Friday - 4 December 2020 - 12:55 PM

बिहार की जंग तेजस्वी और नीतीश के बीच है

प्रमुख संवाददाता

बिहार चुनाव की तस्वीर अब बिलकुल साफ़ हो चुकी है. शुरुआती दौर में जिस तरह त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय लड़ाई नज़र आ रही है वह तस्वीर अब बदल चुकी है. अब लड़ाई तेजस्वी बनाम नीतीश के बीच है.

चुनावी जनसभाएं हों या फिर जनमत सर्वेक्षण तेजस्वी और नीतीश ही आमने-सामने हैं. जनमत सर्वेक्षण में नीतीश को पहले और तेजस्वी को दूसरे नम्बर पर दर्शाया गया है. चुनावी जनसभाओं में भी इन्हीं दोनों नेताओं के बीच सवाल-जवाब चल रहे हैं.

एलजेपी नेता राम विलास पासवान की मौत के बाद चुनावी तस्वीर बदलती नज़र आ रही थी लेकिन हालात से यह बात साफ़ हो रही है कि चिराग पासवान को इस चुनाव में बहुत ज्यादा फायदा होता नज़र नहीं आ रहा है.

तेजस्वी यादव ने अपने चुनाव घोषणापत्र में कैबिनेट की पहली बैठक में 10 लाख नौकरियां देने का वादा किया था. इस वाडे का मखौल उड़ाते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सवाल उठाया था कि 10 लाख लोगों को वेतन कहां से दोगे. मतलब साफ़ था कि नीतीश की सरकार आयी तो नौकरियां नहीं मिलेंगी.

नीतीश अपने ही पलटवार में फंसते दिखे तो बीजेपी ने फ़ौरन घोषणा की कि एनडीए की सरकार आयी तो 19 लाख नौकरियां दी जायेंगी.

तेजस्वी यादव नीतीश सरकार के 15 सालों के कामकाज की लगातार बखिया उधेड़ रहे हैं और लगातार यह सवाल पूछ रहे हैं कि जो घोषणाएं वह कर रहे हैं उन्हें अपनी सरकार रहते हुए पूरा क्यों नहीं किया.

तेजस्वी यह कहकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं कि नीतीश 15 साल में किये गए विकास की तस्वीर पेश करें. साथ ही तेजस्वी ने यह भी बता दिया है कि 10 लाख नौकरियों के लिए बजट कहाँ से लायेंगे.

तेजस्वी युवा हैं. लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के पुत्र हैं. उप मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अनुभव है. राजनीतिक ज़िन्दगी पर कोई दाग नहीं है. तो उधर नीतीश कुमार के पास 15 साल सरकार चलाने का अनुभव है.

जनमत सर्वेक्षण और राजनीतिक दलों के दावों को दरकिनार कर दिया जाए तो लड़ाई नीतीश और तेजस्वी के बीच ही है. तेजस्वी के पिता पर चारा घोटाले का आरोप है लेकिन बिहार के लोग लालू यादव को अपना नेता मानते हैं यह तेजस्वी का प्लस पॉइंट है.

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नीतीश के सामने इस इस चुनाव में जो चुनौतियां हैं वह राज्य में फ़ैली बेरोजगारी है. कोरोना काल में हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटे मजदूरों की पीड़ा है. हर साल आने वाली बाढ़ के बावजूद इसे रोक पाने का कोई उपाय न होना है.

चुनावी बजर बज चुका है. रैलियों का दौर है. चुनावी मंचों से सियासी जंग तेज़ है. आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है. नतीजा जनता के मन में कैद है. जनता जिसे चाहेगी अपना राजा बनायेगी लेकिन यह तय है कि लड़ाई आमने-सामने की है. त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय संघर्ष जैसी कोई तस्वीर नज़र आने वाली नहीं है.

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