Thursday - 22 October 2020 - 11:33 PM

आखिर पूरा हुआ पीएम मोदी का संकल्प

कृष्णमोहन झा

देश में क्रांतिकारी कृषि सुधारों का मार्ग प्रशस्त करने वाले दो ऐतिहसिक विधेयकों को कल संसद की मंजूरी मिल चुकी है। लोकसभा में तो सरकार के पास प्रचंड बहुमत होने के कारण वहाँ सरकार को इन विधेयकों को पारित कराने में कोई दिक्कत होने का सवाल ही नहीं था परंतु राज्य सभा में सरकार के पास पर्याप्त बहुमत न होने के कारण उच्च सदन में इन विधेयकों को पारित होने से रोकने के लिए विपक्ष ने संसदीय मर्यादाओं और शिष्टाचार को ताक पर रखने में भी कोई संकोच नहीं किया इसके बावजूद सरकार उच्च सदन में इन विधेयकों को ध्वनि मत से पारित कराने में सफल हो गई।

प्रधानमंत्री मोदी ने इन विधेयकों को संसद की मंजूरी मिलने के देश भर के किसानों को बधाई देते हुए कहा है कि सरकार का यह कदम किसानों के आर्थिक उन्नयन में महत्वपूर्ण साबित होगा। अब किसानों के लिए नए अवसर उपलब्ध कराएगा और मुश्किल समय में रक्षा कवच का काम करेगा। जिन बिचौलियों के कारण किसानों को उनकी पैदावार का सही मूल्य नहीं मिल पाता था। उनसे किसानों को मुक्ति मिलेगी।

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केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों का अभिनंदन करते हुए उन्हें आश्वस्त किया है कि इन विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे उन्हें भयभीत होने की जरूरत हो। अगर किसी किसान संगठन अथवा किसी किसान के मन में इन विधेयकों के किसी प्रावधान को लेकर कोई शंका हो तो उसके निराकरण के लिए कोई भी उनसे कभी भी मिल सकता है।

कृषि मंत्री ने कहा है कि खेती के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों का संकल्प प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में अपने प्रथम कार्य काल की शुरुआत में ही ले लिया था और तबसे यह सिलसिला निरंतर जारी है। इन विधेयकों को संसद से अनुमोदित कराने में केन्द्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

2022 तक किसानों की आय दुगनी करने का जो महान लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार के लिए तय किया है। उसे समय सीमा में अर्जित करने की दिशा में मील का पत्थर माने जाने वाले इन महत्वाकांक्षी कृषि विधेयकों को तैयार करने से लेकर संसद के मानसून सत्र में ही पारित कराने की पूरी जिम्मेदारी केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के कंधों पर था। जिनकी गणना केंद्र सरकार के उन मंत्रियों में प्रमुखता से होती है जो प्रधानमंत्री मोदी की गुड बक्स में शामिल हैं। तोमर के कुशल मार्ग दर्शन में तैयार इन विधेयकों में किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है।

नरेंद्र सिंह तोमर ने उक्त विधेयकों का विरोध करने के लिए कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि इन कृषि सुधारों को कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी शामिल किया था परंतु वह इन पर अमल का साहस नहीं जुटा पाई। इतिहास वही बनाते हैं जो इतिहास से आगे निकल जाते हैं।

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार ने यह साहसिक कदम उठाने का फैसला किया जिसका मुख्य उद्देश्य 2022 तक किसानों की आय को दो गुना करना है। सरकार के इस कदम से किसानों के जीवन में खुशहाली आना सुनिश्चित है।

दोनों विधेयकों को लेकर व्यक्त की जा रही सारी आशंकाओं को निराधार बताते हुए तोमर कहते हैं कि इन विधेयकों में न्यूनतम समर्थन मूल्य का उल्लेख न होने का यह मतलब कदापि नहीं है कि सरकार अब मंडी में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीदी की व्यवस्था को खत्म करने जा रही है।

मोदी सरकार ने ही स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को मंजूर करते हुए किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का फैसला किया। खरीफ की फसल के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर चुकी है और रबी की फसल के लिए भी शीघ्र ही न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा करने जा रही है।

