Saturday - 31 July 2021 - 11:38 PM

क्रान्तिकारियों सरीखी अहम रही स्वतंत्रता आंदोलन में नाट्य लेखकों की भूमिका

जुबिली न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ। स्वाधीनता संग्राम में क्रान्तिकारियों, राजनेताओं की तरह लेखकों- नाटककारों की भूमिका भी राष्ट्रीय चेतना जगाने और देश को आजाद कराने में उल्लेखनीय रही है। विभिन्न मुद्दों पर चेतना जाग्रत करने का ऐसा ही कार्य रचनाधर्मी लेखन में आज भी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत ‘स्वतंत्रता आंदोलन में नाट्य लेखन की भूमिका’ विषय पर आयोजित वेबिनार में कुछ ऐसे ही विचार प्रतिभागी लेखकों ने व्यक्त किया।

वेबिनार में विद्वान लेखकों का स्वागत करते हुए अकादमी के सचिव तरुण राज ने कहा कि आज का विषय कई दृष्टियों से अहम है। आजादी के लिए किसान, नेता, मजदूर, कलाकार, साहित्यकार सब अपने-अपने तरह से आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। बेंगलुरु सहित कई विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम का हिस्सा बने नाटक ‘अलख आजादी की’ और बहुचर्चित नाटक ‘सिंहासन खाली है’ के लेखक सुशील कुमार सिंह ने कहा कि उस दौर में एक ओर हम गोरों के अत्याचार और स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे तो दूसरी ओर अपनी रूढ़ियों से आजादी के लिए भी जूझ रहे थे।

ऐतिहासिक तथ्य व उदाहरण रखते हुए उन्होंने कहा कि तब पारसी थियेटर में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले सिकंदर-पोरस जैसे नाटक लिखे गये तो भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा जैसे प्रतीकात्मक बिम्बों वाले नाटक लिखे, जहां विदूषक सरीखे पात्र टीका-टिप्पणी कर लोगों को यथार्थ से परिचित कर चेताते थे। गीत भी खूब रचे गये। साथ ही भारतेन्दु ने जाति परमो धर्मः व वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति जैसे नाटक रचकर रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया। यहां अंग्रेजों ने व्यापार के लिए मानवीयता को तार-तार किया और इसी दमन के खिलाफ आजादी से पहले बहुत से नाटक लिखे गये। अपने रचनाकर्म का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इतने संघर्षों से मिली आजादी को आज कई मायनों में संरक्षित करना हमारे लिए आवश्यक है।

सत भासे रैदास जैसे अनेक नाटक रचने वाले राजेशकुमार ने वैश्विक आंदोलनों में प्रतिरोध की संस्कृति को रेखांकित करते हुए बताया कि भारत में 1857 से पहले रंगकर्म में ऐसा प्रतिरोध नहीं था। पारसी शैली के नाटक पूर्वार्ध में सत्ता के साथ रहे। किसान विद्रोह पर आधारित 1876 में लखनऊ में हुए नाटक ‘नीलदर्पण’ के प्रदर्शन को रोका गया। इसके बाद अंग्रेजों द्वारा ड्रामेटिक पर्फामेंस एक्ट लाना इस बात का प्रमाण है कि अंग्रेज नाटकों और रंगमंच के प्रभावों से किसकदर भयभीत थे। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, आगा हश्र कश्मीरी, नारायण प्रसाद बेताब, राधेश्याम कथावाचक, श्रीकृष्ण पहलवान, विजन भट्टाचार्य, अली सरदार जाफरी, भीष्म साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास आदि के नाटकों का जिक्र किया।

लेखक विजय पण्डित ने यह मानते हुए अपनी बात रखी कि उस दौर में नाट्य लेखन ही नहीं, सहीं सम्पूर्ण रंगकर्म स्वाधीनता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाला रहा है। शचीन्द्रनाथ टैगोर रचित बांग्ला नाटक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तब गीत अनिवार्य तत्व के रूप में नाटकों का हिस्सा होते थे। पहले बंगाल, हिन्दी परिक्षेत्र और फिर मराठी क्षेत्र आदि सभी जगह लेखन व रंगमंच में समानांतर प्रतिरोध शुरू हुआ। यहां नौटंकी जैसे लोकनाटकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तिलक जैसे राजनेता भी नाट्य दलोें को बहुत महत्व देते थे।

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अंतिम वक्ता लेखक संगम पाण्डेय ने अंग्रेजों द्वारा शोषण की दोहरी भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि ब्रिटिश राज के कारण ही यहां आधुनिकता के उपक्रम विकसित हुए। 1857 के आसपास अंग्रेजों द्वारा शोषण चरम पर था। यद्यपि इससे पहले मुगलकाल में भी अत्याचार खूब हुआ किन्तु रस, छंद से निकलकर भारतीय रंगमंच मं यथार्थवाद का आरम्भ नीलदर्पण से हुआ। गोविंदराम सेठी शाद, बेचैन शर्मा उग्र व किशनचन्द्र जेबा के नाटकों की चर्चा भी उन्होंने इसी संदर्भ में की। अंत में वेबिनार को संचालन कर रही अकादमी की नाट्य सर्वेक्षक शैलजाकांत ने सभी वक्ताओं और वेबिनार में शामिल दर्शकों-श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

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