Monday - 30 January 2023 - 2:45 PM

यादव वोट बैंक : जागरूक, ताकतवर और दांव-पेच में माहिर!

राजेन्द्र कुमार

यूपी में यादव समाज पिछड़ों के नव सामंत हैं। यूं कहें, यादव समाज यूपी में पिछड़े वर्ग का सबसे आक्रमक और दबंग वोट बैंक है

। गैर कांग्रेसवाद का जनक है, जिसमें अपने अधिकारों के लिए कुछ भी करने का माद्दा है। जोड़तोड़ में माहिर है। कभी खेती और दूध के कारोबार में लगी यह बिरादरी फिलवक्त यूपी और बिहार में राजनीति की कुशल खिलाड़ी है। आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक लिहाज से ताकतवर पिछड़ी जमात है।

डा. राम मनोहर लोहिया ने सबसे पहले इस वोट बैंक को पहचाना। सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़ा पावे सौ में साठ, नारे के तहत उन्हें एकजुट किया। फिर चौधरी चरण सिंह ने इस आधार को विस्तार दिया। उत्तर प्रदेश में यह पहला देहाती समुदाय था, जिसकी पहचान वोट बैंक के तौर पर हुई।

 

राजनीतिक लिहाज से यादव सबसे ज्यादा जागरूक

रामनरेश यादव और मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने के कारण इस वोट बैंक को और मजबूती मिली। अखिलेश यादव ने इस  वोट बैंक को आधुनिक सोच भी दी। पुलिस के निचले स्तर और प्रशासन में इनका खासा प्रतिनिधित्व बढ़ा। पिछड़ों को मिले आरक्षण का बड़ा हिस्सा यह वर्ग ले गया। लोधी और कुर्मी खास इलाकों में प्रभावी हैं पर यादव पूरे राज्य में फैला वोट बैंक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों को छोडक़र सारे राज्य में असरदार। इसलिए पिछड़ों में विधायी प्रतिनिधित्व भी इनके पास सबसे ज्यादा है।

मुलायम सिंह यादव इस वोट बैंक के जातीय स्वाभिमान के प्रतीक हैं। यादव राजनीतिक लिहाज से सबसे ज्यादा जागरूक हैं। इसलिए सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस ने लोकसभा तथा विधानसभा के लिए अब तक दो सौ से अधिक टिकट यादवों को दिए हैं। निर्दलीयों में जीते अधिकांश विधायकों यादव हैं। यह वोट बैंक ट्रांसफर नहीं होता। 1993 में बसपा-सपा गठबंधन के नतीजे यही बताते हैं।

करीब बीस लोकसभा सीटों पर निर्णायक है

नौ प्रतिशत आबादी वाला यह वोट बैंक कोई सवा सौ विधान सभा और करीब बीस लोकसभा सीटों पर निर्णायक है। मैनपुरी और आजमगढ़ घनी यादव आबादी वाले क्षेत्र हैं। वोट बैंक के तौर पर यह फिलहाल समाजवादी पार्टी के साथ है। कांग्रेस के साथ कभी जाता नहीं क्योंकि उसी के ब्राह्यणवाद की प्रतिक्रिया में से तो यह वोट बैंक बना। 1937 की अन्तरिम सरकार से लेकर सन 1967 तक राज्य के मंत्रिमंडल में कोई मंत्री नहीं था। विधानसभा में यादव विधायकों की संख्या 10 के आसपास थी। इसी उपेक्षा की जवाबी एकजुटता थी यह वोट बैंक। जुबानी तौर पर भाजपा उनकी बात भले करे पर नरसिंह यादव, हरपाल यादव, अशोक यादव जैसे यादव नेताओं के साथ भाजपा का बर्ताव इस वोट बैंक से उसकी दूरी तय तय करता है। बसपा में मुलायम सिंह यादव के कारण उसकी निष्टा हमेशा संदिग्ध देखी जाती है। कल्याण सिंह की सरकार में भी 1967 के बाद पहली बार कोई यादव मंत्री नहीं था। इसलिए सपा में जाने के अलावा इस वोट बैंक के पास कोई चारा भी नही है।

कांग्रेस ने राजनैतिक ताकत को नहीं किया नोटिस 

राज्य की विधानसभा में यादवों ने अपनी राजनैतिक एकजुटता 1969 में ही दर्ज करा दी। तब 32 यादव विधायक चुने गए। हालांकि सामाजिक एकजुटता इस बिरादरी ने 1923 में ही दिखलायी पड़ी। इसी साल अखिल भारतीय यादव महासभा का गठन हुआ। 1923 में ही लखनऊ में अहीर सम्मेलन हुआ। तुरन्त बाद इलाहाबाद में अहीर महोत्सव हुआ। समाज में चेतना आई। पर आजादी के बाद कांग्रेसी सरकारों ने इस राजनैतिक ताकत का नोटिस नहीं लिया। डा. लोहिया ने इस दर्द पर हाथ रखा। पूरा समाज गैर कांग्रेसवाद के परचम के नीचे आया। यह बिरादरी लोहिया की ताकत बनी। डा. लोहिया के निधन के बाद चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश में मध्य किसान जातियों के प्रवक्ता बने। विचारों से समाजवादी न होते हुए भी उन्होंने समाजवादी आंदोलन की ताकतों को इकत्र किया। यादवों की ताकत पहचानी। उन्हें अपने किसान आधार से जोड़ा।

