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यूपी में कम्युनिटी पुलिसिंग का वह दिन!

राजेंद्र कुमार 

30 सितंबर 2010। उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन यूपी में कम्युनिटी पुलिसिंग की पावर को लोगों ने देखा और महसूस किया था। सूबे के हर गांव, कस्बे और शहर में पुलिस की चौकसी इस दिन लोगों ने देखी थी।

पुलिस की देखरेख में गांव से लेकर शहर के हर मोहल्ले में बनाई गई सुरक्षा समितियों ने अल्पसंख्यक समुदाय के रक्षक बनने की अपनी भूमिका का शानदार तरीके से इस दिन निभाया था। जिसका परिणाम यह रहा कि जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या की विवादित जमीन श्रीराम जन्मभूमि है या नहीं?

इसे लेकर फैसला सुनाया तो यूपी के किसी भी गांव, कस्बे या शहर में कोई तू-तू, मैं-मैं नहीं हुई। कोई विवाद नहीं हुआ। हिंसा नहीं हुई। सूबे के लोगों ने कोर्ट के फैसले पर ना तो ढ़ोल मजीरे बजाए, ना खुशी का इजहार किया और ना ही विरोध किया।

30 सितंबर 2010 को ये सब उस यूपी में हुआ, जहां रामजन्म भूमि मंदिर का ताला खुलने, जन्मभूमि परिसर में शिलान्यास होने से लेकर 6 दिसंबर 1992 को हुए ढ़ांचा विध्वंस पर लोगों ने अपने घरों की छत पर खड़े होकर शंख बजाकर अपनी खुशी का इजहार किया था। उस यूपी में 30 सितंबर 2010 को एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई तो इसके पीछे तब की सरकार की चौकसी एक प्रमुख वजह रही।

आज याद करता हूँ, तो कई किस्से याद आते हैं। याद आता है कि मायावती सरकार अयोध्या में धर्मिक स्थल को लेकर आने वाले हाईकोर्ट के फैसले को लेकर बहुत कशमश में थी।

ऐसे में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यह ऐलान कर दिया था कि अयोध्या के विवादित धर्मस्थल को लेकर 24 सितंबर को फैसला सुनाया जायेगा। तो मायावती को अपना वोटबैंक बढ़ाने के लिए सूबे में अमन चैन की बहाली को लेकर चिंता हुई। और मायावती के सरकारी आवास पर तत्कालीन कैबिनेट सिक्रेटरी शशांक शेखर सिंह, मुख्यसचिव, प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी सहित एक दर्जन से अधिक सीनियर आईपीएस अफसरों की एक बैठक हुई।

इसमें तय हुआ कि सूबे में ऐसे सुरक्षा इंतजाम की तैयारी की जाये, ताकि अयोध्या मसले पर जिस दिन कोर्ट का फैसला आये, उसी यूपी में कहीं कोई हिंसक घटना ना होने पाए।

सूबे की कानून व्यवस्था बनाये रखना मुख्य एजेंडा

मायावती के इस निर्देश के बाद कैबिनेट सिक्रेटरी शशांक शेखर सिंह की देखरेख में प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर, डीजीपी कर्मवीर सिंह और एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल ने कम्युनिटी पुलिसिंग के जरिये सूबे में फैसले के दिन अमन चैन बहाल रखने की एक व्यापक योजना तैयार की। जनसहयोग के आधार पर सूबे की कानून व्यवस्था को बनाये रखना, इस योजना का मुख्य एजेंडा था।

उक्त योजना के क्रम में केंद्र सरकार से 700 कंपनी केन्द्रीय बल यूपी को मुहैया कराने का आग्रह किया गया। परन्तु दिल्ली में होने वाले कामनवेल्थ गेम और बिहार विधानसभा के चुनावों को लेकर केंद्र सरकार ने सिर्फ 50 कंपनी केन्द्रीय बल ही यूपी को मुहैया कराने पर सहमति जताई। ऐसे में सूबे में उपलब्ध पुलिस, होमगार्ड और पब्लिक के जरिये ही सूबे में अमन चैन बनाये रखने का प्लान बना।

यूपी को बांटा गया था तीन अस्थायी जोन में

इसके लिए यूपी को तीन अस्थायी जोन (हिस्सों) में बांटा गया। पश्चिम जोन में मेरठ, सहारनपुर, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़ और आगरा मंडल को रखा गया। इस जोन की जिम्मेदारी बृजलाल को मिली। इसी प्रकार मध्य जोन के छह मंडलों के प्रभारी डीजीपी कर्मवीर सिंह तथा पूर्वी जोन केछह मंडलों के इंचार्ज प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर को बनाया गया।

