डंके की चोट पर : हमें याद नहीं कुछ सब भूल गए

शबाहत हुसैन विजेता

हमें याद नहीं हैं वह पैदल लौटते मजदूर. सड़कों पर छप गए उनके खून सने पैरों के निशान कब के मिट चुके हैं. हमें याद नहीं है शाहीनबाग और लखनऊ के घंटाघर पर हज़ारों की तादाद में औरतें किस वजह से कई महीने तक मीटिंग करती रही थीं और जब कोरोना आया था तब वह अपनी मीटिंग अधूरी छोड़कर अपने घरों को वापस लौट गई थीं.

हमें याद नहीं है कि एक रिटायर्ड पुलिस अफसर को पुलिस ने किस जुर्म में जेल में ठूस दिया था जबकि उसकी बीवी कैंसर की मरीज़ थी और घर के बिस्तर पर दवा का इंतज़ार कर रही थी. हमें याद नहीं है कि लखनऊ में सबका चहीता सोशल एक्टीविस्ट दीपक कबीर को किस वजह से लखनऊ के हजरतगंज थाने में पुलिस वाले अपनी चमड़े की बेल्ट से पीट रहे थे.

हमें याद नहीं है कि सोशल एक्टीविस्ट सदफ जाफर को एक महिला पुलिस अफसर ने किस बात पर तमाचा जड़ दिया था. हमें याद नहीं है कि सोसायटी के शरीफ लोगों की तस्वीरों वाले होर्डिंग शहर के चौराहों पर इस तरह से क्यों लगाए गए थे जैसे कि वह तड़ीपार हों और उनके शहर में घुसने की खबर पुलिस को दी जानी चाहिए.

हमें याद नहीं है कि महामारी के दौर में हुए इलेक्शन में कौन-कौन से नेता कुर्सी की हवस में इंसानी जिंदगियों को दांव पर लगा रहे थे. हमें याद नहीं है कि कभी आक्सीजन की कमी की वजह से बड़ी तादाद में लोग मर गए थे. पता नहीं किसने यह अफवाह उड़ाई थी. बाद में हुकूमत को खुद बताना पड़ा था कि आक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा था.

हमें याद नहीं है कि कभी पेट्रोल 100 रुपये से भी महंगा बिका है. हमें याद नहीं है कि प्याज कभी 200 रुपये से ज्यादा में बिकी है. हमें याद नहीं है कि अस्पतालों ने लाशें देने से पहले बीस-बीस लाख रुपये जमा करवाए हैं क्योंकि हुकूमत तो खुद ही मुफ्त में इलाज करवाती रही है.

हमें याद नहीं है कि कोई एमएलए ताजिया दफ्न करने वालों को दफ्न कर देने पर उतारू हो गया हो. हमें याद नहीं है कि सियासत ने इंसान-इंसान में मज़हब के हिसाब से फर्क किया हो. हमें याद नहीं है कि किसी को कभी लाउडस्पीकर की आवाज़ से परेशानी हुई हो. हमें याद नहीं है कि किसी ने खानपान पर उंगली उठाई हो. हमें याद नहीं है कि पहनावे की वजह से किसी को स्कूल में न घुसने दिया गया हो. हमें याद नहीं है कि किसी को मज़हब बदलने के लिए मजबूर किया गया हो. हमें याद नहीं है कि माब लिंचिंग का क्या मतलब होता है.

हमें याद नहीं है कि क़ानून तोड़ने वालों को कभी इज्जत मिली हो. हमें याद नहीं है कि रेपिस्ट की हिमायत में सियासत खड़ी हुई हो. हमें याद नहीं है कि माँ-बाप से छीनकर पुलिस ने कोई बेटी जला दी हो. हमें याद नहीं है कि किसी बहू को विदेशी कहा गया हो. हमें याद नहीं है कि शहीद के बच्चो की बेइज्जती की गई हो.

हमने तो हमेशा सियासत को झुके हुए अंदाज़ में देखा है. हमें हमेशा से बताया जाता रहा है कि मेवे की डाल झुकती है. फल से लदी डालियों को हमने हमेशा झुकते हुए ही देखा है. हमें यह बात हमारे बुजुर्गों ने बताई कि लाल बहादुर शास्त्री की माँ को कभी यह पता नहीं चल पाया कि उनका बेटा प्राइम मिनिस्टर है, क्योंकि उन्हें ऐसा पता चल जाता तो वह किसी की सिफारिश कर सकती थीं. माँ कुछ कह देतीं तो उनकी बात सबसे ऊपर होती और क़ानून को पीछे छोड़ना पड़ जाता.

हमें याद है कि जब होम मिनिस्टर मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद की बेटी को छोड़ने के एवज़ में टेरोरिस्ट छोड़े गए थे तो प्रियंका गांधी ने राजीव गांधी से कहा था कि मेरा किडनैप हो जाए तो मुझे मर जाने देना किसी टेरोरिस्ट को मत छोड़ना.

हमें याद है कि जब टेरोरिज्म अपने शबाब पर था तब प्राइम मिनिस्टर विश्वनाथ प्रताप सिंह खुली जीप में पंजाब की सड़कों से गुज़रे थे. प्राइम मिनिस्टर से हटने के बाद उन्होंने सेक्योरिटी भी यह कहते हुए छोड़ दी थी कि ऐसे ही रहना है तो फिर रहना ही क्या ज़रूरी है.

हमें याद है कि आम आदमी के एक ट्वीट पर मदद के हाथ बढ़ा देती थीं सुषमा स्वराज. हमें याद हैं ऐसे बहुत से लीडर जिन्हें पोस्टकार्ड भेज देने पर इन्साफ मिल जाता था.

अच्छाइयां कभी मरती नहीं हैं. अच्छाइयां कभी मिटती नहीं हैं. मदद करने वाले हाथों की गर्मी हमेशा महसूस होती है. बुज़ुर्ग औरत का हाथ पकड़कर सड़क पार कराने वाला सिपाही हमेशा ज़ेहन में रहता है मगर लाठियों से भीड़ को पीटने वाले की शक्ल ज़ेहन में धुंधली होते-होते मिट जाती है.

नफरत का ज़हर बोकर कुर्सी एक बार मिल जाती है, दो बार मिल जाती है. तीन बार मिल जाती है मगर राजघाट पर सो रहे बापू जैसी इज्जत सदी में किसी एक को ही मिलती है. इलेक्शन का जोर चल रहा है. नफरत बांटने वाले सेफ कुर्सियां तलाश रहे हैं. सेफ पार्टियाँ तलाश रहे हैं. शास्त्री जी का नवासा जो हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सूबे का वजीर है वह टीवी स्क्रीन पर यह मानने लगा है कि हुकूमत मलाई चाटने के लिए होती है. चाटो मलाई, खूब चाटो, तुम्हारे नाना फटी धोती में ज़िन्दगी गुज़ार गए और आज भी एक्ज़ाम्पिल हैं तुम रोज़ सूट बदलते हो मगर यादों से भटक जाओगे यह तय है.

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