Tuesday - 11 August 2020 - 9:11 PM

काम की कविताई तो उर्मिलेश की है

डा. सोनरूपा विशाल

पापा(डॉ उर्मिलेश)की ज़िन्दगी की पूरी तस्वीरों के रंग का अंश  जुबिली  पोस्ट के पाठकों की खातिर मैं भेज रही हूँ!बाक़ी की अधूरी तस्वीरें तो अब कल्पनाओं में पूरी होती हैं!जिसमें कभी-कभी मैं दिवम,साखी,कृशांग,लक्ष्य और आगम को शैतानियाँ करते हुए देखती हूँ और फिर पापा की आँखों में उन शैतानियों पर उमड़ते प्यार को देखती हूँ !ज़ीने से धीरे- धीरे उतरते हुए अब भी सोचती हूँ कि तेज़ी से उतरी तो वो नाराज़ होंगें और कहेंगे ‘कि कुछ सौंदर्य बोध है या नहीं’?!ऐसी बहुत सी अधूरी तस्वीरें पूरी तो करनी ही हैं झूठ मूठ ही सही!

ख़ैर……………….! इसी बहाने  उनकी एक बहुत बहुचर्चित ग़ज़ल भी शेयर करना चाहती हूँ । 

तू जला वो ग़लत था,मैं जला वो भी ग़लत

हौसला वो भी ग़लत था,हौसला वो भी ग़लत .

उसने मन्दिर तोड़ डाला उसने मस्जिद तोड़ दी

ज़लज़ला वो भी ग़लत था,ज़लज़ला ये भी ग़लत .

बाँटकर जिस्मों को अब वो बाँटने निकले हैं दिल

फ़ैसला वो भी ग़लत था,फ़ैसला ये भी ग़लत. 

इस सियासत ने हमें हिन्दू-मुसलमां मानकर

तब छला वो भी ग़लत था,अब छला वो भी ग़लत.

पहले मज़हब फिर सियासत ने बढ़ाया जो यहाँ

फ़ासला वो भी ग़लत था,फ़ासला ये भी ग़लत.

प्यार के उन रास्तों को छोड़कर ऐ’उर्मिलेश’

तू चला वो भी ग़लत था,मैं चला वो भी ग़लत

@डॉ उर्मिलेश

स्मृतियाँ मुझे अपनी उँगली पकड़ा कर उन पलों की ओर ले जा रही हैं जहाँ दादी के मुँह से मैं जिस युवक की बातें बड़े चाव से सुन रही हूँ जिसका नाम प्रमोद है, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के बदायूँ ज़िले के छोटे से गाँव भतरी गोवर्धन का यह पतला दुबला युवक जिसने पाँचवीं तक घर पर रहकर पढाई की थी ,फिर गाँव से 5 किलोमीटर दूर वजीरगंज कस्बे तक बीच में बहती सोत नदी को कभी पिता के कन्धों पर चढ़ कर कभी पैदल पार कर ,उस क़स्बे से इंटर मीडीएट किया| इसके पश्चात् वो युवक यानि मेरे पापा ने चंदौसी(मुरादाबाद) के एस .एम् कॉलेज से बीए किया फिर हिंदी में एम् ए और पी.एच डी आगरा कॉलेज आगरा से |

पढ़ाई में अव्वल था वो ,लेकिन हरकती भी बहुत,चोरी छिपे गाँव में घेर में छुप कर रस्ते चलते लोगों को परेशान करता ,कभी दोस्तों को मिठाइयाँ खिलवा कर लम्बा चौड़ा उधार तेरे बाबा जी के लिए छोड़ देता था ,तेरी बुआ को 10 आने देकर अपना सब काम उससे करवा कर ख़ुद मस्ती से दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता था । पापा की ये सब गुस्ताखियाँ भी दादी बड़े गर्व से बतातीं क्यों कि दिन भर नाक में दम करने वाली शैतानी कर के रात में सिर्फ़ दो तीन घंटे की जम कर की गयी पढ़ाई ने उन्हें हमेशा हर कक्षा में अव्वल रखा |

