख और भी अस्पष्ट और आक्रामक है। ट्रूथ सोशल पर उन्होंने लिखा: “सभी अमेरिकी जहाज, विमान और सैन्यकर्मी ईरान के आसपास बने रहेंगे, जब तक ‘रियल एग्रीमेंट’ पूरी तरह लागू न हो जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ… तो ‘शूटिन’ शुरू हो जाएगा—बड़ा, बेहतर और मजबूत, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।” उन्होंने दोहराया कि ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं होने चाहिए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज “खुला और सुरक्षित” रहेगा। ईरान ने जवाब में स्ट्रेट बंद कर दिया—जहाजों की आवाजाही लगभग शून्य हो गई है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि होर्मुज खोलना लेबनान पर हमले रुकने पर निर्भर है। “तुम केक खा भी सकते हो और रख भी सकते हो—यह संभव नहीं,” ईरानी उप-विदेश मंत्री सईद खातिबजादे ने चेतावनी दी।

नेतन्याहू ने कहा, “हम हिजबुल्लाह को निरस्त्र करने तक अभियान जारी रखेंगे।” इजरायली रक्षा मंत्री और लिकुड पार्टी के नेता अमिचाई चिकली ने तो सीजफायर को ही “गलती” करार दिया। वहीं, पाकिस्तान (मध्यस्थ) और ईरान का दावा है कि सीजफायर “हर जगह, लेबनान सहित” लागू होना चाहिए था—लेकिन अमेरिका-इजरायल ने इसे खारिज कर दिया। इस भ्रम ने पूरे समझौते को हिला दिया है।

पहला और सबसे बड़ा खतरा—सीजफायर का पूर्ण टूटना। अगर ईरान होर्मुज में खदानें बिछा दे या टोल लगाना शुरू कर दे (जो ट्रंप बर्दाश्त नहीं करेंगे), तो वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो जाएगी। तेल की कीमतें पहले ही 97 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। दूसरा खतरा—लेबनान में मानवीय संकट। एक मिलियन से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं, अस्पताल और बुनियादी ढांचा ध्वस्त हो रहा है। तीसरा—क्षेत्रीय विस्तार। अगर सऊदी अरब, चीन या अन्य देश हस्तक्षेप करें, तो यह युद्ध बहुपक्षीय बन सकता है। चौथा—परमाणु मुद्दा। ईरान का यूरेनियम स्टॉक अभी भी सुरक्षित है; ट्रंप इसे हटाना चाहते हैं, लेकिन ईरान ने कोई पुष्टि नहीं की।

इस सीजफायर में सबसे बड़ी कमी स्पष्टता की है। ट्रंप और नेतन्याहू का रुख “ईरान के साथ शांति, लेकिन हिजबुल्लाह के साथ युद्ध” जैसा है—जो ईरान को स्वीकार्य नहीं। पाकिस्तान में 11 अप्रैल को होने वाली बातचीत में अगर सभी पक्ष शामिल नहीं हुए तो यह भी फेल हो सकती है।

यह सीजफायर उम्मीद की किरण तो है, लेकिन बिना मजबूत कूटनीति के यह सिर्फ युद्ध को टालने का अस्थायी उपाय साबित होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय—खासकर यूएन, फ्रांस, ब्रिटेन और सऊदी अरब—को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। लेबनान को भी सीजफायर में शामिल किया जाए, होर्मुज की स्वतंत्र नेविगेशन सुनिश्चित हो और परमाणु खतरे पर स्थायी समझौता हो। वरना, ट्रंप की “बड़ी और बेहतर” धमकी और नेतन्याहू का “ट्रिगर पर उंगली” वाला रुख जल्द ही पूरे क्षेत्र को फिर आग में झोंक देगा।

शांति की राह स्पष्ट रुख और समावेशी बातचीत से ही निकलेगी—न कि अस्पष्ट समझौतों और चुनिंदा युद्धों से। मध्य पूर्व पहले ही बहुत खून बहा चुका है। अब वक्त है कि नेतृत्वकारी फैसले लो, न कि सिर्फ बयानबाजी।

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