Sunday - 5 February 2023 - 7:54 PM

गठबंधन के बाहर क्या है कांग्रेस की उम्मीदें

रतन मणि लाल

कोई समझौता नहीं, फिर भी है. कोई जगह नहीं, फिर भी है. अभी कोई बात नहीं, लेकिन गुंजाईश फिर भी है।

ऐसा तो किन्ही दो गहरे चाहने वालों के बीच ही होता है, और हमारा साहित्य ऐसी कहानियों से भरा हुआ है, लेकिन आजकल की राजनीति में भी ऐसे उदाहरण कम नहीं है।

दो पुराने विरोधियों का सीधी साफ़ तौर पर एक साथ हो जाना तो समझ में आता है, लेकिन कभी हाँ, कभी ना का माहौल बनाये रखना, एक दूसरे पर कभी वार करना, कभी दोस्ती दिखाना, यह तो कोई कांग्रेस और सपा-बसपा से सीखे।

कुछ महीनों पहले जब उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एकजुट होकर, गठबंधन बना कर लोक सभा चुनाव लड़ने का निर्णय घोषित किया, तो एकबारगी सभी के सामने पिछले 22 सालों के वे बयान और आरोप-प्रत्यारोप घूम गए जो इन दलों के बड़े से छोटे नेता एक दूसरे पर लगाया करते थे, लेकिन अब, मजबूत होती भारतीय जनता पार्टी से निबटने के लिए इन दोनों दलों को अपने विरोध दरकिनार कर एक साथ आने का कोई विकल्प नहीं था।

इस एकजुटता का सफल परिणाम पिछले साल हुए गोरखपुर और कैराना उप-चुनाव में देखने को भी मिला. लेकिन तब कांग्रेस इस गठजोड़ से अलग थी, और पार्टी ने ये दोनों चुनाव अलग लडे, और बुरी तरह हारी भी।

इसके बाद सपा की ओर से अखिलेश यादव, और बसपा की ओर से मायावती ने कई मुलाकातों और मंथन के बाद आखिरकार अपने चुनावी गठबंधन को अंतिम रूप दे ही दिया।

समानांतर बातचीत कांग्रेस के साथ होती रही, लेकिन तब तक कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव जीत कर सरकार बना चुकी थी, और राहुल गाँधी अपने नए आत्मविश्वास के साथ कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में मजबूत करने की ठान चुके थे।

इस बीच पदार्पण हुआ प्रियंका गांधी वाड्रा का, जिन्हें राहुल ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए पार्टी का महासचिव नियुक्त किया. उनके आने के बाद तो कांग्रेस और भी उत्साहित हुई, और अकेले दम पर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ कर, पार्टी को मजबूत करने का निर्णय लिया गया.

कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन के बीच कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही और आखिरकार मायावती को स्पष्ट रूप से कहना पड़ा कि उनकी पार्टी किसी भी हालत में कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी। 

जरूरत हुई, गुंजाईश बनी

लेकिन, गुंजाईश तो आखिर जरूरत पर ही बनती है, और निकाली भी जाती है। पुराने रिश्तों और विपक्ष में बिखराव के संकेत न जाएँ, इसलिए गठबंधन ने राय बरेली व अमेठी में अपने उम्मीदवार न खड़े करने का निर्णय लिया।

कांग्रेस ने भी, देर से ही सही, लेकिन अंततः उन सात स्थानों पर उम्मीदवार न खड़े करने का निर्णय लिया जहां से गठबंधन के प्रमुख नेता चुनाव लड़ रहे हैं। अब तक कांग्रेस ने कई स्थानों से उम्मीदवारों की सूची जारी कर भी दी है, और अपने दौ पर ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की तयारी स्पष्ट कर दी है।

उत्तर प्रदेश में आज कांग्रेस की जो स्थिति है, वह कुछ दशकों पहले अकल्पनीय थी। प्रदेश में आखिरी बार कांग्रेस की सरकार वर्ष 1989 में बनी थी, जब स्व नारायण दत्त तिवारी जून 25, 1988 से दिसम्बर 5, 1989 तक प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे। ये तिवारी की इस पद पर तीसरी पारी थी और इसी बीच स्व वीर बहादुर सिंह भी इस पद पर लगभग तीन साल के लिए रहे।

जनता पार्टी के शासन के कुछ वर्षो को छोड़ दें, तो ये वो समय था जब कांग्रेस के अलावा प्रदेश में किसी भी पार्टी के लिए लम्बे समय तक सरकार चलाना आसान नहीं हुआ करता था। न केवल कांग्रेस में तिवारी और वीर बहादुर सिंह के अलावा हेमवती नंदन बहुगुणा, विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्रीपति मिश्र जैसे दिग्गज नेता थे, बल्कि तत्कालीन विपक्षी दलों में सर्वमान्य नेता की कमी थी।

लेकिन 1989 में मुलायम सिंह यादव द्वारा इस पद की शपथ लेने के साथ ही प्रदेश में एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसमे कांग्रेस का महत्त्व न केवल कम होता चला गया, बल्कि पार्टी विधान सभा और लोक सभा चुनावों में भी अपनी जगह गंवाती चली गई।

समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने जिस राजनीतिक स्थान पर अपनी जगह बनाई, वह वास्तव में कांग्रेस ने ही खाली की थी, और इसके लिए अन्य दलों से ज्यादा कांग्रेस स्वयं जिम्मेदार थी। आज भी, यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में एक गंभीर राजनीतिक समूह के तौर पर लोगों को प्रभावित नहीं कर पा रही है, तो इसके लिए अन्य दलों को नहीं, बल्कि कांग्रेस को स्वयं को ही दोष देना चाहिए।

