Sunday - 15 September 2019 - 7:34 PM

आखिर क्यों है हमारे अंदर आत्मघाती लापरवाही की प्रवृत्ति

डा. मनीष पाण्डेय

भारत ने अतीत में अनेकों आपदाओं को झेला है जिसके कारण बड़ी संख्या में मानव संसाधन की क्षति हुई| यद्यपि मानव, प्रकृति की गतिविधि के समक्ष विवश है, लेकिन आपदाओं के प्रभाव को कम करना और मानव-निर्मित आपदाओं को रोकना उसके स्वयं के अधीन है|

सामान्यतया भारतीय अपने जीवन (lives) के से जुड़े मसलों को लेकर ख़तरनाक व्यवहार करते हैं।स्वयं के प्रति ऐसी लापरवाही से समाज आत्मघाती बन जाता है| परंपरागत समाज में तो लोग प्राकृतिक आपदाओं को लेकर जागरूक और अनुकूल रहते थे, लेकिन यह क्षमता मानव-निर्मित आपदाओं को लेकर जारी नहीं रह सकी।

परंपरागत भारतीय समाज में ‘कर्म का सिद्धान्त’ एक पृथक जीवन दर्शन को प्रोत्साहित करता रहा है, जहाँ प्रारब्ध से ही मनुष्य की नियति निर्धारित मानी जाती थी। इसमें विश्वास के साथ व्यक्ति निश्चिंत भाव में रहता था कि नियति ने जो तय कर रखा है, वह अकाट्य है, किन्तु आधुनिकता ने इस मनोदृष्टि को बदला है। आधुनिकता का लक्षण है, कि व्यक्ति अपने बारे में सोंचे, तर्क करे और स्वयं को ताकतवर बनाए।

परन्तु, चिंतनीय बात यह है, कि वैश्वीकरण के विमर्श वाले इस दौर में भी भारतीयों की मनोदृष्टि गैर-आधुनिक क्यों है? स्वयं की सुरक्षा भारतीयों की पहली प्राथमिकता नहीं रहती। आख़िर क्यों भारतीय इतनी लापरवाही से जीते हैं!
आँकड़े उक्त प्रस्थापना की पुष्टि करते हैं। हाल ही में यूनाइटेड नेशन द्वारा 6 मई से 12 मई, 2019 को आयोजित 5वें ‘ग्लोबल रोड़ सेफ़्टी वीक’ में जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ वैश्विक स्तर पर 5 से 29 आयु वर्ग के 1.35 मिलियन लोगों का जीवन प्रतिवर्ष समाप्त हो जाता है, और लगभग 50 मिलियन गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।

भारत सरकार का एक अनुमानित आँकड़ा है, कि प्रति वर्ष यहाँ 1,50,000 लोगों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, तो यूएनओ इस आंकड़ों को 2,99,000 आँकता है। कारण कोई संस्थागत नहीं बल्कि व्यक्ति की स्वयं की लापरवाही, नशा, ओवरस्पीड, सीट बेल्ट और हेलमेट न लगाना ही अधिक होता है।

उत्तर प्रदेश का यमुना एक्सप्रेस वे इन्ही लापरवाहियों की वजह से मौत का एक्सप्रेस वे बना हुआ है| परिवहन निदेशालय से मिले इस साल के शुरुवाती 6 महीने के आँकड़े के मुताबिक यमुना एक्सप्रेस वे पर 95 हादसे हो चुके हैं, जिसमें 94 एलपीजी अपनी जान गंवा चुके हैं और 120 से ज्यादा घायल हैं| अभी पिछले ही महीने की एक सुबह आगरा के एत्माद्पुर तेज रफ्तार आ रही एसी बस बेकाबू होकर 60 फिट नीचे नाले में गिर गई और लगभग 29 यात्रियों की मौत हो गई, 22 लोगों के घायल होने की सूचना मिली|

जाहिर है सबका उद्देश्य जल्दी गंतव्य तक पहुँचना था, न कि सुरक्षा अन्यथा ओवर स्पीड औए ड्राईवर की स्थिति बस में सीट रिजर्व करने का आधार बनती|

दशहरे के जलते रावण को देखने में रेलवे ट्रैक पर खड़े होकर लापरवाही में कईयों के जान गंवा देने की अमृतसर की घटना बहुत पुरानी नहीं हुई है। तीर्थस्थानों पर मचे भगदड़ या भीड़ भरे स्थानों पर लगी आग से बचने के उपाय को लेकर भारतीयों में जबरदस्त बेपरवाही है। इसी प्रकार हर एक व्यक्ति पानी के महत्व को समझता है, फिर भी उसके प्रति उदासीनता और दुरुपयोग कर स्वयं के जीवन अस्तित्व को दाँव पर लगाने का दुस्साहस करता है|

भारत की करीब 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी पीने के लिए भूजल स्त्रोतों पर निर्भर है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन आदि तत्वों की अधिकता से होने वाली बीमारियों के प्रति भी लोगों में ज़रूरी सजगता नहीं है, जिसके कारण स्थानीय लोगों में इंसेफ्लाइटिस, पीलिया व टायफॉइड जैसी तमाम बीमारियां अक्सर फैल जाती हैं।

