Monday - 6 February 2023 - 3:19 PM

अयोध्या पर नई पहल से क्या उम्मीद की जाए?

रतन मणि लाल

अयोध्या के नाम के साथ जितना रामायण और श्री राम का सम्बन्ध है, उतना ही कोर्ट-कचहरी, मुकदमे और विवाद का भी है। अयोध्या में राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ विषय है, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए यह आस्था से अधिक इतिहास से सम्बंधित मामला है। वहां एक मस्जिद थी जिसका विध्वंस होने के बाद उस विवादित जमीन पर दशकों से रामलला विराजमान का एक मंदिर अस्थाई रूप से स्थित है, और वहां सामान्य दिनों में हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं, साथ में यह उम्मीद लिए कि एक दिन यहाँ पर एक भव्य मंदिर बनेगा।

यही उम्मीद राजनीतिक दलों के लिए बहुसंख्यक समुदाय का समर्थन जीतने के लिए एक मजबूत मुद्दे के रूप में इस्तेमाल होती आ रही है। विवादित भूमि के स्वामित्व का मामला आज सुप्रीम कोर्ट के सामने है, और एक साहसिक पहल में कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के जरिये सुलझाने की कोशिश की है. यह पहल लोक सभा चुनाव की घोषणा से कुछ दिन पहले ही आई है, और इसलिए इस पहल के पीछे की मंशा और इससे होने वाले सामाजिक-राजनीतिक लाभ या हानि को समझना जरूरी है।

क्या है मध्यस्थता

भारत में मध्यस्थता की शुरुआत मूलतः औद्योगिक विवादों के सुलझाने में की गई थी, और इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 में इसका उल्लेख है। वर्ष 1999 में संसद ने सिविल प्रोसीजर अमेंडमेंट एक्ट पारित किया, जिसके द्वारा कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर की धारा 89 में न्यायालयों को लंबित विवादों को सुलझाने के लिए अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रेजोल्युशन (वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रिया) का प्रावधान किया गया। मध्यस्थता का सुझाव अधिकतर गैर-अपराधिक मामलों में किया जा सकता है, लेकिन ऐसे अपराधिक मामलों में भी संभव है,  जहां मौखिक उत्पीडन किया गया हो।

पारिवारिक संबंधों, जैसे तलाक, बच्चों पर हक़ आदि में भी मध्यस्थता का सुझाव दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के मिडीयेशन ट्रेनिंग मैन्युअल ऑफ़ इंडिया के चैप्टर 12 के अनुसार, ऐसे मामलों में भी मध्यस्थता का सुझाव दिया जा सकता है, जिनमे पहले से चले आ रहे संबंधों को तनाव के बावजूद बनाये रखने की आवश्यकता समझी जाती है।

जहाँ तक अयोध्या भूमि विवाद की बात है, कानूनी तौर पर तो यह जमीन पर मालिकाना हक़ का मामला है, शुक्रवार 8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि यह केवल भूमि के स्वामित्त्व का मामला नहीं है बल्कि भावनाओं से जुड़ा मामला है, ऐसे में इसे दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिये सुलझाएं। आस्था श्रद्धा का विषय है, यह किसी के प्रति हो सकती है, या किसी निर्जीव या सजीव वस्तु के प्रति भी। यह भी सच है कि आस्था के पीछे कोई तर्क, कारण या सबूत नहीं होता. मध्यस्थता के लिए बनाई गई तीन-सदस्यीय समिति को प्रक्रिया पूरी करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है और अपना काम शुरू करने के चार हफ्ते बाद प्रगति की रिपोर्ट देने को कहा गया है।

पूर्व में इस मामले में मध्यस्थता की कोशिशों हो चुकी हैं, लेकिन उनका कोई हल नहीं निकला था। अब पहली बार कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता की पहल की जाएगी. मस्जिद पक्ष मध्यस्थता की बात मानने के लिए तैयार है, लेकिन हिंदू महासभा इस पर सहमत नहीं है. जहां मुस्लिम पक्षकार मध्यस्थता के पक्ष में हैं, वहीँ हिन्दू महासभा इसके लिए तैयार नहीं है।

मामले के पेंच

वर्ष 1989 में तत्कालीन प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मध्यस्थता के लिए एक समिति बनी थी। लेकिन बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी ने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया था, और यह पहल दम तोड़ गई। उसके अगले वर्ष तत्कालीन प्रधान मंत्री चन्द्र शेखर ने भी बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी और विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधियों की एक समिति बना कर मध्यस्थता की पहल की थी, लेकिन कई बैठकों के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