ये तीनों अफसर अपने तय हुए जोन के हर मंडल मुख्यालय में गए। वहां मंडल में आने वाले सभी जिलों के आला अफसरों को इन्होने सरकार के निर्देश से अवगत कराया।

करीब डेढ़ महीनों में इन अफसरों ने मंडल मुख्यालय की बैठकों में अधिकारियों को साफतौर पर यह बताया गया कि हर विभाग के अधिकारी गांव, कस्बे और मोहल्लों में जायेंगे और लोगों के बतायेंगे कि अदालत का फैसला जो भी आये, सब धैर्य का परिचय देंगे।अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करेंगे। उनके धर्मस्थलों की हिफाजत करेंगे।

गांव, मोहल्ले बनाई गई सुरक्षा समितियां

इसके लिए गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले सुरक्षा समितियां बने। हर जिले में कम्युनिकेशन डायरी बने, जिसमें हर गांव के जीते और हारे प्रधान का मोबाइल नंबर हो, घर का पता हो। थाने के पुलिसकर्मी का अपनी बीट की सुरक्षा समितियों से संपर्क रहे। और वह अपने क्षेत्र की समिति को यह बताता रहे कि उसके इलाके में कुछ नहीं होना चाहिए।

हर जिले में लागू हुआ था वायरलेस पब्लिक एड्रेस सिस्टम

कम्युनिटी पुलिसिंग के इस नेटवर्क से जनता को सीधे जोड़ने के लिए वायरलेस पब्लिक एड्रेस सिस्टम हर जिला मुख्यालय पर लगाया गया। बड़े कस्बों में भी इस सिस्टम से जनता को निदेश दिए गए। कम्युनिटी पुलिसिंग की ये योजना ठीक से काम कर रही है या नहीं इसकी लगातार चेकिंग भी लखनऊ में बैठे अफसरों से करायी गई।

पुलिस थानों में पेट्रोलिंग तथा अन्य कार्यो को कराने के लिए फंड दिए गये। फिर 20 सितंबर 2010 को कम्युनिटी पुलिसिंग के तहत सभी सुरक्षा समितियों को अपने इलाके के एक धर्मस्थल की सुरक्षा का दायित्य देकर उनकी क्षमता का ट्रायल किया गया।

सभी समितियों ने अपने दात्यिव को ठीक से निभाया तो अफसरों को भरोसा हुआ कि जनता के भरोसे वह यूपी में अमन चैन कायम रख पाएंगे। 21 और 22 सितंबर को रात आठ से दस बजे के बीच सूबे के कई संवेदनशील शहरों में हेलीकाप्टर से कमांडो उतारे गए, ताकि लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि पुलिस किसी भी समय लोगों की मदद के लिए पहुँच सकती है।

जब हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

पुलिस की ऐसी तैयारियों के बीच ही हाईकोर्ट ने फैसला सुनाने की तारीख 24 सितंबर से बदल कर 30 सितंबर कर दी। हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को शाम चार बजे फैसला सुनाया। जब हाईकोर्ट में फैसला सुनाया जा रहा था, उसके छह घंटे पहले ही समूचे यूपी में पुलिस एलर्ट हो चुकी थी। शहरों और कस्बों के हर चौराहे पर पुलिस ही पिकेट तैनात थी।

सड़क किनारे अतिक्रमण कर लगने वाली दुकानें उस दिन पुलिस ने समूचे प्रदेश में कही भी नहीं लगने दी। ट्रैफिक पुलिस भी मुस्तैद थी। मॉल और मल्टीप्लेक्स में बिना चेकिंग के किसी को भी नहीं आने दिया जा रहा था। पान और सिगरेट बेचने वाली दुकानों को पुलिस ने इस चेतावनी के साथ खुलने दिया कि दुकान के पास भीड़ नही लगने दी जायगी।

पसरा सड़को पर सन्नाटा

ऐसे माहौल में जब शाम चार बजे अदालत में फैसला सुनाया जाने लगा तब चौराहों पर तैनात पुलिस ने वाहनों के चेंकिग करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सडकों पर सन्नाटा हो गया। लोग घरों में टीवी पर फैसले की आ रही हेडलाइन देखने लगे। जबकि सुरक्षा समितियों के सदस्य अपनी टीम के साथ क्षेत्र में गस्त करने लगे।

रात नौ बजे तक ऐसी ही सक्रियता यूपी के हर गांव, कस्बे और शहर में रही। जिसका नतीजा बहुत ही सुखद रहा, यूपी किसी भी कोने में कोई हिंसक वारदात नहीं हुई। जबकि देश के कई राज्यों में ऐसा नहीं हो सका क्योंकि उन राज्यों ने फैसले को लेकर वैसी चौकसी नहीं बरती थी, जैसी यूपी में बरती गई।

अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसला

कम्युनिटी पुलिसिंग के जरिये यूपी में अमन चैन बहाल किये जाने का हुआ प्रयास अब याद आने की कई वजह है। इनमें सबसे प्रमुख वजह है, कि अब वर्षों से अदालत में चल रहे अयोध्या के धार्मिक स्थल को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने को है।

यह अयोध्या के धार्मिक विवाद पर अंतिम फैसला होगा। जिसे सबको मानना होगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर लोगों के मन में वैसी ही उत्सुकता है, जैसी हाईकोर्ट का फैसला आने के दौरान लोगों को थी।

अयोध्या में धारा 144 लागू

इसे ध्यान में रखते हुए ही अब अयोध्या का प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के सुनाये जाने वाले फैसले को लेकर शहर में अमन चैन बहाल बनाए रखने के कदम उठा रहा है। इसके तहत अयोध्या प्रशासन ने दस दिसंबर तक के लिए धारा 144 लगा दी गई है। अयोध्या के ज़िलाधिकारी अनुज कुमार झा के मुताबिक़, आने वाले दिनों में कई त्योहार हैं, जिसकी वजह से ये क़दम उठाया गया है।

इसके अलावा अयोध्या जिला प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर परिचर्चा कराने से टीवी चैनलों को प्रतिबंधित कर दिया है। प्रशासन ने परिचर्चाओं के लिए अयोध्या मामले के वादियों को आमंत्रित करने से भी टीवी चैनलों को प्रतिबंधित कर दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी देश में कोई अदालत नहीं

इस फैसले को लेकर अनुज कुमार झा कहते हैं, ‘टीवी चैनलों को अयोध्या में सार्वजनिक स्थानों पर परिचर्चा कराने से प्रतिबंधित करना जरूरी था क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर परिचर्चा होने से शांति में खलल पड़ सकती है और सांप्रदायिक अशांति हो सकती है।

अयोध्या में ऐसा ना होने पाए, इसके लिए अयोध्या के मंडलायुक्त मनोज मिश्र और अनुज झा के निर्देश पर जिले के अधिकारी जिले के गांव और कस्बों चौपालों तथा गोष्ठियों में लोगों को समझा रहे हैं कि देश में कोई अदालत सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी नहीं है।

इसलिए उसका फैसला कुछ भी और किसी के भी पक्ष या विपक्ष में हो, सभी को उसका सम्मान करना है। वे यह हिदायतें भी दे रहे हैं कि इस सिलसिले में किसी भी शरारत को कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

इस सिलसिले में वर्ष 2010 के मुकाबले पुलिस की एक बड़ी सुविधा यह है कि जो जमातें कभी यह कहती थीं कि यह कानूनी नहीं, आस्था का विवाद है और इस कारण अदालतें इसका फैसला ही नहीं कर सकतीं, वे भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने की बात कह रही हैं।

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दुनिया भर की नजर

इस कारण अब जब अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले को लेकर देश की ही नहीं, दुनिया भर की नजर है। और समूची दुनिया सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर भारत के लोगों का व्यवहार न सिर्फ चुपचाप देखेगी, बल्कि अपने इतिहास में दर्ज करेगी कि भारत के बहुभाषी बहुधर्मी समाज ने इस फैसले को किस तरह ग्रहण किया।

दुनियां ने यह भी देखा है कि छह दिसम्बर 1992 को विवादित स्थल पर खड़े सैकड़ों साल पुराने ऐतिहासिक ढांचे को योजनाबद्ध अभियान चलाकर तोड़ डालने वालों को अभी तक दंड नहीं मिल पाया है।

जबकि अपने देश ने यह देखा है कि इस ढांचे के ध्वंस के कारण हमारा देश दुनिया में बदनाम हुआ, देश पिछड़ा और हमारे समाज के भीतर की दरारें गहरी हुई।

वहीं, दूसरी तरफ 30 सितंबर 2010 को यूपी की जनता ने पुलिस के साथ मिलकर सूबे के अमन चैन को खरोच तक नहीं आने दी। यूपी और देश को 30 सितंबर 2010 जैसे बहुत सारे दिनों की जरूरत है।

ताकि कोई भी राजनीति या फैसला हमारे बीच दरार ना डाल पाए और एक समुदाय के तौर पर पुलिस और सरकार के सहयोग से हम सब एक दुसरे की रक्षा करें।

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