इन्हीं शैतानियों के साथ मन लगाकर की गयी पढाई ने उन्हें आगरा यूनिवर्सिटी से एम्ए में हिंदी में सर्वाधिक अंक दिलवाकर गोल्ड मेडलिस्ट बना दिया था और फिर जल्द ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर भी . बाबा जी भी कवि थे और मेरे परदादा भी और पापा ने भी क़रीब 16-17 साल की उम्र से कवितायेँ,कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं उनकी इसी लेखनीय सक्रियता से उनके नाम की गूँज कविसम्मेलनों और पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से आस पास के शहरों में और फिर धीरे धीरे देश के अन्य हिस्सों में सुनाई देने लगी थी |

मेरी गाँव की भोली भाली दादी हमेशा कहती थीं बाबा से कि ‘काम की कविताई तो उर्मिलेश की है तुम तो बस बैठे ठाले कविता लिखते हो,तुम्हारी कविताई किसी काम की नहीं है’ |पापा को अपना नाम प्रमोद पसंद नहीं था इसीलिए उन्होंने खुद का नाम बदलकर ‘उर्मिलेश’ रख लिया था और तो और दादी का भी नाम फूलवती से बदल कर पुष्पा कर दिया, ,ऐसी बहुत सारी बातें मैं दादी बाबा से पापा के बारे में सुनती थी और बड़े मन से सुनती थी | पापा के बचपन की ये सब बातें मुझे बहुत आनंदित करती थीं क्यों कि ये मेरे आने से पहले की बातें जो थीं बाद बाकी सारी यादें सुरक्षित हैं मेरे पास कुछ धुँधली और कुछ बिल्कुल ताज़ा |

हर बच्चे की तरह मैंने तो पापा के स्पर्श को तब पहचाना था जब एक अबोध बच्चा स्पर्श जानने पहचानने लगता है , पापा के लिए जामिया मिलिया दिल्ली से और बदायूँ के ने.मे. शिव नारायण दास डिग्री कॉलेज से एक साथ कॉल लैटर आया था,ज़मीन से जुड़े रहने का लोभ ही था कि उन्होंने बदायूं का ही कॉलेज चुना| प्रोफेसर्स कॉलोनी का तीन कमरों का फ्लैट हमेशा पापा के स्टूडेंट्स, दोस्तों ,रिश्तेदारों से भरा रहता कोई ही दिन ऐसा बीतता जब केवल हम परिवारीजन होते घर में|आये दिन काव्य गोष्ठियाँ होतीं ,रात भर महफ़िलें जमती| हमेशा से मस्त ,दोस्ती बाज़ी में सबसे अव्वल पापा जैसा जिंदादिल इंसान मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा था, किसी एक शख्स के आने से ऐसा लगे मानो उत्सव हो गया है कुछ ऐसा ही था पापा का व्यक्तिव |

पापा की बहुत लाडली थी मैं, अगर कोई कह देता कि मैं मम्मी जैसी लगती हूँ तो पापा को बिल्कुल नहीं सुहाता था वो हमेशा कहते थे कि मेरा बेट्टा मेरे जैसा है |

मीतू मेरा नाम है

पढ़ना मेरा काम है

उर्मिलेश की बेटी हूँ

मैं रीतू से जेठी हूँ

अक्षत मेरा भैया है

जब मैं बहुत छोटी थी तो ये कविता पापा ने सिखाई थी जब कोई मेरा नाम पूछता तो मैं इस कविता से मैं अपना परिचय देती थी ,हम तीन बहन भाई में मैं सबसे बड़ी फिर मेरी बहन फिर मेरा भाई है ,साल भर में एक दो बार पापा हमारी कॉपी किताबें उठा कर देखते फिर तो शामत आनी पक्की होती थी हमारी और हमारे टीचर की ,ये ‘व’को ‘ब’ कैसे लिखा ? सिर्फ़ इसी गलती के कारण मेरी बहन को दोबारा एक ही क्लास में पढ़ना पढ़ा|

एक होनहार छात्र ,गुरुनिष्ठ ,कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक,और एक श्रेष्ठ काव्य सर्जक के रूप में सिद्ध हो चुका उनका व्यक्तिव और कृतित्व दिनों दिन प्रगति कर रहा था और हम सब साक्षी थे उन गौरवशाली दिनों के .पापा कोई कविता सृजते तो हम सब घर में बिल्कुल शांति बनाये रखते, उनकी लेखनी की ऊँचाई तक जाते जाते मेरी नज़र धुंधला जाती है |  मंच से संपृक्त होने के कारण वे अपने कथ्य को अधिक से अधिक बोधगम्य,संप्रेषितबनाने में सफल हुए|

