Sunday - 1 August 2021 - 1:03 AM

डंके की चोट पर : फूलन देवी के बहाने से…

शबाहत हुसैन विजेता

यही कोई उन्नीस-बीस साल पहले की बात होगी. जेलों में बंद महिलाओं के हालात को लेकर सरकार समीक्षा करा रही थी. लखनऊ की जिला जेल में भारत सरकार की तरफ से भेजा गया महिला सांसदों का प्रतिनिधिमंडल आया था. जेल के गेट पर पत्रकारों की भीड़ लगी थी. गेट खुला महिला सांसदों का प्रतिनिधिमंडल बाहर आता नज़र आया. सभी पत्रकार साथी शबाना आज़मी की तरफ लपके. उन्हें घेरकर सवालों की झड़ी लगा दी. मैं फूलन देवी की तरफ बढ़ गया.

जेल के गेट के पास लगे पेड़ के नीचे काफी देर तक फूलन देवी से बात हुई. लम्बी बातचीत के बाद भी लगा अभी बहुत कुछ है जो लोगों को नहीं पता है. प्रतिनिधिमंडल ताज होटल में ठहरा था. दूसरे दिन शाम को पांच बजे का वक्त तय हुआ. बातचीत के दौरान शबाना आज़मी कमरे में आ गईं और कहा कि मुख्यमंत्री ने चाय पर बुलाया है, चलना नहीं है क्या? फूलन देवी ने कहा कि आप चलो. बातचीत खत्म हो जाये तो आते हैं. यह बातचीत फूलन देवी की हत्या के दूसरे दिन जनसत्ता एक्सप्रेस और इन्डियन एक्सप्रेस में दोबारा से छपी थी.

अक्सर आँखों के सामने से ताज होटल का वह कमरा नाच जाता है. ठीक सामने कुर्सी पर बैठी फूलन देवी बातचीत करती जा रही थीं और अपनी तैयारी में भी लगी थीं. सर में तेल लगाया, कंघी की. मुंह और हाथों में कोहनियों तक क्रीम लगाई. दूसरी औरतों की तरह से फूलन देवी को भी सजने-संवरने का बड़ा शौक था.

फूलन देवी के पास ढेर सारी कहानियां थीं जो उनके साथ ही जलकर खत्म हो गईं. सामने बैठी बालों को कंघे से संवार रही यही फूलन कभी दस्यु सुन्दरी थी. इसी फूलन से आम आदमी भी घबराता था और पुलिस भी. इसी फूलन ने 18 लोगों को लाइन से खड़ा कर गोली से बींध दिया था.

मुलायम सिंह यादव ने जेल से रिहा होने के बाद फूलन देवी को सांसद बनाया था. फूलन देवी डकैत रही थी, अनगिनत हत्याएं कर चुकी थी. उसने जेल काटी थी. उसने पुलिस और डकैतों दोनों से मार खाई थी. उसके जिस्म का पोर-पोर दुखता था. बहुत देर तक फूलन देवी सीधे बैठ भी नहीं पाती थीं.

जिस डकैत से पूरा देश थर्राता था, वह सामने बैठी थी तो उसके अंदर की औरत बहुत साफ़ नज़र आ रही थी. वही सजने का जूनून, वही बालों को अच्छे से संवारने का हुनर, दूसरी औरतों की तरह से वह भी चाहती थीं कि वह लोगों के बीच जाए तो उसके पास से खुशबू आये.

संसद सदस्य बन जाने के बाद भी वह बहुत आम औरत थी. जेल के गेट के पास लगे पेड़ के नीचे चबूतरे पर वह जिस सामान्य तरीके से बैठकर बात कर रही थीं वह कोई दूसरा नहीं कर सकता था. फूलन से मिलकर यह जाना कि उनमें सांसद बन जाने का घमंड नहीं था लेकिन अपने ही गाँव के लोगों से लुट जाने का ज्यादा दर्द था. उनके अन्दर इस बात की बड़ी तकलीफ थी कि अपने ही गाँव वालों ने हथियार उठा लेने को मजबूर कर दिया.