2012 के एक अध्ययन ‘फिंगर प्रिंट ऑफ़ आर्सेनिक कंटैमिनेटेड वॉटर इन इंडिया: ए रिव्यू’ के अनुसार पूरे उत्तर भारतीय राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में आर्सेनिक संदूषण के मामले सामने आए हैं।  पश्चिम बंगाल में गंगा के निचले मैदानी इलाकों और नेपाल की तराई में भी आर्सेनिक संदूषण के मामले चिन्हित किये गए हैं। भूजल में सामान्य तौर पर आर्सेनिक और फ्लोराइड पाए जाने की वजह जल स्त्रोतों का अत्यधिक दोहन है, जिसके लिए मानव ही जिम्मेदार है। उद्योगों का अपशिष्ट जमीन के भीतर जाने के अलावा ग्रामीण इलाकों में कीटनाशक एवं खरपतवार नाशक के अत्यधिक प्रयोग से भी स्थानीय जल प्रदूषित हो रहा है।

जीवन स्वास्थ्य जुड़े अन्य मुद्दों पर ध्यान दिया जाए तो एक अनुमान के मुताबिक़ देश में 42 प्रतिशत पुरूष एवं 18 प्रतिशत महिलाएं तम्बाकू सेवन के कारण कैंसर का शिकार होकर अपनी जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के एक प्रतिवेदन के अनुसार देश में हर साल इस बीमारी से 70 हजार लोगों की मृत्यु हो गई, जिसमें से 80 प्रतिशत लोगों की मौत का कारण बीमारी के प्रति लापरवाह रवैया था।

बीमारी के गंभीर बनने तक लोग उदासीन बने रहते हैं। ब्लडप्रेशर, डायबिटीज़, हार्ट, एनीमिया, डिप्रेसन आदि स्वास्थ्य समस्याएं हमारी ही दैनिक अनियमितता के उत्पाद हैं। एक आँकड़े के मुताबिक़ 2005 से 2014 के एक दशक में ही 3447 लोग आतशबाजी और पटाख़ों के कारण मर गए। 23000 से ज्यादा लोग पिछले चार साल में चलती ट्रेन से गिरकर या उसकी चपेट में आकर अपना जीवन खो चुके हैं। सामान्य सावधानी न बरतने से 2013 से 2016 केबीच 452 वर्कर्स की मृत्यु हो गई।

समाजशास्त्री मानते हैं, कि आधुनिकता और जोखिमों के प्रति जागरूकता एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन भारतीय समाज के बारे में यह लगभग स्वीकार्य विचार है कि यहाँ परम्परा भी समानान्तर प्रभावी है। परंपरागत समाज तो अपने समय की आपदाओं के ख़तरे से निपटने में सक्षम था, लेकिन वर्तमान आपदाओं का सामना करने में व्यक्ति स्वयं को तैयार नहीं कर पाया है।

इसकी एक बड़ी वज़ह नए परिवर्तनों के साथ खड़ी हुई मानव जनित समस्याओं से निपटने के लिए आर्थिक संजाल में उलझा हुआ व्यक्ति स्वयं को उद्यत नहीं कर सका। विशेषकर यदि भारतीय समाज पर ध्यान दिया जाए तो यहाँ अपने जीवन और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का एक वर्गीय चरित्र भी है।

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यद्यपि आधुनिक विचारों के प्रभाव से परम्परागत अंधविश्वासों से लोग काफ़ी हद तक उबर चुके हैं, लेकिन आर्थिक विकास के साथ देश का एक बड़ा समूह सामंजस्य नहीं बैठा पाया है। अभी हम बहुत सारे परम्परागत मूल्यों से घिरे हुए हैं।
सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के सापेक्ष हमारे मूल्य और व्यवहार में बदलाव की गति धीमी रही। नई शिक्षा प्रणाली हमें पुस्तकीय ज्ञान से बाहर ही नहीं निकाल प रही। अभी मई माह में ही गुजरात के सूरत के कोचिंग सेंटर में लगी आग की घटना याद होगी। वहाँ तक्षशिला व्यावसायिक परिसर की तीसरी-चौथी मंजिल में आग लग गई थी, इस हादसे में क़रीब 15 बच्चों की मौत उसी दिन हो गई थी। कारण बहुत ही साधारण था, कि उस बिल्डिंग में आग से बचने के सामान्य सुरक्षा मानकों का भी अनुपालन नहीं हुआ था, बच्चों ने ग़ैरतार्किक व्यवहार करते हुए छत से सीधे छलाँग लगाकर लगभग आत्महत्या करने जैसा प्रयास किया| वहाँ पढ़ने जाने वाले या सेंटर खोलने वाले लोगों ने ऐसी दुर्घटना की संभावना पर कभी विचार ही नहीं किया। वास्तव में दुर्घटनाओं को लेकर सावधानी बरतना हम सभी के जीवन व्यवहार में ही नहीं आ पाया है।

अमूल्य मानव जीवन की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर समाज में संवेदनशीलता आवश्यक है| हमें इसको लेकर अपना गैर-आधुनिक मनोभाव (नॉन-मॉडर्न एटीट्यूड) बदलना होगा| यह भी एक तथ्य है कि अब हमारा समाजीकरण करने और संस्थाओं के निर्माण में राज्य (स्टेट) और आर्थिक पक्षों की भूमिका बढ़ी है, लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में इसे अपेक्षित गति नहीं मिल पाई है|

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पुरानी संस्थाएं या तो कमजोर पड़ गई हैं या अपना समय के अनुरूप सामंजस्य बना पाईं, जिसके कारण व्यक्ति की सर्वाइव करने की क्षमता प्रभावित हुई है| सामान्य दुर्घटनाओं और बीमारियों में ही जीवन समाप्त कर देने की प्रवृत्ति रोकने के लिए व्यक्ति और समाज दोनों को जागरूक होना होगा| जीवन शैली और व्यवहार को तार्किक बनाकर ही हम इस जोख़िम भरे समाज (रिस्क सोसाइटी) में अपना जीवन अस्तित्व बचा सकते हैं|

(लेखक समाजशास्त्री हैं )

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