Wednesday - 25 November 2020 - 7:47 AM

नाकाम मोहब्बत ने जो गढ़ा उसे साहिर कहा गया

जुबिली न्यूज़ डेस्क

लखनऊ. मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं।

मोहब्बत को इस अंदाज़ में देखने वाले साहिर लुधियानवी को हकीकत की ज़िन्दगी में मोहब्बत नसीब नहीं हो पाई. पढ़ाई के दौर में उन्हें अमृता प्रीतम से मोहब्बत हुई मगर इस मोहब्बत में उनकी गरीबी और उनका मजहब आड़े आ गया. अमृता प्रीतम के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से भी निकाल दिया गया.

उनकी दूसरी मोहब्बत का नाम था सुधा मल्होत्रा. यह मोहब्बत भी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच पाई. मोहब्बत में नाकामी ने उन्हें आक्रोश का शायर बना दिया. उनके लेखन को सरकार विरोधी समझा जाने लगा. सरकार ने उनके खिलाफ वारंट भी जारी किया लेकिन साहिर का कलम रोक सके ऐसी कोई ताकत तैयार नहीं हो पाई.

आठ मार्च 1921 को लुधियाना के एक ज़मींदार परिवार में पैदा हुए थे साहिर. माँ-बाप में पटी नहीं तो उनमें अलगाव हो गया. वह माँ के साथ रहे तो उनके हिस्से गरीबी आयी. तब वह सिर्फ 18 साल के थे जब लुधियाना के गवर्नमेंट कालेज में पढ़ाई के दौरान उनकी ज़िन्दगी में अमृता प्रीतम आयीं.

अमृता साहिर की शायरी की कद्रदान थीं. जब यह रिश्ता मोहब्बत में बदल गया तो उनके सामने मुश्किलों के पहाड़ खड़े हो गए. अमृता के पिता ने साहिर को कालेज से ही निकलवा दिया. स्कूल से निकलने के बाद उन्होंने पेट भरने के लिए तमाम छोटे-छोटे काम किये. कालेज से निकलने के चार साल बाद साहिर का पहला काव्य संग्रह तल्खियाँ प्रकाशित हुआ. इस काव्य संग्रह ने उन्हें रातों-रात चर्चा का केन्द्र बना दिया. दो साल के भीतर वह एक उर्दू अखबार अदब-ए-लतीफ़ के सम्पादक बन गए.

वह जिस अंदाज़ में कलम चलाते थे उसे विद्रोह की शायरी समझा जाता था. उनके लेखन को सरकार विरोधी समझा जाता था. सरकार ने उनके खिलाफ वारंट भी जारी किये.

अखबार की दुनिया छोड़ने के बाद वह फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे. 1949 में फिल्म नौजवान के लिए उन्होंने ठंडी हवाएं लहरा के आयें लिखा जो बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद उन्होंने कभी-कभी, बाज़ी, प्यासा और फिर सुबह होगी जैसी फिल्मों के गीत लिखे.

साहिर को मोहब्बत नहीं मिली क्योंकि वह मुसलमान थे, साथ ही गरीब भी. हकीकत की ज़िन्दगी में साहिर नास्तिक थे. अपने लेखन से उन्होंने अपनी गरीबी भी दूर कर ली लेकिन जितना ध्यान उन्होंने दोस्तों का रखा उतना अपना नहीं रख पाए. सुधा मल्होत्रा से मोहब्बत के बाद भी जब वह उनसे शादी नहीं कर पाए तो उन्होंने ज़िन्दगी भे शादी न करने का फैसला किया. 25 अक्टूबर 1980 को सिर्फ 59 साल की उम्र में साहिर ने हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं.

साहिर वह पहले गीतकार थे जिन्हें अपने गानों की रायल्टी मिली. आकाशवाणी पर उनके गीत प्रसारण के समय गायक के साथ उनका भी नाम लिया गया. यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों, और मैं पल दो पल का शायर हूँ पल दो पल मेरी जवानी है. जैसे गीतों में साहिर का व्यक्तित्व पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है.

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साहिर नहीं हैं तो उनकी एक नज्म ज़ेहन में घुमड़ती है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने को मजबूर करते हुए यह चेतावनी भी देती है कि न उठे तो फिर वक्त नहीं मिलेगा :-

आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा,

हर बस्ती में आग लगेगी हर बस्ती जल जायेगी,

सन्नाटे के पीछे से तबै एक सदा ये आयेगी,

कोई नहीं है कोई नहीं है कोई नहीं है कोई नहीं.

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