Wednesday - 1 February 2023 - 3:30 PM

बड़ी पार्टियों के लिये करारा सबक हैं चुनाव के नतीजे

कृष्णमोहन झा

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभाओ के नतीजे घोषित हो चुके है। नतीजों के बाद महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद की बागडोर भाजपा के हाथों में रहना लगभग तय हो गया है। उसमें भी संशय कि कोई गुंजाइश नहीं है कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद पर दोबारा वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ही आसीन होंगे।

महाराष्ट्र में भाजपा ने चुनाव के पूर्व ही यह घोषणा कर दी थी, इसलिए माना जा सकता है कि राज्य के मतदाताओं ने इन चुनावों में वर्तमान मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही अपना भरोसा जताया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नाम तो यह रिकॉर्ड दर्ज हो गया है कि वे 45 साल बाद महाराष्ट्र में लगातार पूरे 5 वर्षों तक का कार्यकाल पूरा करने का सौभाग्य अर्जित कर चुके है। इसके पहले वसंतराव नाईक ऐसे मुख्यमंत्री रहे है, जिन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना एक कार्यकाल पूरा किया था।

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के पहले ही यह घोषणा कर दी थी देवेंद्र फडणवीस ही भाजपा व शिवसेना गठबंधन की नई सरकार के मुख्यमंत्री होंगे। भाजपा ने हरियाणा में भी वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था ,परंतु भाजपा हरियाणा में महाराष्ट्र जैसी चमकदार जीत हासिल करने में सफल नहीं रही, जबकि कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व में उपजे असंतोष ने वहां कांग्रेस की चिंताओं को बढ़ा दिया था।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा की नियुक्ति के फैसले से नाराज पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने पार्टी से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। उन्होंने शैलजा पर टिकटों के वितरण में धांधली करने का आरोप लगाया था। इसके बावजूद कांग्रेस ने अपनी लाज बचाने में सफलता पाई है तो इसका कुछ श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को दिया जा सकता है, जिन्हें पार्टी ने भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था।

हरियाणा में चुनाव परिणामों पर भाजपा की निराशा स्वभाविक है, क्योंकि भाजपा ने महाराष्ट्र की भांति यहां भी है मान लिया था कि उसके पास ही सत्ता की बागडोर रहेगी। महाराष्ट्र में शिवसेना व भाजपा गठबंधन के मुकाबले में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी गठबंधन किया था, परंतु चुनाव प्रचार के दौरान भी दोनों पार्टियों के बीच नोकझोंक का सिलसिला जारी रहा, जिसका मतदाताओं पर अच्छा असर नही पड़ा।

कांग्रेसी व एनसीपी गठबंधन के नेताओं ने चुनाव पूर्व में ही इस कड़वी सच्चाई को महसूस कर लिया था कि भाजपा व शिवसेना गठबंधन से सत्ता छीनने की कल्पना भी असंभव है। इसलिए वे सशक्त विपक्ष बनने के लिए चुनाव मैदान में उतरा था। काफी हद तक उसकी यह मंशा पूरी हो गई है।

अब देखना यह है कि नई विधानसभा के अंदर दोनों पार्टियां अपने तालमेल को मजबूत करने में कितनी दिलचस्पी प्रदर्शित करती है। राज्य में भाजपा ने शिवसेना के साथ अपने गठबंधन में अपनी बड़े भाई की भूमिका को बरकरार रखा है और चुनाव के बाद बनने जा रही गठबंधन सरकार में उसकी हैसियत बरकरार रहना लगभग तय है। शिवसेना इस बार गठबंधन का घटक होने के नाते पहले से अधिक महत्वपूर्ण विभागों की मांग नई सरकार में कर सकती है।

गौरतलब है कि गत विधानसभा चुनाव के पूर्व ही दोनों पार्टियों का दो दशक पुराना गठबंधन टूट गया था और दोनों ने अपने अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ा था, परंतु भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई और उसे बाद में शिवसेना के साथ समझौता करना पड़ा था।

भाजपा ने इस चुनाव में भी अकेले अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेने का स्वप्न संजोए रखा था, ,परंतु उसका सुनहरा सपना साकार नहीं हो सका। इसलिए जाहिर सी बात है कि शिवसेना इस बार अपनी शर्तों में इजाफा कर सकती है।

वैसे अगर बागियों ने खेल नहीं बिगाड़ा होता तो गठबंधन की तस्वीर कुछ और अच्छी हो सकती थी, फिर भी लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने में कामयाब होना भी दोनों दलों के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि है।

