UP: स्वास्थ्य भवन में ऑडिट या वसूली का तंत्र?

सेवानिवृत्ति से पहले विवादों में घिरे मुख्य संप्रेक्षा अधिकारी
जिलों से लेकर मुख्यालय तक उठ रहे गंभीर सवाल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार जहां एक तरफ वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत कड़े निर्देश जारी कर रही है, वहीं स्वास्थ्य विभाग का आंतरिक संप्रेक्षा (ऑडिट) तंत्र स्वयं गंभीर आरोपों के घेरे में है।

विभिन्न जिलों से आ रही शिकायतें, कर्मचारियों का बढ़ता आक्रोश और विभागीय सूत्रों से मिले इनपुट इशारा कर रहे हैं कि वित्तीय अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए बनी यह व्यवस्था अब खुद विवादों का केंद्र बन चुकी है।

ऑडिट के नाम पर वसूली के आरोप: जिलों में आक्रोश
आजमगढ़ में प्रदर्शन:हाल ही में आजमगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय पर तृतीय श्रेणी कर्मचारियों ने ऑडिट टीम के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और ज्ञापन सौंपा। कर्मचारियों का सीधा आरोप है कि ऑडिट के नाम पर अनावश्यक दबाव बनाकर ‘वसूली का माहौल’ तैयार किया जा रहा है।
स्थानीय स्तर पर प्रताड़ना:स्थानीय समाचार पत्रों के अनुसार, कर्मचारियों का कहना है कि जिन खरीद और भुगतानों के निर्णय उच्च स्तर (मुख्यालय) से होते हैं, उनकी जिम्मेदारी भी जबरन स्थानीय कर्मचारियों पर डालकर उन्हें कार्रवाई की धमकी दी जा रही है।
उन्नाव में नियमों की धज्जियां:शासन द्वारा खर्चों में कटौती और अनावश्यक दौरों पर रोक के स्पष्ट निर्देश हैं। इसके बावजूद उन्नाव सहित कई जिलों में ऑडिट टीमों के लगातार हो रहे दौरों और उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

  1. ‘रिटायरमेंट’ से पहले बढ़ी सक्रियता और ‘अटैचमेंट’ का खेल : विभागीय गलियारों में चर्चा है कि मुख्य संप्रेक्षा अधिकारी की सेवानिवृत्ति में अब कुछ ही महीने शेष हैं, जिसके चलते हाल के दिनों में ऑडिट गतिविधियों में अप्रत्याशित तेजी आई है।
    गैर-अनुभवी कर्मियों की तैनाती: सबसे बड़ा सवाल अन्य विभागों से कर्मचारियों को स्वास्थ्य विभाग में ‘संबद्ध’ (Attach) करने पर उठ रहा है। जिन कर्मचारियों को स्वास्थ्य विभाग की जटिल वित्तीय प्रक्रियाओं, एनएचएम (NHM) फंड्स, स्टोर इन्वेंट्री, दवा वितरण और उपभोग प्रणाली का कोई ककहरा नहीं पता, उन्हें ऑडिट की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। ऐसे में ऑडिट की शुचिता और गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजमी है।
  2. ‘कागजी खानापूर्ति’: 48 घंटे से कम समय में दर्जनों ब्लॉकों का ऑडिट!
    मीडिया रिपोर्टों से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है जो पूरे ऑडिट तंत्र को कठघरे में खड़ा करता है: तय कार्यक्रम: आजमगढ़ के सीएमओ कार्यालय, दो 100-बेड अस्पतालों (अतरौलिया व तरवां) समेत 22 ब्लॉकों के अंतर्गत आने वाले 40 से 50 CHC/PHC** का ऑडिट 18 मई से 23 मई के बीच होना तय था।
    वास्तविक स्थिति:अन्य विभाग से अटैच ऑडिटर (नीरज कुमार मद्धेशिया और कपिलदेव) तय तारीख के बजाय 19 मई की शाम को आजमगढ़ पहुंचे। उन्होंने 20 मई को ‘कागजी खानापूर्ति’ की और 21 मई की सुबह 12 बजे से पहले ही होटल से चेक-आउट कर वापस लौट गए।
  1. प्रशासनिक झोल: ‘तीन में से दो ही जाएं’ का संदिग्ध आदेश : इस पूरे मामले में सबसे संदिग्ध प्रशासनिक आदेश मुख्य संप्रेक्षा अधिकारी राधेश्याम द्वारा 25 मई 2026 को जारी पत्र में देखने को मिला। सीएमएस (उन्नाव) और मोरवां व बीघापुर के 100 शैया अस्पतालों को संबोधित इस पत्र में लिखित निर्देश दिया गया कि यदि उपरोक्त संप्रेक्षा-दल के तीनों सदस्यों में से कोई दो भी सदस्य उपस्थित होकर उक्त संप्रेक्षा-कार्य संपादन करता है, तो उन दोनों वरिष्ठ संप्रेक्षकों से संप्रेक्षा-कार्य संपादित करवाना सुनिश्चित करें…”

वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, तीन सदस्यीय टीम में से ‘दो के ही जाने’ का यह लिखित अनियमित रास्ता देना बेहद असामान्य है। यह आदेश किस मंशा से जारी किया गया और इसके पीछे क्या खेल है, यह जांच का विषय है।

  1. गुणवत्ता शून्य और डॉक्टर बने आसान शिकार : फॉरवर्डेड फॉर्मेट का खेल:स्टेट इंटरनल ऑडिट का मूल उद्देश्य जोखिमों का विश्लेषण और सुधारात्मक सुझाव देना था। लेकिन अब यह केवल एक पूर्व-निर्धारित प्रारूप (फॉर्मेट) में आंकड़े भरकर कोरम पूरा करने तक सिमट गया है। वर्षों से इन रिपोर्टों की कोई स्वतंत्र समीक्षा नहीं हुई।
    NOC का दबाव: स्वास्थ्य विभाग में अधिकांश आहरण-वितरण अधिकारी (DDO) चिकित्सक या चिकित्सा अधीक्षक होते हैं। सेवानिवृत्ति के समय ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (NOC) अटकने के डर से डॉक्टर ऑडिट आपत्तियों को लेकर बेहद संवेदनशील और डरे रहते हैं। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उन्हें सबसे आसान टारगेट बनाया जाता है।

आंतरिक लेखा परीक्षा निदेशालय में आए नए निदेशक के सामने अब इस भ्रष्ट और शिथिल हो चुके तंत्र को सुधारने की बड़ी चुनौती है।

उम्मीद की जा रही है कि वह अधीनस्थ विभागों में चल रहे इस खेल पर लगाम कसेंगे, ऑडिट रिपोर्टों की गुणवत्ता की जांच करेंगे और जारी की जा रही रफ़शीट की स्वतंत्र समीक्षा करवाएंगे।

(अगले अंक में पढ़ें: आंतरिक संप्रेक्षा अनुभाग में वर्षों से जमे ऑडिटर्स का ‘रोटेशन न होना’ और खुली छूट के पीछे की इनसाइड स्टोरी।)

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