उसके बाद प्रधान मंत्री राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी ऐसी कोशिश की लेकिन कोई परिणाम नहीं निकल पाया. गैर राजनीतिक प्रयासों में कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, दलाई लामा, और श्री श्री रवि शंकर ने भी बातचीत की पहल की थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो पाया. यह बात अलग है कि इन सभी पहलों में कोई भी कोर्ट द्वारा समर्थित नहीं थी।

अयोध्या मामले पर इलाहबाद हाई कोर्ट ने सितम्बर 30, 2010 को दिए गए निर्णय में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था, ये तीन पक्ष थे निर्मोही अखाडा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान। इसी निर्देश के खिलाफ की गयी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. मध्यस्थता के लिए बनाई गई समिति में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश फ़क़ीर मोहम्मद इब्राहीम कलीफुल्ला, अध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू शामिल हैं।

यह स्पष्ट नहीं है कि इन तीनों का चयन सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर किया है. न्यायाधीश कलीफुल्ला मद्रास हाई कोर्ट के जज रह चुके हैं, बाद में वे जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस, और फिर सुप्रीम कोर्ट के जज बने जिस पद से वे जुलाई 2016 में रिटायर हुए थे. श्री श्री रवि शंकर ने आर्ट ऑफ़ लिविंग नाम के फाउंडेशन की स्थापना की है और वे अपने अध्यात्मिक कार्यक्रमों, प्रवचन और उत्पादों के लिए जाने जाते हैं।

श्रीराम पंचू प्रख्यात वकील हैं और उन्हें दो बार मद्रास हाई कोर्ट के जज बनाये जाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वे न्यायिक प्रक्रिया में मध्यस्थता के पक्षधर हैं और कई मामलों में मध्यस्थता के जरिये हल निकाल चुके हैं।

क्या हल निकलेगा?

शुरूआती संकेतों के अनुसार अधिकतर राजनीतिक दलों ने इस पहल का स्वागत तो किया है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इससे कोई विशेष उम्मीद नहीं है। पार्टी के नेताओं का मानना है कि यह आस्था का विषय है,  जिसमे किसी किस्म की गुंजाईश नहीं है।

कांग्रेस ने भी इस पहल का स्वागत तो किया है और उम्मीद जताई है कि इसका सकारात्मक हल निकलेगा। हिन्दू संगठनों ने भी इस पहल की सफलता पर संशय जताया है और उनका कहना है कि इससे मंदिर निर्माण में और देरी होगी।

सच तो यह है कि हिन्दू संगठन यह मानते हैं कि विवादित स्थल पर राम मंदिर के अलावा किसी अन्य प्रकार का निर्माण संभव ही नहीं है, क्योंकि उनके विचार से इस स्थल पर जो मस्जिद थी वह पूर्व में स्थित मंदिर का विध्वंस करके ही बनाई गयी थी। इसके विपरीत कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं का कहना है कि यदि यहाँ मंदिर बना तो देश में कई मस्जिदों की जगह मंदिर बनवाये जाने की मांग उठ सकती है, जिससे देश में अस्थिरता फैलेगी।

जहाँ तक राजनीतिक संभावनाओं का सवाल है, अयोध्या में राम मंदिर बनाये जाने का समर्थन सभी दल करते हैं, लेकिन वे अपनी अपनी प्रतिबद्धताओं से बंधे हुए है. दलों को वास्तव में मंदिर बनाये जाने से ज्यादा अपने समर्थक वर्गों की प्रतिक्रिया की चिंता है। हिंदू समुदाय पिछले कुछ वर्षों में मुखर हुआ है और मंदिर बनाये जाने का पक्षधर है, लेकिन उसकी वजह से किसी अस्थिरता या हिंसा के पक्ष में नहीं है. मुस्लिम समुदाय सिद्धांतत राम मंदिर का विरोध कभी नहीं करता, लेकिन उसके बदले में एक मस्जिद बनाये जाने की मांग करता है, क्योंकि उनका मानना है वहां बाबरी मस्जिद नाम का धार्मिक स्थल था जिसका विध्वंस किया गया था।

अब इस मामले की मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हो गई है और लोक सभा चुनाव भी सामने आ गया है। आने वाले चार हफ़्तों में मध्यस्थता समिति अपनी प्रगति रिपोर्ट देगी, और उस समय चुनाव प्रचार चरम पर होगा। उसके चार हफ़्तों बाद यह समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट देगी जिस पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय ले सकती है। उस समय तक शायद चुनाव के नतीजे आने वाले हों, और उसके बाद नई सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू होगी। मध्यस्थता की पहल का नतीजा कुछ भी हो, उसके परिणाम का फायदा या नुक्सान तो नई सरकार को ही मिलेगा।

(लेखक के ये निजी विचार हैं)

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