भाजपा को उम्मीद थी कि इस विधान सभा में चुनाव में उसकी अपनी सीटें 150 से अधिक हो जाएगी ,परंतु उसे पिछली बार अर्जित 122 सीटों से कम सीटों पर संतोष करना पड़ा है। यही वजह है कि शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की मांग पेश करने में देर नहीं लगाई।

हालांकि यह तय है कि भाजपा उसकी मांग स्वीकार नहीं करेगी, परंतु अपनी पुरानी स्थिति बरकरार रखने में सफल शिवसेना की कुछ शर्ते मानने के लिए उसे विवश होना पड़ सकता है।

अगर ऐसा हुआ तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दोबारा आसीन हो जाने के बाद भी देवेंद्र फडणवीस की राह आसान नहीं होगी। राज्य सरकार में नई सरकार का मुख्यमंत्री पद चाहे जिस पार्टी को मिले, परंतु कड़वी हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकता है कि राज्य में कांग्रेस एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन की ताकत में इजाफा उसके लिए आगे चलकर चिंता का कारण बन सकता है।

इधर हरियाणा में सरकार के मंत्री और प्रभावशाली नेताओं का चुनाव हारना इस बात का संकेत है कि जनता खट्टर के कामकाज से इतनी खुश नहीं थी ,जितनी खुशफहमी उन्होंने पाल रखी थी। खट्टर के विवादास्पद बयानों ने भी भाजपा की स्थिति को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। राज्य में बेरोजगारी का मुद्दा भी भाजपा को भारी पड़ गया।

भाजपा ने यहां भी महाराष्ट्र की भांति राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था, परंतु उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। चौटाला परिवार में मतभेद के फलस्वरुप जन्मी जननायक जनता पार्टी इस चुनाव में किंग मेकर के रूप में उभरी है और जेजेपी की भूमिका नई सरकार के गठन में महत्वपूर्ण होगी। अगर भाजपा यहां सरकार बनाने में सफल हो भी जाती है तो भी वह हमेशा खतरे से जूझती रहेगी।

सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि मात्र पांच महीने पूर्व घोषित लोकसभा चुनाव के नतीजों में हरियाणा की 10 में से 10 सीटें भाजपा की झोली में चली गई थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय पार्टी को अपेक्षित सफलता मिलने की सबसे बड़ी वजह यह मानते हैं कि पार्टी अपना मैनेजमेंट प्रभावी तरीके से नहीं कर पाई है।

पार्टी द्वारा जनता तक अपनी बात पहुंचाने में कहीं कोई कमी रह गई। वैसे हरियाणा में भाजपा को जश्न मनाने से वंचित रहना पड़ा तो इसकी एक वजह यदि मानी जा सकती है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भाजपा के चुनाव प्रचार का लोकप्रिय चेहरा साबित नहीं हो सके।

दरअसल पिछले चुनाव के पूर्व तक तो मनोहर लाल खट्टर की कभी राज्य में भाजपा के कद्दावर नेताओं में गणना नहीं हो पाई थी। वे मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने कदमों से करिश्माई लोकप्रियता के धनी बनने में सफल नही हो पाए।

लगभग पांच माह पूर्व संपन्न लोकसभा चुनाव में 300 से अधिक सीटें जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र एवं हरियाणा विधानसभा में लगातार दूसरी बार शानदार जीत हासिल करने का जो सुनारा स्वप्न संजोए रखा था उसके साकार ना हो पाने का मलाल पार्टी को अवश्य सता रहा है।

उसे पूरी उम्मीद थी कि केंद्र में राजग सरकार की दूसरी पारी में अनुच्छेद 370 की समाप्ति जैसा साहसी कदम इन दोनों में उसे जनता का अभूतपूर्व समर्थन दिलाने में सहायक सिद्ध होगा ,परंतु वह मतदाताओं के मूड का अंदाजा लगाने में असफल रही। दोनों ही राज्यों में उसने राष्ट्रवाद को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था ,परंतु चुनावी नतीजों को महाराष्ट्र व हरियाणा के स्थानीय मुद्दों ने कहीं अधिक प्रभावित किया।

इधर यह चुनाव नतीजे कांग्रेस को नई ऊंचाई प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेसी खेमे में छाया हर्ष एक बार फिर सोनिया गांधी के पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इन नतीजों के बाद भाजपा को भी विचार करना होगा कि कहीं वह अतिआत्मविश्वास का शिकार तो नहीं बनती जा रही है।

हरियाणा में जननायक जनता पार्टी को मिली सफलता ने भी यह संदेश दिया है कि क्षेत्रीय पार्टियों की प्रासंगिकता भारतीय राजनीति में पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

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