Wednesday - 20 October 2021 - 11:48 PM

नन्हे नमकीन : हर जुबान पे चढ़ा है नाम

आज से चौहत्तर साल पहले रायबरेली लखनऊ में आकर बसे हलवाई नन्हे प्रसाद जी ने एक छोटी सी सेव, बूंदी और दालमोठ की दुकान खोली। नन्हे प्रसाद को लेकर दो आदमी और थे सहायक के रूप में। तब एक आने में एक सेर सेव मिलाकर करते थे। नन्हे के सेव की खासियत ये थी कि वे जितने लजीज और करारे होते थे वैसा कोई नहीं बना पाता था। नन्हे के पुत्र नवल किशोर भी अपने पिता की विरासत को पूरे मनोयोग से सम्भालने लगे। पहले आठ दस तरह की आइटम बनते थे अब करीब एक सौ बीस तरह की नमकीन बनती हैं…

जब कोई कोशिश अपना मुकाम पाती है तो उसके पीछे वर्षों की मेहनत और अनुभव का बहुत बड़ा रोल होता है। अब नन्हे नमकीन को ही लीजिए आज उनके नमकीन की धूम शहर में तो है कि शहर के आसपास के जिलों में लोग उनका पता पूछकर पहुंचते हैं।

आज से चौहत्तर साल पहले रायबरेली से शहर आये नन्हे प्रसाद जी ने एक छोटी सी नमकीन बनाने की दुकान गोलागंज में खोली थी। उनका लगाया यह पौधा आज वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। तीसरी पीढ़ी के विशाल वर्मा और विकास वर्मा आज करोबार सम्भालते हैं।

आई टी चौराहे से गोलागंज की ओर बढ़ने के दौरान बीच में बायें हाथ फिजां में तैरती नमकीन की खुशबू आपको उसका सोर्स ढूंढने के लिए मजबूर करती है। तभी सामने बोर्ड पर आपकी नजर जाती है तो आप अनायास ही नन्हे नमकीन भण्डार बढ़ चलते हैं।

यूं तो यह सड़क जाम लगने के लिए कुख्यात है। लेकिन नमकीन के शौकीन हर तकलीफ झेलकर नन्हे नमकीन तक पहुंच ही जाते हैं। लखनऊ शहर का शायद ही कोई नमकीन का शौकीन होगा जिसने नन्हे के हींग के सेव न खाये होंगे।

हलवाई नन्हे प्रसाद जी ने जब यह छोटी सी सेव, बूंदी और दालमोठ की दुकान खोली थी तब दो आदमी और थे सहायक के रूप में। उस जमाने में एक आने में एक सेर सेव मिलाकर करते थे। नन्हे के सेव की खासियत ये थी कि वे जितने लजीज और करारे होते थे वैसा कोई नहीं बना पाता था।

नन्हे के पुत्र नवल किशोर भी अपने पिता की विरासत को पूरे मनोयोग से सम्भालते हैं। नवल किशोर बताते हैं कि पहले आठ दस तरह की आइटम बनते थे अब करीब एक सौ बीस तरह की नमकीन बनती हैं।

तीसरी पीढ़ी के विशाल वर्मा और विकास वर्मा आज करोबार सम्भालते हैं। छोटी सी दुकान को अब आधुनिक स्वरूप दिया गया है। पहले से काफी बड़ी दुकान हो गयी है। काउंटर पर बैठे विशाल वर्मा से मुलाकात होती है। नवल किशोर गद्दी से जा चुके थे।

विशाल बताते हैं कि मैं मेरे बड़े भाई विकास और पिता जी सब मिलकर कारोबार सम्भालते हैं। जैसा कि सब जानते हैं कि हम सभी तरह की नमकीन और बूंदी बनाते हैं। हमारे सेव के दीवाने दूर-दूर से आते हैं। होली के समय में हम दिन रात काम करते हैं तब भी सप्लाई देने में दिक्कत आती है। हमारी एक ही मोटो है कि ग्राहक से जितने पैसे लिये जाएं उतने का उत्तम क्वालिटी का माल दिया जाए।

हम कभी भी क्वालिटी से समझौता नहीं करते। उत्पादन को समय पर डिलीवर करने के लिए हम सेव बनाने की मशीन भी लाये लेकिन उससे वह स्वाद और मजा नहीं आया जो हाथ के बने सेव में आता है। आप यह कह सकते हैं कि हम आज भी परम्परागत तरीके से सेव का निर्माण करते हैं। हमारा हींग सेव सिक्का आइटम है। ऐसा स्वादिष्ट, कुरकुरा और लजीज सेव आपको कहीं भी नहीं मिलेगा।

इसके पीछे भी एक रणनीति है। हम अपने सामने चने की दाल लेकर पिसवाते हैं। फिर हम आठ से दस हजार रुपये किलो की हींग खरीदते हैं। फिर अपने सामने सरसों के तेल को पेरवाते हैं।इन सब क्वालिटी कंट्रोल के बाद ही हम सेव को मार्केट में लाते हैं। लोगों की मांग के अनुसार हम अन्य नमकीन के टेस्ट को बदलते रहते हैं। एक बार हम पटना गये तो वहां एक दालमोठ खायी तो हमें पसंद आ गयी। कारीगर का पता किया। उसे चार हजार रुपये ज्यादा तन्ख्वाह का आफर दिया वह साथ चला आया। आज हमारे पास देश भर से जगह-जगह से लाये गये पैंतीस कारीगर हैं। हम नमकीन में अपना तैयार किया हुआ खास मसाला ही डालते हैं।

हक नमकीनों में पैंतीस से चालीस तरह का मसाला डालते हैं। सभी मसालों की क्वालिटी एवन होती है। हम जो मसाला दालमोठ के लिए तैयार करते हैं उसमें से कई मसालों के बारे में हमारे परिवार व कु़छ विश्वसनीय वर्कर के अलावा कोई नहीं जानता है।

दीपावली में सभी फूड आइटम बनाने वाली कम्पनियां अपने गिफ्ट पैक बाजार में उतारती हैं। क्या आपने इस ओर पहल नहीं की?” इस पर विशाल बताते हैं कि हमने भी गिफ्ट पैक बाजार में उतारे थे लेकिन उतना रिस्पांस नहीं मिला।

अब हम नये तरीके से इस ओर भी सोच रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं कि दीपावली मिठाई का त्योहार ज्यादा है। होली में नमकीन ज्यादा चलता है। उस वक्त हम लोगों की डिमांड ही पूरी नहीं कर पाते तो गिफ्ट पैक के लिए बहुत ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ेगी और मार्केटिंग भी अलग तरह से करनी पड़ेगी।

‘पब्लिक च्वाइस का पता कैसे करते हैं?” विशाल बताते हैं कि लखनऊ के आसपास के कई जिलों आैर तहसील में छोटे व्यापारी हमारा माल थोक में ले जाते हैं, हम उन्हें सैम्पल के तौर पर थोड़ा-थोड़ा माल देकर उनसे लोगों को फीड बैक लेते हैं। कभी-कभी जो माल शहर में कम पसंद नहीं किया जाता है वह अन्य जगह हिट हो जाता है। ऐसे ही सब चलता रहता है।
भविष्य की योजनाओं के बारे में विशाल बताते हैं कि हल्दी राम की तरह से ही ढाई सौ ग्राम से लेकर एक किलो की तक पैकिंग में भी हमारे सभी नमकीन खुले बाजार में मिलेंगे।

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