कोई विधा ऐसी नहीं थी कि जिसमें कोई कह सके कि उर्मिलेश यहाँ कमज़ोर हुए हैं उनके जाने के बाद मैंने जिस बारीक़ी से उनकी रचनाएँ पढ़ीं वो उनके होने पर नहीं पढ़ पाई ,हालांकि बचपन में मैंने उनकी असंख्यों कवितायेँ स्कूल और अनेकों कॉम्पटीशन में गायीं . हम छुट्टियों में पापा के साथ कभी-कभी कविसम्मेलनों में भी जाते थे और वहाँ पापा का दर्शकों में क्रेज़ देखकर मन ही मन रोमांचित होते ,लोगों का हुजूम उन्हें घेरे रहता,ऑटो ग्राफ के लिए लाइन लग जाती, पापा की आवाज़ जब मंचों पर गूँजती तो बस सब ख़ामोश…. जैसे सब उनके सम्मोहन से बंध गये हों और कविता का बंद खत्म होते ही जो तालियों का शोर होता उससे समूचा सदन गूँज उठता,हजारों लोगों को बांध लेने की क्षमता थी उनमें |

देश की हर प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उन्हें छापा गया ,प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया, इतनी प्रसिद्धि सम्मान के बावजूद उनकी सहृदयता के सब कायल थे उनकी सोच की एक वानगी इस दोहे से

 अभिनन्दन ,उपहार और फूलों के ये हार

 सामाजिक दायित्व का हमें सौपते भार

और वास्तव में उन्होंने अपने दायित्वों को निभाया भी खूब,वे न जाने कितने ज़रुरत मंदों को आर्थिक मदद देते उनके जाने के बाद कई लोग आये और आज भी आते हैं और बताते हैं कि कब मुसीबत में डॉ. साहब ने हमारी मदद की ,ये सब बातें हमें गौरवान्वित कर देती हैं |उनकी यही सह्रदय सोच,रिश्तों से प्रेम,परिष्कृत विचार,बेबाकी,निष्पक्षता,हर उस बिम्ब को देखने का व्यापक नजरिया जहाँ से कोई कविता या विचार एक नया रूप लेते हैं, ने उन्हें देश का लाडला गीतकार,एक अनुकरणीय शख्सियत बना दिया था |

पूजा पाठ में उनकी बहुत निष्ठा थी,गृह दशाओं में भी अच्छे जानकार थे ,एक बार उनकी कुंडली के अनुसार जब सूर्य की महादशा शुरू हुई तो कुछ ज्योतिर्विदों ने उन्हें सूर्य की उपासना और मंत्र जाप के लिए कहा तो उन्होंने एक नया रास्ता चुनते हुए सात सौ दोहे लिख कर सूर्य को प्रसन्न करने का संकल्प लिया,ऐसी बातें तो ना जाने कितनी हैं,भावुक भी बहुत थे और दिल के कमज़ोर इतने थे कि ज़रा सा भी बुखार आ जाये तो चाहते थे कि पूरा परिवार सब काम धाम छोडकर उनके पास आ बैठे । क्या क्या याद करूँ .एक ही व्यक्ति में इतना विस्तार कि शब्दों में न समां पाए कुछ ऐसा ही है उनके बारे में लिखा जाना |

सम्मोहक व्यक्तित्व ,लम्बा चौड़ा कद और हाँ वो आजानु बाहु थे,आवाज़ ऐसी कि चलते हुए आदमी को भी रुकने के लिए मजबूर कर दे ,भाषा और शैली उनसे जैसे और विस्तार पाती थीं,मृदुभाषी इतने थे कि पहली बार मिलकर ही हर कोई उनका मुरीद हो जाता,माथे पर पड़े उनके सिल्की बाल और बार बार उनको सँवारना उनकी पहचान बन गया था ,फैशनेबल भी बहुत, दिन में कई कई बार कपड़े बदलते, बाहर निकलते तो परफ्यूम से नहाकर ,असंख्यों जूतों की जोड़ियाँ, कपडों की कोई गिनती ही नहीं ,अपना जन्मदिन भी बड़े जोर शोर से मनाते ,फोटो खिंचवाने का इतना शौक कि एक फोटो ग्राफर साहब हर वक़्त उनके साथ रहते,उनका एक शेर है

