अरावली की परिभाषा पर बड़ा कदम: सुप्रीम कोर्ट ने 5 सदस्यीय एक्सपर्ट कमेटी गठित की

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सीमा के पुनर्मूल्यांकन के लिए एक पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति का उद्देश्य यह तय करना है कि अरावली पर्वत श्रृंखला के दायरे में कौन-कौन से क्षेत्र आते हैं और इसकी वैज्ञानिक परिभाषा क्या होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल हैं, ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में निर्णय विशेषज्ञों की राय के बिना नहीं लिए जा सकते।
कोर्ट ने समिति को 31 अगस्त तक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने और मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को तय करने का निर्देश दिया है।
समिति में कौन-कौन शामिल?
इस हाई-लेवल कमेटी की अध्यक्षता ICFRE (Indian Council of Forestry Research and Education) के महानिदेशक करेंगे। इसके अलावा चार प्रमुख विशेषज्ञ सदस्य होंगे—
- डॉ. सुभाष आशुतोष (पूर्व महानिदेशक, भारतीय वन सर्वेक्षण)
- डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा (पूर्व निदेशक, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण)
- बृज मोहन सिंह राठौर (पूर्व संयुक्त सचिव, पर्यावरण मंत्रालय)
- प्रो. अशोक के. भटनागर (पूर्व विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय)
इसके साथ ही दो विशेषज्ञों को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है और पर्यावरण मंत्रालय का एक वरिष्ठ अधिकारी सदस्य सचिव होगा।
क्या है विवाद का मूल मुद्दा?
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा परिभाषा पर सवाल उठाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि दो अरावली पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से अधिक दूरी है तो उसे अरावली क्षेत्र नहीं माना जाता।
कोर्ट का कहना है कि यह परिभाषा पर्यावरणीय दृष्टि से गलत हो सकती है क्योंकि इससे कई महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाते हैं, जिससे वहां खनन और निर्माण जैसी गतिविधियों का खतरा बढ़ जाता है।
राजस्थान की पहाड़ियों पर भी सवाल
कोर्ट ने यह भी जांच का निर्देश दिया है कि क्या राजस्थान की हजारों पहाड़ियों में केवल कुछ ही तय मानकों पर खरी उतरती हैं, और क्या बाकी क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण से वंचित रह गए हैं।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम फैसला
यह कदम अरावली क्षेत्र के संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। समिति अब वैज्ञानिक और भूगोल आधारित अध्ययन कर अरावली की वास्तविक सीमा तय करेगी।



