Monday - 30 January 2023 - 10:36 AM

Lok Sabha Election: जाने क्या है कानपुर लोकसभा सीट का इतिहास

उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे बसा औद्योगिक शहर कानपुर देश की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों मे से एक है। इसे ‘लेदर सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है। लखनऊ से 80 किलोमीटर दूर स्थित यह नगर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी के नाम से भी जाना जाता है।

नाना राव पेशवा का किला इस शहर की ऐतिहासिकता की गवाही देता है। एक दौर में कपड़ा उद्योग के चलते इसे ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। हालांकि वक्त और सरकार की उपेक्षा के चलते यह शहर अपनी पहचान खोता चला गया और देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया।

 ‘कर्णपुर’

महाभारत के जमाने में कानपुर ‘कर्णपुर’ के नाम से जाना जाता था। यूपी के बड़े शहरों में से एक कानपुर अपने आईआईआटी कॉलेज के लिए पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान रखता है। यह पूरा क्षेत्र 605 किलोमीटर में फैला हुआ है।

आबादी/ शिक्षा

कानपुर में कुल 29,20,000 आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है, जिनमें 15,85,000 पुरुष और 13,35,000 महिलाएं शामिल हैं। अनुसूचित जाति 11.72 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की 0.12 फीसदी आबादी यहां रहती है। इसके अलावा ब्राह्मण, वैश्य और मुस्लिम मतदाता के अलावा पंजाबी वोटर भी निर्णयक भूमिका में हैं।

हिन्दू बहुल क्षेत्र

यहां की साक्षरता दर 70.36 प्रतिशत है। वर्तमान में यहां मतदाताओं की कुल संख्या 1,611,248 है जिसमें महिला मतदाता 721,802 और पुरुष मतदाता की संख्या 889,344 है। कानपुर लखनऊ के बाद यूपी का सबसे बड़ा शहर है। यह आबादी के मामले में भारत में 12वें स्थान पर है। कानपुर जिला मुख्यत: हिन्दू बहुल क्षेत्र है।

राजनीतिक घटनाक्रम

कानपुर संसदीय सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें गोविंद नगर, सिसामऊ, आर्य नगर, किदवई नगर और कानपुर कैंट विधानसभा सीट शामिल हैं।

आजादी के बाद से अब तक कानपुर संसदीय सीट पर 17 बार चुनाव हो चुके हैं। इस सीट पर कांग्रेस महज 6 बार जीत का परचम लहरा चुकी है। बाकी 11 बार निर्दलीय और बीजेपी सहित अन्य पार्टियों ने जीत हासिल की है। पहली बार 1952 में हुए चुनाव में कांग्रेस के हरिहरनाथ शास्त्री ने जीत दर्ज की थी।

1957 में दूसरी बार हुए चुनाव में यह सीट के हाथों से निकल गई। 1957 से 1971 तक एसएम बनर्जी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कानपुर सीट का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1977 में भारतीय लोकदल से मनोहर लाल ने जीत हासिल की।

1980 में हुए लोकसभा चुनाव में आरिफ मो. अहमद ने जीत हासिल करते हुए कांग्रेस की वापसी कराई, लेकिन 9 साल बाद 1989 में कांग्रेस के हाथ से यह सीट फिर से निकल गई और सीपीएम से सुभाषनी अली ने जीत दर्ज कराई। राम मंदिर आंदोलन के दौरान बीजेपी ने कानपुर सीट पर अपना कब्जा जमाया। 1991 में जगतवीर सिंह ने पहली बार यहां से बीजेपी का परचम लहराया। इसके बाद बीजेपी 1996 और 1998 में भी यहां से जीतने में कामयाब रही।

कांग्रेस ने 1999 लोकसभा चुनाव में श्रीप्रकाश जायसवाल को उतारकर बीजेपी के मजबूत हो रहे दुर्ग को भेदने में सफल रही। इसके बाद वो 2004 और 2009 में भी यहां से जीतने कामयाब रहे लेकिन 2014 के चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी का इस सीट पर फिर से कब्जा हो गया। भारतीय जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी यहां के सांसद है।

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