इतना आदी हुआ हूँ चलने का

बैठते ही थकान होती है

वास्तव में कुछ ऐसा ही देखा मैंने पापा को | कॉलेज की व्यस्तता, कवि सम्मलेन के लंबे लंबे दौरे ,रात भर जाग जाग कर पढ़ना लिखना लेकिन इस पर भी सामाजिक और पारिवारिक दायित्व की कहीं भी उपेक्षा नहीं की , हालाँकि माँ ने भी उन्हें हमेशा घर बाहर की छोटी छोटी बातों में नहीं उलझाया,उन्हें घर में भी वही खुला आसमान दिया जिसमे उनकी सृजनशीलता और परवान चढ़ी, संबंधों को निभाना कोई उनसे सीखे, इतने व्यस्त होने के बावजूद एक चीज़ जो ताज़िन्दगी नहीं छूटी वो उनका रोज शाम दोस्तों का जमघट |

मेरे पापा हैं तो क्या उनमें सिर्फ़ अच्छाईयां ही हैं ऐसा नहीं है इतने गुणों के साथ उनमें अवगुण भी थे |लगातार रातों का जागना ,शारीरिक श्रम और उससे उपजी स्वास्थ्य समस्याएं ,स्वास्थ्य के प्रति लगातार लापरवाहियाँ ,उनको समझाने के हमारे सारे उपक्रम व्यर्थ हो जाते थे |डाइबिटीज़ होने के कारण जब कई फ़ल नहीं खा पाते तो बिना डॉक्टर की सलाह लिए विटामिन्स की गोलियाँ ले लेते, ज़रा सा बुखार आया नहीं कि ब्रूफिन अंदर ,स्वास्थ्य में नीचे ऊपर चलता रहा . उनकी प्रसिद्धि ने उनके कई दुश्मन भी बनाये लेकिन क्या मजाल जो किसी के लिए भी कोई दुश्मनी घर कर जाये उनके अंदर |

उनकी एक गज़ल है

ये सच है कि हम थोड़ा कम बोलते हैं

अगर बोलते हैं तो हम बोलते हैं

बहुत बोलते हैं जो उथले हैं दिल के

जो गहरे हैं दिल के वो कम बोलते हैं

कुछ ऐसा ही मैंने महसूस भी किया उनके अंदर .रचनाशीलता में व्यस्त पापा लगभग हर विधा में रचना कर रहे थे गीत ,नवगीत ,गज़ल, मुक्तक ,अतुकांत,वीररस की कवितायेँ,दोहे,समीक्षा,शोध निर्देशन ,कई पत्रिकाओं का संपादन ,डायरियों में बंद पापा की काव्य रचनाएँ संग्रह का रूप ले लें ये मम्मी की कामना थी और पापा की भी लेकिन समया भाव के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे थे लेकिन उनके वृहद साहित्य सृजन को समेटे ये संग्रह ही उनके कृतित्व के विभिन्न आयामों से लोगों का परिचय करवा सकते थे,खैर वो घड़ी भी आई ,1995 में पापा का पहला गज़ल संग्रह ‘धुआँ चीरते हुए’ प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने अपनी 1975 तक की पुरानी आत्मग्रस्तता के इर्द गिर्द घूमती हुई ग़ज़लों को छोड़ उन ग़ज़लों को स्थान दिया जिसमे अपने चारों ओर बिखरे परिवेश और यथार्थ का समावेश था ,संग्रह नोटिस किया गया और खूब किया गया |उनके पास वरिष्ठ कवियों का आशीर्वाद था सराहनायें थीं ,मंच पर भी उन्हें देश के सुविख्यात साहित्य पुरोधाओं का आशीर्वाद मिला |

बाद में उनके 25 और काव्य संग्रह आये उनके बाद दो संकलन और भी प्रकाशित हुए ,आज उनकी कवितायेँ रूहेलखंड विश्विद्यालय में बी.ए.के पाठ्यक्रम में संकलित हैं ,अपने गाँव में बहती सदानीरा नदी सोत नदी के लिए समर्पित संग्रह ‘सोत नदी बहती है ‘ उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान से पुरस्कृत कृति है |