आजादी के बाद सबसे बड़े कृषि सुधारों की दिशा में तेज़ी से कदम बढा रही मोदी सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस पहल को किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी बताते हुए कहा है कि अभी तक किसान के लिए अपनी पैदावार मंडी में बेचना एक मजबूरी थी जहां एक निश्चित मात्रा में ही वह अपनी उपज बेच सकता था और शेष के लिए उसे बिचौलियों पर निर्भर रहना पडता था।

परंतु अब वह अपनी उपज को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी उद्योगपति, एन जीओ, स्टार्ट अप अथवा प्रोसेसर को बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। इनमें से जिसके साथ किसान का समझौता होगा वह प्राकृतिक विपदा के कारण किसान को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बाध्य होगा। इसमें सबसे मुख्य बात यह है कि किसान की जमीन की कोई लिखा पढी नहीं होगी इसलिए जमीन पर किसान के स्वामित्व पर कोई आंच नहीं आएगी।

किसान जिसके साथ भी संविदा खेती का समझौता करेगा उसके द्वारा किसान को अच्छी फसल लेने के लिए उत्तम तकनीक सहित सभी आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। तोमर कहते हैं कि जो विपक्षी नेता यह कहते हैं कि सरकार किसानों को पूंजीपतियों का गुलाम बना रही हैं। वे केवल भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी यह कोशिश कभी कामयाब नहीं होगी।

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गौरतलब है कि इन दो विधेयकों को संसद में पेश किए जाने के पहले से ही कुछ राज्यों के किसान आंदोलित कर रहे हैं। वे इन विधेयकों के प्रावधानों को किसान विरोधी बताकर उन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं जबकि केन्द्र सरकार बराबर यह कह रही है कि ये दोनों विधेयक कृषि सुधार की दिशा में क्रांति कारी कदम हैं जिनसे किसानों के जीवन में खुशहाली आना तय है लेकिन विपक्ष यह मानने के लिए तैयार नहीं है।

यह भी कम अचरज की बात नहीं है कि 2019 में अपने चुनाव घोषणा में किसानों से इसी तरह के कृषि सुधारों का वादा करने वाली कांग्रेस पार्टी भी इन विधेयकों का विरोध करने में कोई संकोच नहीं कर रही है जबकि इन विधेयकों के प्रावधान तो कांग्रेस की मंशा के अनुरूप ही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी सरकार की इस पहल से कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों को किसानों के बीच अपना रहा सहा जनाधार खिसकने का डर सताने लगा है।

सत्तारूढ़ भाजपा नीत संयुक्त राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के एक घटक अकाली दल के कोटे से मंत्री हरसिमरन जीत कौर का इन विधेयकों के विरोध में मोदी सरकार से इस्तीफा भी इसी डर की ओर इशारा करता है यद्यपि अकाली दल ने राजग से नाता नहीं तोड़ा है।

हरसिमरन जीत कौर ने कहा है कि सरकार ने इन विधेयकों को संसद में पेश करने के पूर्व अकाली दल का पक्ष जानने की आवश्यकता नहीं समझी और उसे विश्वास में लिए बिना ही ये विधेयक संसद में पेश कर दिए। अकाली दल के मुखिया और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह बादल अपने दल को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी बताते हुए कहते हैं कि राज्य का हल अकाली किसान है और हर किसान अकाली है इसलिए उनका दल किसानों की मुश्किलें बढाने वाले इन विधेयकों का समर्थन नहीं कर सकता।

आश्चर्य की बात तो यह है कि जब केन्द्र सरकार ने संसद में इन विधेयकों को पेश करने के पहले जून में इसी आशय के अध्यादेश जारी किए थे तब सत्तारूढ़ गठबंधन के घटक के रूप में अकाली दल अध्यादेशों के पक्ष में था। उस समय अकाली तल ने कोई ऐतराज नहीं जताया।

दरअसल अकाली दल को जब यह आशंका सताने लगी कि राज्य की कांग्रेस सरकार इन विधेयकों का पुरजोर विरोध करके खुद को किसानों का हितैषी साबित करने की कोशिश में सफल हो सकती है तो उसने हरसिमरन कौर को केन्द्र सरकार से इस्तीफा देने का निर्देश दे दिया।

