Saturday - 22 January 2022 - 2:51 AM

विकलांगता की सीमाओं में हमे बंधे रहना मंजूर नहीं, मंजिल तो हम पा लेंगे मंजिल हम से दूर नहीं

वनि लखेरा को 2012 में एक कार दुर्घटना में घायल होने के कारण व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा, लेकिन सोमवार को पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने के बाद उन्हें लगता है कि जैसे कि वह दुनिया में शीर्ष पर हैं…

जुबिली स्पेशल डेस्क

जिंदगी में अक्सर कई लोग ऐसे होते हैं जो किसी हादसे का शिकार होने के बाद बिस्तर पर पड़ जाते हैं। इतना ही नहीं इन लोगों को ऐसा लगता है कि पलभर में उनकी जिंदगी खत्म हो गई ।

दूसरों के रहमों करम पर अब जीना होगा लेकिन इन्हीं लोगों में से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इसके बावजूद भी हार नहीं मानते हैं और आज अपनी हिम्मत और मेहनत के बल पर देश का झंडा बुलंद कर रहे हैं। कुछ इसी तरह की कहानी है गोल्डन गर्ल अवनि लखेरा की है।

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11 साल की उम्र में एक्सीडेंट हुआ और फिर रीढ़ की हड्डी में गभीर चोट आई थी। इसके बाद वो हमेशा-हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गईं। तब लगा था कि अवनि लखेरा का सबकुछ खत्म हो गया था लेकिन भगवान को तो कुछ और मंजूर था।

अब अवनी दिव्यांगों के लिए मिसाल बनती जा रही है। हादसे की वजह से उनको व्हीलचेयर पर भले ही आना पड़ा हो लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने हार नहीं मानी और आज अपनी हिम्मत और मेहनत के बल पर टोक्यो पैरालंपिक्स में भारत की अवनि लखेरा ने शूटिंग में गोल्ड मेडल जीत लिया है।

पैरालंपिक्स के इतिहास में भारत का शूटिंग में ये पहला गोल्ड मेडल है। 19 साल की अवनि ने महिलाओं के आर-2 10 मीटर एयर राइफल के क्लास एसएच1 में पहले नम्बर रहते हुए सोना जीतने में कामयाबी हासिल की है।

उनके सोना जीतने पर पूरे भारत में जश्न का माहौल है लेकिन लखनऊ के कई ऐसे दिव्यांग खिलाड़ी जो अब उन्हीं की तरह बनना चाहते हैं। उनका यह पदक अब कई खिलाडिय़ों को एक अलग राह दिखाता नजर आ रहा है।

अवनि ने नवंबर 2019 में एक इंटरव्यू में कहा था कि पैरालंपिक्स खेलों में भारत के लिए पदक जीतना चाहती है और उन्होंने इसे सच साबित कर दिया है।

कौन है अवनि

8 नवंबर 2001 को राजस्थान के जयपुर में जन्मीं अवनि की जिंदगी में एक वक्त ऐसा भी आया था जब लग रहा था सबकुछ खत्म हो गया था। 2012 की बात है जब अविन की उम्र केवल 11 साल की थी तब एक कार एक्सीडेंट में उनकी रीढ़ की हड्डी में गभीर चोट आई थी।

इस वजह से उन्हें हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी कमजोरी को पीछे छोड़ते हुए न सिर्फ पढ़ाई की बल्कि शूटिंग पर भी पूरा फोकस किया।

क्यों चुना शूटिंग

अवनि के पिता चाहते थे उनकी बेटी खेलों में अपना हाथ अजमाये और इसका नतीजा यह रहा कि उनके पिता ने उनसे कहा कि वो शूटिंग और तीरंदाजी दोनों में किसी एक खेल पर अपना फोकर करे।

हालांकि उन्होंने शूटिंग में अपना करियर बनाया। शूटिंग क्यों चुना इसके पीछे भी बड़ी वजह है। बताया जाता है कि अवनि ने अभिनव बिंद्रा की बायोग्राफि ‘अ शॉट एट हिस्ट्री’ पढ़ी, जिसके बाद शूटिंग के प्रति वो और ज्यादा गंभीर हो गई।

अभिनव बिंद्रा ने अवनि को ट्वीट कर गोल्ड मेडल जीतने पर बधाई दी है. ‘गोल्ड है..भारत को निशानेबाजी में पहला पैरालंपिक स्वर्ण पदक दिलाने के लिए @AvaniLekhara का शानदार प्रदर्शन.. बेहद गर्व. इतिहास में आपके शॉट के लिए बहुत-बहुत बधाई..’

इसके बाद अवनि ने 2015 में जयपुर के जगतपुरा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से शूटिंग की ट्रेनिंग शुरू की और इसके बाद पीछे मुडक़र कभी नहीं देखा।

अवनि के सफर पर एक नजर

2015 में अवनि ने अपनी ट्रेनिंग शुरू की और राजस्थान स्टेट चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया और शानदार प्रदर्शन करते हुए सोना जीता। उन्होंने अपने कोच से राइफल उधार ली और शानदार प्रदर्शन् करने लगी।

नेशनल चैम्पियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर अवनिने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। 2016 से 2020 के बीच अवनि ने नेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप में 5 बार गोल्ड मेडल जीतकर सबको चौंका डाला। इसके बाद अवनि ने संयुक्त अरब अमीरात में विश्व कप 2017 में भारत की तरफ से पदार्पण किया था।

क्या कहना है दिव्यांग खिलाडिय़ों का

उनके स्वर्ण पदक जीतने पर लखनऊ में जश्न का माहौल है। इस बार भारतीय पैरा टीम टोक्यो 2020 में  न केवल सबसे ज्यादा पदक जीतेगी बल्कि सारे रिकार्ड भी तोड़ेगी मेरा ये मानना है की भारत सरकार की नीतियों को उत्तर प्रदेश सरकार को भी लागू करना चाहिए ओलंपिक की तैयारी कर रहे खिलाड़ियों को टॉप्स में सम्मालित कर उनकी ट्रेनिंग उच्च स्तर से करने के बारे में सोचना चाहिए । मैं तो आपके माध्यम से सभी से यही अपील करूंगा की दिव्यांग खिलाड़ियों को अच्छी सुविधा की जरूरत है उनका सहयोग करे ।

अबू हुबैदा (लक्ष्मण अवार्ड विजेता) (अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी व अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता)
मैं सभी से यही कहूंगा दिव्यांग किसी से कम नहीं होते बस सामान्य खिलाड़ियों की तरह उन्हें सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि वह भी समाज में अपनी भागीदारी साबित कर सके …  विक्रम नाग (अंतरराष्ट्रीय पैरा क्रिकेटर) दिव्यांग होना कोई अभिशाप नही होता है अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाएं मोनू चौरसिया (राष्ट्रीय क्रिकेटर)
दिव्यांग खिलाड़ियों में प्रतिभा की कोई कमी नही होती है बस उनको मौके की तलाश है राज्य उन्हें अच्छी से अच्छी सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि हमारे प्रदेश की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी रहे ।
विकलांगता की सीमाओं में हमे बंधे रहना मंजूर नहीं,
मंजिल तो हम पा लेंगे मंजिल हम से दूर नही” …अंतर्राष्ट्रीय पैरा क्रिकेट टीम मैनेजर राष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी 3 टाइम स्टेट अवार्डी
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