पुरस्कार की लालसा मैंने कभी उनके अंदर नहींदेखी ,न कभी अपने संबंधों को भुनाते हुए देखा, उन्होंने नवांकुरों को ज़मीन दी, लिखने के लिये प्रेरित किया,लिखना सिखाया |उनकी रचनात्मक गतिशीलता ने उन्हें ‘विराट बदायूँ महोत्सव’ का सफल आयोजक बनाया,’बदायूं क्लब’ जो यहाँ का  प्राचीन और ऐतिहासिक क्लब है उसके सचिव पद पर उन्हें मनोनीत किया गया था उसी क्लब के तले उन्होंने बदायूं महोत्सव की परंपरा डाली ,पूरे उत्तर प्रदेश में इस महोत्सव की धमक सुनी जाने लगी थी ,और उत्सव धर्मी तो वो थे ही जहाँ वो वहाँ लोगों का कारवाँ सा बन जाता था |

हम दोनों बहनें ब्याहता हो गयी थीं,मेरे बेटे ने उनके अंदर के छिपे बच्चे को फिर से एक्टिव कर दिया था .चूँकि मेरा विवाह बदायूँ में ही हुआ था .तो उनकी सुबह शाम उसको देख कर ही सम्पूर्णता पाती थी मुझे मिलने वाले बचपन के प्यारे प्यारे संबोधन से अब वो पुकारा जाने लगा ,अब वो चाहते थे कि अपना ज़्यादातर समय घर पर दें,गिने चुने कवि सम्मेलनों में जाना चाहते थे अब वो कहते थे अब ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो गयी हैं अब पठन,पाठन और लेखन |

उनकी बहुत सी पुरानी डायरियों में बंद बहुत कुछ सृजा हुआ लेकिन समय की कमी की वजह से उपेक्षित था ,उन्हें स्वरूप देना था |बहुत सम्रद्ध लाइब्रेरी थी उनकी बहुत करीने से सजी हुई ,आज भी जब मैं वहाँ से कोई किताब निकालती हूँ तो कई किताबों में उनके हाथ से बने मार्क होते हैं जिन्हें वो सही समय पर कोट करते थे सब उन्हें मुँह जवानी याद रहते थे  ,एक सुखी और सम्रद्ध परिवार था हमारा ,पापा का यश दिनों दिन बढ़ रहा था लेकिन स्वास्थ्य धीरे धीरे कमज़ोर हो रहा था |उनके निरंतर गिरते हुए स्वास्थ्य ने उन्हें कई बार झटका दिया ,ये क्रम रुक रुक कर चलता ही रहा ,और एक सुबह जो सूरज उगते ही काली हो गयी ४ मई २००५ की सुबह थी पापा को ब्रेन हेमरेज हो गया था और १६ मई हमारे परिवार के लिए सबसे काला दिन साबित हुआ ,ये सब लिखते लिखते मेरे हाथ मेरा साथ नहीं दे रहे हैं ,मैं इस पैराग्राफ को यहीं बंद कर देना चाहती हूँ |

खुश और ज़िन्दादिल होकर जीने की कला हमने उन्ही से ही सीखी थी इसीलिए अब उनकी ऐसी ही पंक्तिओं में उनका अक्स ढूँढते हैं और उन पर चलने का प्रयास करते हैं

बेवजह दिल पे कोई बोझ ना भारी रखिये

ज़िन्दगी जंग है इस जंग को जारी रखिये

 कितने दिन जिंदा रहे इसको ना गिनिए साहिब

 किस तरह जिंदा रहे इसकी शुमारी रखिये

उनकी इन जागृत पंक्तियों ने मुझे क्या न जाने कितनों को संबल दिया है यही पंक्तियाँ हैं जो हम से कह रही हैं हम क्यों गिने कि उन्होंने सिर्फ़ 54 वर्ष की अल्प आयु का जीवन जिया |हम वो गिने कि इतनी आयु में भी वो  ऐसा अविस्मरणीय जीवन जीकर गए हैं जो ज़्यादातर कोई शतायु होकर भी नहीं जी पाता  |

(डा.  सोनरुपा विशाल प्रख्यात कवियत्री हैं।) 

 

 

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