चौधरी चरण सिंह ने वोट बैंक में बदला 

आजादी के बाद 1967 तक इन्हें सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली थी। विधायक भी कम थे। इसी आक्रोश को चौधरी चरण सिंह ने वोट बैंक में बदल दिया। इलाहाबाद के रूपनाथ सिंह यादव और वाराणसी के श्यामलाल यादव को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया। तब से सत्ता में आए इस वर्ग ने पीछे नहीं देखा। चौधरी चरण सिंह ने इसे लगातार मजबूत किया। जमीदारी उन्मूलन और पटवारियों को बर्खास्त कर वे इस समाज के नायक पहले ही बन गए थे। कानपुर के चौधरी राम गोपाल यादव, आजमगढ़ के रामवचन यादव, बाराबंकी के रामसेवक यादव, गाजीपुर के रामकरन यादव, वाराणसी के श्यामलाल यादव इनके नए क्षत्रप हुए। मौका मिलते ही 1977 में चौधरी चरण सिंह ने ढूंढ कर रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। रामनरेश यादव सांसद थे। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी नही थे। मुलायम सिंह यादव में उन्हें संभावना दिखी। 1980 में मुलायम सिंह यादव को चौधरी साहब ने पार्टी अध्यक्ष बनाया। फिर विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया।

चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह

चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह में एक समानता थी दोनों पिछड़े वर्ग की राजनीतिकरण प्रक्रिया के हिमायती थे। चौधरी चरण सिंह पहले कांग्रेसी थे जिन्होंने पिछड़ों के इस असंतोष को पहचाना था। उन्होंने 1956 में ही पिछड़ा वर्ग सम्मेलन की अध्यक्षता कर खेती पर आश्रित बिरादरी को 60 फीसदी आरक्षण की मांग की।1967 तक आते-आते यादवों में इसकी तीखी प्रक्रिया शुरू हुई। पिछड़े और यादव विधायकों की संख्या बढऩी शुरू हुई। 1962 में सिर्फ 40 पिछड़े विधायक थे। 1967 में 67 हुए। 1974 में इनकी संख्या बढक़र 96 हुई। तो 1991 में 108 पहुंच गयी। 1993 में और बढ़ 118 हुए और पिछली विधानसभा में यह तादाद 140 से ऊपर थी। यानी पिछड़ों की संख्या लगातार बढ़ी, पर विचारधारा और प्रगतिशीलता का अभाव रहा। चरण सिंह ने जो आधार तलाशा था वह लोकदल, जनता दल से होते-होते समाजवादी पार्टी तक आया।

यादवों और जाटों की 20 वर्ष पुरानी दोस्ती टूटी

1980 में जनता पार्टी की सरकार चली गई। मुलायम सिंह यादव जसवंत नगर से चुनाव हारे। इसके बाद वह विधान परिषद में गए और वहां नेता विरोधी दल बने। 1984 में उन्हें लोकदल के अध्यक्ष पद से हटाया गया। बस यही टर्निंग प्लांइट था। मुलायम सिंह के हटते ही यादव एकदम से उनसे जुड़े। वे एक मात्र नेता बने, क्योंकि मुलायम सिंह को हटाने के तरीके से यादव नाराज हुआ था। तब बाकी यादव नेताओं के सामने पहचान का संकट आ गया। चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद 1987 में विरासत की लड़ाई छिड़ी। लोकदल (अ) और (ब) बना। लोकदल (अ) में जाट गए और (ब) में यादव आ गए। यादवों और जाटों की 20 वर्ष पुरानी दोस्ती टूट गई। 1989 में यह युद्ध फिर आमने-सामने हुआ। जब वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल में ये दोनों घटक मुख्यमंत्री के सवाल पर एक-दूसरे से टकराए। वोट पड़ा मुलायम सिंह जीते। अजित हारे। दुश्मनी गाढ़ी हुई और यादव वोट बैंक मजबूत हुआ। मुलायम सिंह ने ऐलान किया कि चौधरी साहब की संपत्ति के वारिस अजित सिंह हो सकते है, लेकिन राजनीति का वारिस मैं ही हूं। 1989 में मुख्यमंत्री बन मुलायम सिंह ने नौकरियों और तैनाती के जरिए इस आधार को और मजबूत किया। चंद्रजीत यादव, बलराम सिंह यादव, रामनरेश यादव जैसे लोग अप्रासंगिक हो गए।

