Saturday - 22 January 2022 - 1:29 AM

यूपी की चुनावी राजनीति में पूरब भारी पड़ेगा या पश्चिम ?

उत्कर्ष सिन्हा

बीते 3 चुनावों से यूपी में भाजपा के विजय रथ को तेजी देने वाले पश्चिमी यूपी का मिजाज जैसे जैसे सरकार विरोधी हुआ है , वैसे वैसे भाजपा ने पूरब की तरफ ज्यादा ताकत लगाना शुरू कर दिया है ।

इस बात का अंदाजा ऐसे ही लगता है कि बीते 1 महीने में यूपी के पूर्वाञ्चल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ दौरे किये हैं और घोषणाओं की झड़ी लगा दी है।

किसान आंदोलन के बाद पश्चिम के बदले मिजाज ने भाजपा के पेशानी पर बल जरूर ला दिए हैं और वहाँ जाट बहुलता वाले किसान आंदोलन से उपाजे गुस्से को सम्हालने के लिए भाजपा ने पहले गुर्जर वोटरों को साधने की कोशिश की और अब उस नुकसान की भरपाई पार्टी पूर्वाञ्चल से करने की कोशिश में जुट गई है।

बीते दो लोकसभा चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी ने भाजपा का साथ इस कदर दिया कि चौधरी चरण सिंह की विरासत भी धुंधली पड़ गई थी। 2012 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने इस इलाके में 38 सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन दंगों के बाद बदले राजनीतिक माहौल की वजह से साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था. इसके बाद साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 88 सीटों पर जीत हासिल की। इन तीनों चुनावों में भाजपा को मिली एकतरफा जीत की वजह जाट वोटर थे मगर वही जाट इस बार भाजपा के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं।

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से हुए ध्रुवीकरण ने इस इलाके में दबदबा रखने वाली राष्ट्रीय लोकदल और बसपा की जमीन पूरी तरह से खिसका दी थी नतीजतन इस इलाके में भाजपा को एकतरफा जीत मिलती रही। लेकिन फिलहाल फिज़ा बदल चुकी है और राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में एक बार फिर से माहौल बनता दिखाई दे रहा है।

जाटों के भावनात्मक समर्थन के बाद रलोद के मुखिया जयंत चौधरी ने हाईकोर्ट की बेंच स्थापित करने की घोषणा भी कर दी। इलाके की ये बहुत पुरानी मांग है और इस मामले का बड़ा असर पड़ता है।

भाजपा ने जाटों के नाराजगी की भरपाई करने के लिए गुर्जर दांव खेला है। पश्चिमी यूपी में जाट के बाद सबसे ज्यादा प्रभावी वोटर गुर्जर ही है। इसी रणनीति के तहत गाजियाबाद के दादरी में महाराजा मिहिर भोज की प्रतिमा भी लगाने की बात की। रणनीति ये है कि गुर्जर के साथ कश्यप,सैनी,राजपूत,ब्राहमण आदि जातियों को हिंदूत्व के जरिए लामबंद किया जाए, मगर समस्या ये है कि गुर्जर वोटरों का प्रभाव अधिकतम 15 सीटों पर ही प्रभावी हो सकता।

पश्चिम के नुकसान की भरपाई करने के लिए भाजपा ने पूरब का रुख किया है। खुद मुखमंत्री योगी भी इसी इलाके से आते हैं और उनका बड़ा असर भी पूरब में माना जाता है। बीतेचुनावों में जातीय गँठजोड़ का सबसे जबरदस्त प्रयोग भी इसी इलाके में हुआ था और उसके नतीजे भी भाजपा के पक्ष में गए थे। लेकिन इस बार उस गठबंधन की तस्वीर काफी अलग है। भाजपा के पुराने साथी ओम प्रकाश राजभर अब सपा के साथ है तो संजय निषाद के रूप में भाजपा को नया साथी मिल गया है। राजभर वोटों का ज्यादा केंद्रण गाजीपुर, मऊ, बलिया और देवरिया की सीटों पर है लेकिन पूरब की करीब 30 और सीटें ऐसी हैं जहां राजभर वोटरों की संख्या पाँच हजार से ले कर बीस हजार तक हैं जिनपर ओम प्रकाश राजभर का प्रभाव माना जाता है। गाजीपुर, मऊ, बलिया और देवरिया पहले समाजवादी पार्टी के मजबूत किले रहे हैं और अब राजभर के साथ आने से सपा वहाँ वापस मजबूत हो सकती है।

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भाजपा के नए साथी संजय निषाद की पार्टी के वोटर भी पूरी गंगा पट्टी में है। हालांकि निषाद बिरादरी के भीतर कई और स्थानीय नेता अपनी अपनी छोटी पार्टियां बना कर समाजवादी पार्टी के झंडे में आ गए हैं।

पूर्वाञ्चल एक्सप्रेस वे, नई चीनी मिले, कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट और बड़ी संख्या में मेडिकल कालेज के जरिए भाजपा पूर्वाञ्चल में किये अपने विकास कार्यों को शोकेस करने में जुटी हुई है। इसके अलावा एंटी इंकमबेनसी फैक्टर को कम करने के लिए करीब 100 सीटों पर अपने प्रत्याशी बदलने की रणनीति पर काम कर रही है।

जिस तरह से चुनावी बिसात बिछाई जा रही है उससे फिलहाल तो यही लग रहा है कि आने वाले चुनावों में भाजपा अपने ताकत पूरब में ज्यादा लगाने जा रही है।

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