Wednesday - 28 September 2022 - 8:52 AM

लोकतंत्र में वंशवाद बनाम जन-मन

चंचल 
प्रिय प्रधान मंत्री जी !
गुजरात में आपका एक भाषण सुना था , उसके बाद सुनना बंद हो गया । अरसे बाद आज फिर आपका भाषण सुना , लाल क़िले के प्राचीर से । आज आप दुविधा में लगे – , जो बोल रहे थे, वो आपके स्वभाव में नही है , और जो नही बोलते हुए बोलना पड़ रहा था , वहाँ वो पुराना वाला तेवर और जज़्बा घिसा हुआ दिख रहा था । आज आपने कई दिलचस्प सवाल उठाए , ये उठने चाहिए और उसका हल भी निकलना चाहिए । मसलन “ वंश वाद ” । वंशवाद भारत की सबसे बड़ी बीमारी है । सियासत में इसे डॉक्टर लोहिया ने ढकेला ।
ऐसा नही की इसके पहले वंशवाद नही था , था , लेकिन वह इस कदर भारतीय समाज का हिस्सा बन चुका था की हम उसे जी रहे थे , और सहने के आदी हो चुके थे । डॉक्टर लोहिया ने जब इस बीमारी पर उँगली रखी तो सियासत ने इसे काट छाँट कर एक “चिप” बना दिया दिया और उसे उनके अज़ीज़ और उनके अपने गढ़े हुए “ विरोधी “ (?) पंडित नेहरु के गुलाब के साथ टाँक दिया । वंशवाद सिकुड़ कर एक जुमला बन गया । जम्हूरियत की सादगी , और बोलने की छूट ने नड्डा , कल्याण सिंह , अमित शाह वगैरह को भी धड़ल्ले से वंशवाद बोलने का खुला अवसर दे दिया और उस पर तालियाँ भी बजती है । तक़रीबन तीस साल से नेहरु परिवार सत्ता में नही है , लेकिन गांधी नेहरु परिवार वंशवाद का आरोपी होता रहेगा ।
प्रधान मंत्री जी ! कांग्रेस का सदर और संसद में कांग्रेस का नेता दोनो का चुनाव जिस प्रक्रिया से गुजरता है उसका सबसे बड़ा हिस्सा “ आम जन की इच्छा “ से निकल कर आता है । दर्जनो उदाहरण हैं । कांग्रेस संगठन में पंडित जवाहर लाल नेहरु आख़िरी सीढ़ी पर हैं , प्रधान मंत्री के सवाल पर सरदार पटेल , पुरुषोत्तम दास टंडन या राजेंद्र प्रसाद पंडित नेहरु से बहु आगे थे , लेकिन प्रधान मंत्री बने पंडित जवाहर लाल नेहरु । हम जानते हैं , बहुत से लोग इस सवाल पर चीखेंगे क़ि बापू ने ज़्यादती की । एक सवाल का उत्तर आप देंगे ? – गांधी जी , पंडित नेहरु , सरदार पटेल या कोई भी हो “ आम जन “ में किसकी पकड़ सबसे ज़्यादा है ? इसका जवाब होगा – गांधी जी , एक मात्र आम जन के नेता हैं और गांधी जी उनके मात्र प्रतिनिधि है । वह गांधी जी का वीटो नही था , आम जन की आकांक्षा की प्रस्तुति थी , जिसे एक साल के अंदर ही पटेल जी ने स्वीकारा । दो – गांधी जी ने एक बार प्रधान मंत्री बनवाया था , बाक़ी दो बार जब नेहरु प्रधान बने तब तो गांधी जी थे भी नही ।
मोदी जी जब आपके लोग गांधी नेहरु परिवार पर आरोप लगाते हैं तो यह आम जन की भावनाओं का मज़ाक़ उड़ाते हैं और उसे कुरेदते हैं । वंश वाद का दूसरा उदाहरण देखिए । कांग्रेस वंशवाद की पूजक होती तो पंडित नेहरु की मृत्यु के बाद सीधे श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री बनती , लेकिन ऐसा नही हुआ , अंतरिम प्रधान मंत्री बने गुलज़ारी लाल नंदा और इसके बाद नेहरु मंत्रिमंडल के सबसे ईमानदार मंत्री लाल बहादुर शास्त्री , बने प्रधान मंत्री । शास्त्री जी के मृत्यूके बाद फिर आए गुलज़ारी लाल नंदा और तब जाकर रेस में आयी श्रीमती इंदिरा गांधी ।
कांग्रेस के अंदरूनी खाते में श्रीमती गांधी अपने शुरुआती दिनो में बहुत विरोध झेलती रही । 1969 में तो कांग्रेस ने श्रीमती गांधी को कांग्रेस से बाहर ही कर दिया । पूरी कांग्रेस एक तरफ़ थी , सामने इंदिरा गांधी अकेले हैं , उनके साथ कुल जमा पूँजी पाँच लोग और निकले हैं , मोहन धारिया , चंद्र्शेखर , राम धन , कृष्ण कांत और अर्जुन अरोड़ा । दो साल के बाद 71 में आम चुनाव हुआ और श्रीमती इंदिरा गांधी प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठी । यह वंशवाद रहा या जन की आकांक्षा ?