फूलन देवी के साथ जो हुआ उसका बदला फूलन ने हथियार उठाकर ले लिया. हथियार उठाने के लिए फूलन देवी की लगातार आलोचना होती है, होनी भी चाहिए लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि लगातार लूटे जाने के बाद फूलन देवी आखिर किसके पास जाती जो उसे इन्साफ मिल जाता. क्या पुलिस उसे इन्साफ दिलाती जो खुद एक औरत की छाती पर चढ़कर उसे पीटते हुए गौरवान्वित हो रही है.

औरत की छाती पर चढ़कर उसे पीटता हुआ दरोगा पुखरायां का चौकी इंचार्ज है. पुखरायां और बेहमई की दूरी सिर्फ 35 किलोमीटर की है. इसी पुखरायां से 70 किलोमीटर की दूरी पर बसा है दिबियापुर. दिबियापुर की ज़मीन भी दस्यु जगत के लिए काफी उर्वर रही है. सीमा परिहार इसी दिबियापुर की रहने वाली हैं.

फूलन देवी आज नहीं हैं इसलिए उनसे तो कुछ पूछा नहीं जा सकता लेकिन सीमा परिहार से तो आज भी बात हो सकती है. फूलन देवी के बाद सीमा परिहार पर भी फिल्म बनी थी. सीमा परिहार ने भी समाज और पुलिस की वजह से ही हथियार उठाये थे. पुलिस की ज्यादती के बारे में पहले पता नहीं चल पाता था, पता चल जाता था तो सबूत नहीं मिल पाते थे. आज दुनिया मुट्ठी में आ चुकी है. हर कोई फोटोग्राफर बन चुका है और सोशल मीडिया ने चीज़ों को वायरल करने का ठेका भी ले लिया है.

पुखरायां चौकी इंचार्ज ने एक महिला की जो सरेआम बेईज्जती की उसका वीडियो वायरल है. उस पर हर जगह चर्चा हो रही है. पुलिस अधिकारी चौकी इंचार्ज पर कार्रवाई की बात कर रहे हैं. कार्रवाई क्या होगी यह सबको पता है वह सस्पेंड होगा, फिर वह जाकर महिला और उसके परिवार को धमकाएगा. कोई गवाही नहीं देगा और वह छूट जाएगा.

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली हुकूमत अगर वाकई अपने दिए नारे पर अमल करना जानती होती तो वीडियो ही सबूत है. चौकी इंचार्ज को बर्खास्त कर हथकड़ी में जकड़कर कोर्ट में पेश करवाती मगर ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा क्योकि यही पुलिस हाथरस में रेप पीड़िता की लाश जलाती है, यही पुलिस कोरोना काल में श्मशानों के सामने लोहे की दीवारें उठवाती है. यही पुलिस सरकार का खजाना भरने के लिए लोगों के रात-दिन चालान काटती है. यही पुलिस उन अपराधियों की सम्पत्तियां जब्त कराने में मदद करती है जो सत्ता पक्ष के अपराधी नहीं हैं.

इस समाज की लड़कियां फूलन देवी और सीमा परिहार बनने को मजबूर होती हैं क्योंकि सत्ता पुलिस की मुश्कें नहीं कसती. सरकार रेपिस्ट की जाति और वह किस राजनीतिक दल से सम्बद्ध है इसका ध्यान रखती है. सत्ता की होड़ में दौड़ रही दलित नेता ब्राह्मणों को साधने में लगी है क्योंकि दलित वोट इधर-उधर छिटक चुका है और सत्ता की मलाई चखने के लिए उन ब्राह्मणों को अपने करीब करना है जो कभी आंख में चुभता था.

…और जो सबको साथ लेकर चलने की बात करता रहा है वह ट्वीटर से ही सब कुछ जीत लेने को आमादा है. जो पार्टी आज़ादी के बाद ही हुकूमत पा गई थी वह अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में है. अराजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ तो निर्दोषों के एनकाउन्टर का सिलसिला शुरू हो जाएगा.

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मुद्दे समाज में बहुत से हैं, महंगाई बढ़ी है, नफ़रत बढ़ी है, अराजकता बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है. इन सबसे निबटा जा सकता है मगर फूलनों और सीमा परिहारों को हथियार उठाने से रोकना होगा. आप डाकू-डाकू कहकर किसी से नफरत नहीं कर सकते. नफरत अब उससे करनी होगी जो दस्यु सुंदरियां बनाते हैं.

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