Sunday - 27 September 2020 - 3:45 PM

संविधान के सरोकार और सबको साधने की राह पर संघ

कृष्णमोहन झा

नरेंद्र दामोदर दास मोदी के देश के प्रधानमंत्री की शपथ के साथ ही केन्द्र के हर निर्णय को संघ से जोड़ने और उसको लेकर विवाद खड़ा करना विपक्ष और विशेष तौर पर कांग्रेस का शगल बन गया है, बात नोट बन्दी की हो, जीएसटी लागू करने की हो ट्रिपल तलाक पर रोक लगाने की हो कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35A हटाने की हमेशा ही संघ को इसके पीछे माना जाता रहा है।

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हाल ही में मुरादाबाद में संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा एक परिवार दो बच्चे को लेकर दिए गये ब्यान को अपने अपने अंदाज में प्रस्तुत करने से एक नई बहस प्रारम्भ हो गई है इन्ही सब बातों पर अपना नजरिया स्पष्ट किया सरसंघचालक ने बरेली के रूहेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में।

प्रचार से पैदा हुई गलतफहमियों को दूर करते हुए कहा कि संघ संविधान को मानता है और यह भी मानता है कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि संघ का कोई और एजेंडा नहीं है और वह शक्ति का कोई दूसरा केंद्र नहीं चाहता।

विश्वविद्यालय के व्याख्यान में आरएसएस प्रमुख ने संविधान से लेकर हिंदुत्व तक कई मुद्दों पर खुल कर बात की। उन्होंने भविष्य के भारत में संघ की भूमिका के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि संघ को लेकर तमाम भ्रांतियां फैलाई जाती हैं और वे तभी दूर हो सकती हैं, जब संघ को नजदीक से समझा जाए।

सरकार को रिमोर्ट कंट्रोल के माध्यम से चलाये जाने के आरोप पर उन्होंने कहा कि संघ के पास कोई रिमोट कंट्रोल नहीं है और न ही वह किसी को अपने हिसाब से चलाता है।

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केंद्र सरकार द्वारा संघ के एजेण्डे पर कार्य करने के विपक्ष के आरोप पर संघ प्रमुख ने कहा कि संघ का कोई एजेंडा नहीं है, वह भारत के संविधान को मानता है। उन्होंने कहा- हम शक्ति का कोई दूसरा केंद्र नहीं चाहते, संविधान के अलावा कोई शक्ति केंद्र होगा, तो हम उसका विरोध करेंगे।

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दो ही बच्चे पैदा करने की नीति को लेकर मुरादाबाद में दिए गए अपने बयान को स्पष्ट करते हुए संघ प्रमुख ने कहा- कुछ लोग भ्रमवश कह रहे हैं कि संघ देश के परिवारों को दो बच्चों तक सीमित करने की इच्छा रखता है। हमारा कहना है कि सरकार को इस बारे में विचार करके एक नीति बनानी चाहिए। सबका मन बना कर नीति बनाई जानी चाहिए।

देश के हर नागरिक को हिंदू कहने वाले अपने बयान पर भागवत ने कहा- जब हम कहते हैं कि इस देश के 130 करोड़ लोग हिंदू हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी के धर्म, भाषा या जाति को बदलना चाहते हैं।

भागवत ने दूसरे धर्मों के लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा- हम राम, कृष्ण को नहीं मानते, कोई बात नहीं, लेकिन इन सब विविधताओं के बावजूद हम सब हिंदू हैं। जिनके पूर्वज हिंदू थे, वे अब भी हिंदू हैं। हम अपनी संस्कृति से एक हैं। हम अपने भूतकाल में भी एक हैं।

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यहां 130 करोड़ लोग हिंदू हैं, क्‍योंकि आप भारत माता की संतान हैं। उन्होंने आगे कहा- हम संविधान से अलग कोई सत्ता केंद्र नहीं चाहते हैं, क्योंकि हम इस पर विश्वास करते हैं। उन्होंने कहा कि जाति, पंथ, संप्रदाय, प्रांत और तमाम विविधताओं के बावजूद हम सभी को मिल कर भारत निर्माण करना है।

वर्तमान केंद्र सरकार के द्वारा गत वर्ष उठाए गए सहासिक कदमों से उपजी परिस्थितियों पर भी चर्चा की गई ,जिसका सार यह था कि संघ सरकार के इन कदमों से पूर्णता सहमत हैं। निश्चित रूप से इस नए माहौल में संघ से जिन जिम्मेदारियों के निर्वहन की अपेक्षा की जा रही है, उसका संघ को पूरा एहसास है।

इस बैठक का यह संदेश था की संघ ने अपने विचार विमर्श से यह जाहिर कर दिया है कि वह अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में कभी पीछे नहीं हटेगा और विपक्षी दलों का कोई भी अभियान उसे मार्ग से विचलित नहीं कर सकता है।

(लेखक WDS के राष्ट्रीय अध्यक्ष और IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है )

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