प्रियंका आईं, जोश लाईं

इसीलिए, जब गत जनवरी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए कांग्रेस के महासचिव के रूप में नियुक्त किया, तो कांग्रेस के समर्थकों को ऐसा लगा कि शायद पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व में पार्टी के अन्दर बदलाव लानी की जरूरत को समझा है, और प्रियंका की नियुक्ति के साथ ही अन्य स्तरों पर भी कुछ बदलाव आएंगे जिससे पार्टी मजबूत होगी और लोगों के बीच अपनी पैठ बना पायेगी।

कांग्रेस में अभी भी दम है

लखनऊ में 11 फरवरी को प्रियंका के आगमन पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बड़े उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं में जान फूंकी, सुप्तप्राय नेताओं को जगाने का काम किया, और उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की, कि कांग्रेस में अभी भी दम है। यह सन्देश उस सन्देश से बिलकुल अलग था, जो अखिलेश और राहुल ने अपनी पार्टियों के बीच 2017 के चुनाव-पूर्व समझौते के बाद दिया था। यूपी को ये साथ पसंद है, और युवा जोश, युवा सोच के यूपी में दम है।

यह बात अलग है कि फरवरी की उस यात्रा के बाद प्रियंका का कई बार प्रस्तावित यूपी दौरा निर्धारित हुआ और रद्द हुआ, और आखिरकार वे 17 मार्च को 4-दिवसीय दौरे पर लखनऊ आईं। उन्होंने लखनऊ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में देर तक बैठक कर के 2017 विधानसभा चुनाव के पार्टी प्रत्याशियों के साथ चर्चा की, घोषित हो चुके लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के साथ बैठक की और प्रत्याशियों से लोकसभा चुनाव की तैयारियों का जायजा लिया।

साफ़ है कि इतने सालों से निष्क्रिय पड़ी कांग्रेस में वे जल्द से जल्द जान डालने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो कर आईं। फिर उनका कार्यक्रम प्रयागराज, और वहां से गंगा जल मार्ग द्वारा मिर्ज़ापुर, भदोही, वाराणसी जाने का कार्यक्रम है। इस यात्रा में भदोही के बुनकरों से मुलाकात, मिर्जापुर में माँ विंध्यवासिनी मंदिर का दर्शन, वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर का दर्शन, और अन्य कार्यक्रम शामिल हैं।

थोड़ी नाराजगी तो है

ऐसे संकेत मिलते रहते हैं कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी पार्टी के बसपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस के भी साथ आने के पक्षधर थे। उन्होंने गठबंधन के लिए गंभीर न होने पर कांग्रेस पर आरोप भी लगाये, और स्पष्ट कहा कि कांग्रेस प्रदेश में खुद की जमीन मजबूत करने में पर ज्यादा ध्यान दे रही थी नाकि नरेंद्र मोदी को चुनाव हराने पर। उनका कहना है कि यदि कांग्रेस सच में भाजपा को हराना चाहती थी तो उसे सपा-बसपा गठबंधन में शामिल होना चाहिए था।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रियंका के रूप में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लगता है उन्हें चुनाव जीतने का अकाट्य मंत्र मिल गया है। केवल कांग्रेस ही नहीं, बाकि भाजपा, सपा और बसपा के नेता और चुनाव प्रबंधक भी मानते हैं कि प्रियंका को उत्तर प्रदेश के एक हिस्से के लिए ही सही, लेकिन एक राजनीतिक जिम्मेदारी दिए जाने के बाद कांग्रेस में एक उत्साह का संचार हुआ है, और पार्टी के प्रचार को एक नई दिशा मिलेगी।

प्रियंका के व्यक्तित्व, इंदिरा गाँधी से तुलना

कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि महिलाओं, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बड़े हिस्से पर प्रियंका की उपस्थिति से सकारात्मक असर पड़ेगा। प्रियंका के व्यक्तित्व, इंदिरा गाँधी से तुलना और लोगों से आसानी से घुलमिल जाने की वजह से उनकी चुनाव प्रचार सभाओं में भीड़ बढ़ने की पूरी सम्भावना है और यदि इस भीड़ का एक हिस्सा भी मतदान के समय भी प्रभावित बना रहा, तो कांग्रेस को लाभ होना निश्चित है।

कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में वैसे भी चुनाव प्रचार के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष राज बब्बर व अन्य राज्य स्तरीय नेता स्थानीय राजनीतिक जोड़तोड़ में ही व्यस्त रहते हैं, जिसकी वजह से पार्टी में कोई सक्रिय गतिविधि नहीं दिखती।

ऐसे में प्रियंका के राजनीतिक परिदृश्य पर आने से आम लोगों का कांग्रेस की ओर ध्यान तो जायेगा ही, और स्थानीय नेताओं को काम करने के स्पष्ट निर्देश मिल सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रियंका ने पार्टी के लिए कुछ ख़ास मौकों पर निर्णायक भूमिका निभाई है, और अब उनकी उपास्थिति की वजह से प्रदेश में पार्टी में आन्तरिक अनुशासन सुधर सकता है।

प्रदेश स्तर पर कांग्रेस के नेता पिछले कई सालों से निष्क्रिय होने की वजह से अपने जिलों तक में कोई प्रभाव बना पाने में असमर्थ रहे हैं. प्रियंका के प्रभाव से उनमे कितना बदलाव आएगा यह आने वाले दिनों में दिखना शुरू हो जायेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

 

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