श्रीमती इंदिरागांधी की शहादत के बाद राजीव जी प्रधान मंत्री बने । लम्बे विमर्श के बाद । यह बात किसी से छिपी हुई नही है क़ि श्रीमती गांधी की हत्या के बाद न तो राजीव गांधी और नही श्रीमती सोनिया गांधी इस पक्ष में रहीं वे प्रधान मंत्री बने । लेकिन कांग्रेस के सामने दूसरा कोई चारा नही था । राजनीति में यह जो चारा है न इसकी ही अहमियत होती है । इसे ही जनमन की राय कहते हैं । बहरहाल । प्रधान मंत्री जी ! हम चाहते हैं की वंशवाद को समूल नष्ट किया जाय । लेकिन आप नही कर पाएँगे , क्यों इसी की जड़ पर आप खड़े हैं । दो तीन मुद्दा बता कर बाक़ी आपकी इच्छा शक्ति पर छोड़ दूँगा ।
समाज विकास जिस गति से चलता है वह कुछ हिस्सा अपने साथ लिए चलता है । मसलन हम आदिम युग से , सामंती युग से आए , फिर पूंजीवाद । ( आगे का रास्ता मार्क्स बता गये हैं -सर्वहारा की समाजवादी सत्ता )
कहने को हम जन तंत्र में आ गये लेकिन आज भी थोड़ा आदिम ( सोच ) और सामंती व्यवस्था ( आचरण ) के साथ आगे बड़े और पूंजीवाद के यहाँ गिरवी रख दिए गये । आप सवाल पूछ सकते हैं – जन तंत्र तक यह आदिम और सामंती सोच कैसे आयी ?
https://edtimes.in से साभार
इसके जवाब पर आप बग़ल झांकने लगेंगे , क्यों क़ि इसी आधार पर आप खड़े हैं – दुबे , मिश्रा , उपधिया का बेटा ब्राह्मण ही होगा , कर्म में चाहे वह जूते की दुकान ही क्यों न लगाए । इसकी चालाकी देखिए बाभन बन कर उच्च आसन , और चर्मकार को ढकने के लिए “ बाटा , वुडलैंड , रेगल , का सबसे बड़ा शो रूम “ का प्रचार । क्षत्रिय ? गाँव में बाबू साहेब , पीढ़ियों से ज़मींदारी नही देखी , ख़ानदान में कोई सीमा की तरफ़ देखा तक नही , लेकिन हैं सामंत । संघियों ने एक चुनाव में “ सूंघनी “ सूंघा दिया था क़ि जनसंघ जिताओ तो ज़मींदारी वापस मिल जायगी । तब से बाबू साहेब भैंसे के पीछे चले जा रहे हैं – कभी तो पकेगा । 2014 में पक गया लेकिन आज आप ने फिर डगर लगा दिया पच्चीस साल और । वंशवाद की जड़े यहाँ हैं मोदी साहेब !
कांग्रेस ने भाषा से कम लेकिन आचरण से जातिपाँति के ख़िलाफ़ काम करती रही , समाजवादी आंदोलन ( हम पार्टी की बात नही कर रहे ) ने कांग्रेस से निकलने के बाद उन्ही कार्यक्रमों को चलाया , जाति तोड़ो , उसका बड़ा कार्य क्रम रहा । छाप तिलक बंद करो , जनेऊ तोड़ो । प्रधान मंत्री जी ! वंशवाद इसे कहते हैं । डाक्टर का बेटा , डाक्टर बनेगा , जज का बेटा जज , नेता का नेता चपरासी का बेटा चपरासी वंशवाद यह है ।
अंत में आज आपने अपनी कुछ बातें सुधारी , इसके लिए शुक्रिया । आपने भाषा की शुचिता पर बोला , औरत की इज्जत पर ग़ैरज़िम्मेदार टिप्पणी के ख़िलाफ़ आग्रह किया , अछा लगा । आपके कुछ शब्द , टिप्पणी , या जुमले इसी भाषा की जद में गिरे मिले – जर्सी गाय , विधवा , हज़ार की गर्ल फ़्रेंड , रेनकोट फ़न कर बाथ रूम ने नहाना । वग़ैरह भी शायद दुरुस्त भाषा नही है ।
बोलते रहें
श्रोता
(चंचल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष है, और वर्तमान में स्वतंत्र लेखन और चित्रकारी करते हैं)
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