Sunday - 23 January 2022 - 2:38 AM

‘गुड मुस्लिम’ और ‘बैड मुस्लिम’ का चक्कर क्या है

 

अविनाश भदौरिया 

सियासी गलियारे में और प्रबुद्ध वर्ग में इन दिनों एक बहस छिड़ी हुई है, यह बहस मुस्लिम समाज को लेकर हो रही है। मुद्दा है कि आखिर ‘गुड मुस्लिम’ और ‘बैड मुस्लिम’ कौन है। दरअसलसंघ नेता के एक बयान के बाद इस बहस की शुरुआत हुई है।

बता दें कि दक्षिणपंथी शिक्षाविदों ने 11 सितंबर को मुगल शासक दाराशिकोह पर एक परिचर्चा आयोजित की थी। इसमें आरएसएस नेताओं ने दाराशिकोह को औरंगजेब से बेहतर बताया था।

आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉ। गोपाल कृष्ण गोपाल ने ये कहकर कि अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह मुगल सम्राट बनता तो इस्लाम देश में और फलता-फूलता एक नई बहस छेड़ दी है।

क्या है संघ का प्लान

देश में बीजेपी की सरकार है और ज्यादातर राज्यों में भी बीजेपी की ही सरकार है। ऐसे में संघ की नजर आगामी कई वर्षों तक सत्ता पर पकड़ बनाए रखने पर है। संघ के इस सपने में अगर कोई बाधा है तो वह मुस्लिम ही है। शायद इसलिए ही संघ और बीजेपी दोनों ने ही अपनी रणनीति बदली है और मुस्लिम समाज में पकड़ बनाने की लगातार कोशिश जारी है।

हाल में मोहन भागवत ने ज़मीअत उलेमा ए हिंद के सदर अरशद मदनी से मुलाक़ात कर मुसलमानों को अपने साथ लाने की कोशिश की।

संघ प्रमुख के बदले तेवर पर मुस्लिम नेताओं ने भी अपना रुख बदला है। महमूद मदनी ने एक बयान में कहा था कि मुद्दे हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं। जब हालात में बदलाव आता है तो लोगों की सोच भी बदलती है। उन्‍होंने कहा कि युद्ध कर रहे दो देश भी बातचीत सो इनकार नहीं करते हैं। लिहाजा बातचीत के रास्‍ते हमेशा खुले रहने चाहिए।

दारा शिकोह को एक आदर्श मुस्लिम मानता है संघ

मुगल सम्राट शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह व उसकी नीतियों को आरएसएस और बीजेपी का समर्थन मिलता रहा है। दारा शिकोह को इस्लाम और वेदांत के एकीकरण की दिशा में काम करने के लिए भी जाना जाता है।

इतिहास के मुताबिक दारा शिकोह ने 52 उपनिषदों का अनुवाद सीर-ए-अकबर (सबसे बड़ा रहस्य) में किया था। दारा शिकोह के जीवन पर हिंदू और सूफी संतों के दर्शन का गहार प्रभाव था। सिंहासन की चाह में औरगंजेब ने बड़े भाई दारा शिकोह का ही कत्ल कर दिया था।

एपीजी अब्दुल कलाम बने रोल मॉडल

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महमूद मदनी का कहना है कि, हमें आज के अच्‍छे हिंदू और मुसलमानों पर बात करनी चाहिए। हालिया अतीत में एपीजे अब्‍दुल कलाम का दौर था। अगर वह अच्‍छे मुसलमान हैं तो उन्‍हें सभी समुदायों के सामने रोल मॉडल की तरह पेश किया जाना चाहिए। हम दाराशिकोह के दौर की ओर क्‍यों जा रहे हैं?

अल्पसंख्यकों में है डर का माहौल

बता दें कि बीजेपी के शासन के दौरान देश में जो माहौल बना है उससे अल्पसंख्यक वर्ग के मन में भय का माहौल बना हुआ है। तीन तलाक़, कश्मीर से धारा 370 को हटाए जाने और मॉब लिंचिंग की घटनाओं ने अल्पसंख्यक वर्ग में वर्तमान सरकार के प्रति असुरक्षा का भाव बना दिया है।

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