मुलायम सभी पर भारी पड़े

फिर इस वोट बैंक पर किसी का नियंत्रण नहीं रहा। मुलायम सिंह का साथ छोडऩे वाले यादव हाशिए पर गए। दर्शन सिंह यादव, अशोक यादव जैसे लोग भी यादवों के नेता नहीं बन सके। अशोक यादव ने अति पिछड़ो को नए आरक्षण के प्राविधान सुप्रीम कोर्ट से रूकवाकर जरूर थोड़ा असर बनाया, क्योंकि संदेश यही गया कि यादवों का जो आरक्षण छिन रहा था वह रूका। पर राजनीतिक पार्टी का अभाव उनके रास्ते का रोड़ा है, क्योंकि यादवी राजनीति को संरक्षण देने के चलते मुलायम सभी पर भारी पड़े। यहां तक की उनके घोर राजनीतिक विरोधी बलराम सिंह यादव को उनका साथ पकडऩा-छोडऩा पड़ता है। प्रदेश की यादवी राजनीति में यादवों की हर प्रकार की सक्रियता के चलते शरद यादव जैसे लोग भी बिहार से बदायूं आए और लालू यादव ने भी तीसरे मोर्चे के नाम पर इस राज्य के काफी चक्कर काटे। बलराम यादव, सत्यपाल सिंह यादव, मित्रसेन यादव भी मुलायम के कभी पास कभी दूर जाते रहे।

यादव हर दल में सक्रिय राजनीति कर रहे

राजनीतिक स्तर पर होने वाले इस युद्ध में अब यादव हर दल में सक्रिय राजनीति कर रहे हैं। यदि वे समाजवादी पार्टी में हैं तो मुलायम सिंह का सहयोग लेकर चल रहे हैं और यदि वे किसी दूसरे राजनीतिक दल में हैं तो अब मुलायम और अखिलेश के विरोध के कारण सम्मान पा रहे हैं। आज की स्थिति में वे सत्ता के आसपास ही रहना चाहते हैं। अभी सपा से निकाले गए रमाकांत यादव, भालचन्द्र यादव जैसे तमाम नेताओं पर भाजपा और बसपा की छत्रछाया है। भाजपा से सपा में गए सत्यपाल सिंह यादव पर मुलायम की कृपा रही तो अखिलेश के विरोध करने सल चलते मुलायम को डीपी यादव से नाता तोडना पड़ा।

अखिलेश देश में यादव समाज के प्रमुख नेता

डीपी यादव अपनी परिवर्तन पार्टी के जरिए कुछ समय तक सक्रिय रहे, अब वह राजनीति के हासिये पर हैं। रामगोपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव ने मुलायम की विरासत को परिवारवाद के नाम पर संभाल लिया है, जबकि शिवपाल सिंह यादव ने अपने लिए अब नई राह चुन ली है। अति पिछड़ों को दिए गए आरक्षण पर न्यायालय का स्थगन आदेश लाने वाले अशोक यादव की भी अपनी खास शैली है और वह यादव समाज के बड़े नेता बनते-बनते एक विधानसभा सीट के नेता बनकर रह गए हैं। वही मुलायम सिंह जी के पुत्र अखिलेश यादव आज सपा के मुखिया बन चुके हैं, देश की राजनीति में अखिलेश यादव का एक मुकाम और हैसियत है। आज अखिलेश यादव यूपी और देश में यादव समाज के एक प्रमुख नेता हैं। आज हम कह सकते है, लोकतंत्र की इस यात्रा में राजनीतिक दर्शन और विचारधाराओं से गुजरता हुआ यादव समुदाय राजनीतिक रूप से प्रबल और शासक वर्ग बन गया है। वह सत्ता के गणित को समझकर जोड़तोड़ करने में माहिर है। अब उसकी गिनती और राजनीति व्यवहार की समीक्षा अन्य पिछड़े वर्ग के बाहर होने लगी है।

2014 में 27 प्रतिशत यादव वोट बीजेपी को मिला

यूपी में यादव वोट बैंक पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार माना जाता है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यह भ्रम कुछ हद तक टूटा। नौ फीसदी यादवों के वोट बैंक में 27 फीसदी वोट भारतीय जनता पार्टी को मिला। हालांकि, 2007 के विधानसभा चुनाव में एसपी को 72 फीसदी, 2009 के लोकसभा चुनाव में एसपी को 73 फीसदी और 2012 के विधानसभा चुनाव में एसपी को 66 फीसदी वोट मिला था, लेकिन 2014 के चुनाव में एसपी को सिर्फ 53 फीसदी यादवों को वोट मिला।

यूपी के यादव बहुल प्रमुख चुनाव क्षेत्र

वर्ष  2014 में जीती  पार्टियां 

  • चुनावी क्षेत्र –  विजेता
  • मैनपुरी        – सपा
  • फिरोज़ाबादभाजपा
  • एटा             –  भाजपा
  • कन्नौज         –  सपा
  • फर्रुखाबादभाजपा
  • बदायूं          –  सपा
  • फैजाबाद    – भाजपा
  • गाजीपुर –   भाजपा
  • जौनपुर  –  भाजपा
  • आजमगढ़  –  सपा

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, ये लेख उनके निजी विचार हैं )

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