Wednesday - 26 February 2020 - 1:50 PM

मीडिया क्यों शाबाशी और समर्थन की हकदार है ?

केपी सिंह

कलयुग बोध पत्रकारिता में भी सालता है। इस बोध के चलते लगता है कि वर्तमान बहुत खराब जमाने के रूप में सामने है। अतीत में जो लोग पत्रकारिता में थे वे बहुत पवित्र आत्माएं थीं, आज सबकी सोच बहुत गंदी है। नेता की बात चले, पुलिस की बात चले इसी से निकले जुमले सुनने को मिलते हैं। मीडिया को लेकर भी ऐसा ही है। लगता है कि कल तक पत्रकारिता में सिर्फ फरिश्ते काम कर रहे थे आज चारों तरफ मीडिया में बदमाशों की भरमार हो गई है। वस्तुस्थिति यह है कि मीडिया के क्षेत्र में निचले स्तर तक पेशेवर तरीके से काम करने की बाध्यता बढ़ती जा रही है। जिससे आज की पत्रकारिता का काम और जबावदेही बहुत बढ़ गई है।

कई दशक पहले तक पत्रकारिता केवल आपराधिक और राजनैतिक हलचलों तक सिमटी हुई थी। जब केवल मुद्रित पत्रकारिता का अस्तित्व था, आपराधिक घटनाओं को लेकर भी तथ्य जुटाने पर बहुत ध्यान नही दिया जाता था। खबरें भी घटना को आधार बनाकर समग्र वैचारिक टिप्पणी का प्रतिरूप थी।

जमीनी रिपोर्टिंग की शुरूआत हिंदी में उदयन शर्मा ने की। अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह काम आजादी के बाद में भी कितने दिनों बाद शुरू हो पाया। पूरे तथ्यों का उदयन शर्मा पंथ में इस तरह से प्रस्तुतिकरण होने लगा कि घटनाएं बिना अतिरिक्त कमेंट जोड़े वैचारिक निष्पत्तियों को प्रतिपादित करते प्रतीत होने लगीं।

विकास और भ्रष्टाचार के मामले में नये दौर में मीडिया का दायरा बहुत बढ़ा है। बीट व्यवस्था में जो विभाग सौंपा जाये उसके कामकाज की मास्टरी की अपेक्षा संबंधित रिपोर्टर से की जाने लगी है। कई जगह जहां सड़क, पुल बनवाने जैसी जरूरतों की उपेक्षा की जा रही थी पत्रकारों ने अपने प्लेटफार्म पर सशक्त अभियान चलाकर जिम्मेदारों को लोगों के दर्द की ओर मुखातिब होने और ऐसे कामों को प्राथमिकता के आधार पर कराने के लिए मजबूर किया। विकास के मामले में अग्रदूत की जैसी भूमिका मौजूदा मीडिया निभा रही है। यह पहले के समय से काफी आगे की पत्रकारिता है।

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भ्रष्टाचार के मामले में भंडाफोड़ के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल सबसे ज्यादा मीडिया के लोग कर रहे हैं। जो प्रभाव विजीलेंस और एंटीकरप्शन विभाग अपने उददेश्यों को फलीभूत करने के लिए पैदा नही कर पाये मीडिया ने उसे अंजाम दिया है। प्रशासन के भ्रष्ट तत्व शोपीस बनकर रह गये सरकारी पहरेदारों से नही डरते लेकिन मीडिया के डर से खुलेआम सुविधा शुल्क मांगने और लेने में अब उनका दिल धुकर-पुकर करता है।

सबसे बड़ा काम मीडिया ने आम आदमी के बीच के उन गुमनाम साधकों को समाज के रियल हीरो के रूप में उभारने का किया है जो कोई ऐसा अनूठा कार्य बिना किसी लालसा के कर रहे थे। जिसकी गुरुता और महत्व का भान उन्हें खुद नही था। उन्हें लाइमलाइट में लाने की मुहिम छेड़कर मीडिया ने समाज की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने के मामले में क्रांति को अंजाम देने जैसी भूमिका का निर्वाह किया है।

आज ब्रेकिंग न्यूज का जमाना है। घटना को होते ही तुरंत फ्लैश करने की जबाबदेही रिपोर्टर की होती है। इसके लिए 24 घंटे उसे सतर्क रहना पड़ता है। यहां तक कि प्रिंट मीडिया भी धीरे-धीरे वेब मोड पर आ गई है। इसलिए समाचार संकलन के मामले में सूचना आते ही एक्शन शुरू करने के लिए पत्रकार को तैयार रहना पड़ता है। आज के पत्रकारों की इस बहुआयामी व्यस्तता को उन्हें कोसने के पहले ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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हालांकि पत्रकारिता आज ऐसे बेरोजगारों की भीड़ की चपेट मे है जिनके सामने अस्तित्व का संकट होने से आपाद धर्म निभाने के अलावा कोई चारा न होने के कारण मूल्य मर्यादाओं का तकाजा तिरोहित रहता है। वैसे भी जब जिलों में इक्का-दुक्का पत्रकार होते थे तो आसानी से चिन्हित हो जाने के कारण उन्हें लोकलाज की बहुत परवाह करनी पड़ती थी। इतनी बड़ी भीड़ को तब जैसे सामाजिक अनुशासन से नियंत्रित रखना संभव नही रह गया है।

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बिडंबना यह है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल मीडिया को लेकर अभी तक रूल्स रेग्युलेशन नही बने हैं। खासतौर से वीडियो पोर्टल इसके कारण बहुत बदनाम हो रहे हैं। अगर रूल्स रेग्युलेशन बन जायें और फीस वसूल होने लगे तो अंधाधुंध शुरू हो रहे वीडियो पोर्टलों पर काफी हदतक लगाम लग सकती है। ऐसी स्थिति में वही पोर्टल काम कर पायेगें जो पेशेवर ढंग से चलते हैं। इससे छुटटा पत्रकारों की बाढ़ थमेगी। यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी जिलों और कस्बों में पेशेवर समझ रखने वाले और पेशेवर अनुशासन में रहने वाले रिपोर्टर तैनात नही हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पेशेवर रिपोर्टरों की तैनाती के मामले में अपनी साख की परवाह करनी पड़ेगी।

कुल मिलाकर कुछ बातें पुराने समय की अच्छी थीं, कई बातें नये जमाने भी अच्छी हैं। इस मामले में तथागत बुद्ध के अनित्यवाद को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि दुनियां में कुछ ऐसा नही है जो नित्य और शाश्वत हो। दुनियां क्षण-क्षण बदलती है। इसलिए जमाना बदल गया है यह कहने का कोई औचित्य नही है। आज की पत्रकारिता की चुनौतियां अलग ढंग की हैं। पत्रकारिता के व्यवसायीकरण को लेकर चाहे जितनी छाती पीटी जाये लेकिन इसे नही भूला जाना चाहिए कि इस प्रभावी विधा के लिए अभी भी सामाजिक सरोकार ही प्राण वायु की तरह हैं।

पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, उद्यमिता को जागृत करने, सैन्य बल के साथ समाज की श्रद्धा और समर्थन जताने, सेवा के मूल्य को आगे लाने आदि प्रतिबद्धताओं के लिए मौजूदा पत्रकारिता महत्वपूर्ण योगदान कर रही है। इसलिए आज के मीडिया परिवार को लेकर निराशा प्रकट करने का कोई औचित्य नही है। मीडिया परिवार की नई पीढ़ी अपने ढंग से लोकतंत्र और समाज को समृद्ध करने का कारक सिद्ध हो रही है। इसके लिए वह शाबाशी और समर्थन की हकदार है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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