अकाली दल को किसानों के बीच अपने तेजी से घटते जनाधार की चिंता सता रही है इसीलिए उसे इन विधेयकों पर यू टर्न लेने के लिए विवश होना पड़ा। राज्य की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी सरकार से हरसिमरन कौर के इस्तीफे को बहुत देर से उठाया गया छोटा सा कदम निरूपित किया है।

उधर विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने तो पहले ही यह ठान लिया है कि वह विरोध के लिए विरोध की अपनी नीति से पीछे नहीं हटेगी इसलिए वह भी इन विधेयकों को किसान विरोधी बता कर खुद को हितैषी बताने की कोशिश में जुटी हुई है।

मोदी सरकार और भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह इन विधेयकों को लेकर किसानों को गुमराह करना चाहती है जबकि इन विधयकों के माध्यम से सरकार किसानों को ऐसा रक्षा कवच उपलब्ध कराने की मंशा रखती है जो उन्हें बिचौलियों से मुक्ति दिलाएगी इसलिए सरकार अपने रुख पर अडिग दिखाई दे रही है परंतु अब यह उसकी जिम्मेदारी है कि इन विधेयकों को लेकर आंदोलनरत किसानों के मन में जो आशंकाएं उन्हें दूर करे अन्यथा विपक्षी दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन विधेयकों के सकारात्मक प्रभावों के बारे में किसानों को भ्रमित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ेंगे।

सरकार को किसानों के प्रतिनिधि संगठनों के साथ संवाद प्रक्रिया जारी रखनी होगी। इसमें दो राय नहीं हो सकतीं कि कोई भी विपक्षी दल को संसद के अंदर और सरकार के फैसलों से असहमति जताने का पूरा अधिकार है परंतु राज्यसभा में किसानों से संबंधित विधेयक का विरोध करने के लिए कुछ विपक्षी दलों के सांसदों ने जो अमर्यादित आचरण किया वह किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता और फिर जिस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इसी तरह के कृषि सुधारों का वादा किया हो उसका इन विधेयकों के विरोध में खड़े होना तो बिलकुल ही समझ के परे है।

 

कांग्रेस की कथनी और करनी के इसी अंतर के कारण गत लोकसभा चुनावों में उसे मतदाताओं ने शर्मनाक पराजय का सामना करने के लिए विवश कर दिया। देश में किसानों के आर्थिक उन्नयन हेतु जिन कृषि सुधारों की लंबे अरसे से मांग की जा रही थी उन सुधारों को लागू करने का साहस अगर पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार दस वर्षों में नहीं दिखा पाई तो कांग्रेस को अपनी असफलता स्वीकार करते हुए मोदी सरकार की इस पहल का समर्थन करना चाहिए था परंतु उसने सरकार का विरोध करके केवल खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे कहावत ही चरितार्थ की है। दरअसल उसे तो इन विधेयकों का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार ही नहीं है।

बहरहाल, मोदी सरकार ने किसानों की खुशहाली सुनिश्चित करने की दृष्टि से जून में जो तीन अध्यादेश जारी किए थे उनमें से दो अब फार्मर्स एंड प्रोड्यूस ट्रेड एंड कामर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) तथा फार्मर्स (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट आन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विस बिल के रूप में संसद से अनुमोदित हो चुके हैं और अब इन्हें राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

इन विधेयकों को संसद द्वारा अनुमोदित कर दिए जाने के बावजूद विपक्ष हार मानने के लिए तैयार नहीं है। विपक्ष ने राज्यसभा के उपसभापति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है जिस पर, 100 लोगों नेहस्ताक्षर किए हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एवं कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर एवं भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा समेत अनेक पार्टी नेताओं ने राज्य सभा में बहस के दौरान विपक्ष के आचरण को शर्मनाक बताया है।

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी टकराव पर जल्दी विराम लगने के आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं। दरअसल विपक्ष केवल अपना राजनीतिक हित साधने की कोशिश कर रहा है लेकिन वह दिखावा कर रहा है कि किसानों के हितों की सबसे अधिक चिंता उसे ही है।

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Jubilee Post उत्तरदायी नहीं है।
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