Sunday - 1 August 2021 - 12:30 AM

“तांडव” के विरोध की कहीं असली वजह ये तो नहीं

शबाहत हुसैन विजेता

लखनऊ. इन दिनों सैफ अली खान और डिम्पल कपाड़िया की वेब सीरीज तांडव को लेकर विवादों का बाज़ार गर्म है. हंगामा बिलकुल उसी तर्ज़ पर है जैसे कि पद्मावत को लेकर करणी सेना ने किया था. पद्मावत का सेट तोड़ा गया, निर्देशक को पीटा गया. सड़कों पर हंगामा काटा गया. सम्पत्तियों को नुक्सान पहुंचाया गया. फिल्म रिलीज़ हुई तो ऐसा कुछ नहीं मिला जो आपत्तिजनक हो. फिर शान्ति छा गई, करणी सेना ने माफी तक नहीं माँगी.

अब तांडव को लेकर तांडव शुरू हुआ है. बयानवीर मुद्दे को धर्म से जोड़ने पर तुल गए हैं. महौल बिगाड़ने की पूरी तैयारी है. तांडव को लेकर विवाद की वजहें क्या हैं इस पार बात करेंगे लेकिन आपको पहले वह वजहें बताते हैं जिसकी वजह से विरोध का बाज़ार सजाया गया है.

भारत में पिछले कुछ सालों से विरोध का भी बाजारीकरण हो गया है. बाज़ार की ज़रूरत की वजह से तरह-तरह की दुकानें सज जाती हैं. विरोध का बाज़ार सजाने वाले अपने काम में काफी सिद्धस्थ हैं. वह छोटी लकीरों को मिटाने में भरोसा नहीं करते. वह उससे बड़ी लकीर खींच देने में यकीन करते हैं.

तांडव का विरोध हकीकत में अर्नब गोस्वामी के उस व्हाट्सएप चैट को बाज़ार से गायब करने की साजिश है जिसकी वजह से पाकिस्तान जैसे आतंकपरस्त देश को भारत के खिलाफ आवाज़ उठाने का मौका मिला. जिसकी वजह से इमरान खान ने दुनिया के सामने भारत को शर्मिंदा किया. इमरान ने सीधे नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप मढ़ा था कि चुनाव जीतने के लिए बालाकोट काण्ड को अंजाम दिया गया.

इमरान ने आरोप मढ़ा कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी फायदे के लिए सैन्य संघर्ष करवा दिया. इस गंभीर आरोप के बाद सरकार को फ़ौरन सक्रिय होना चाहिए था. दिखावे को ही सही अर्नब गोस्वामी को हिरासत में लेकर यह पूछना चाहिए था कि सर्जिकल स्ट्राइक से तीन दिन पहले ही तुम्हें कैसे पता चल गया था. इसके अलावा तुम देश की सुरक्षा से जुड़ी कौन-कौन सी बातें जानते हो ?

सरकार यह कदम उठाती तो पाकिस्तान के मुंह पर भी ताला लग जाता. दुनिया में भी बदनामी के दाग धुल जाते मगर कदम यह उठाया गया कि देश के सामने उससे भी बड़ी लकीर तांडव के रूप में खींच दी गई.

तांडव पालिटिकल ड्रामा है. इसके नौ एपीसोड हैं. 15 जनवरी को इसे रिलीज़ किया गया. इस सीरीज में जेएनयू में घटी कुछ घटनाएं फिल्माई गई हैं लेकिन इस सीरीज में जेएनयू का नाम वीएनयू रखा गया है. वीएनयू यानि विवेकानंद यूनीवर्सिटी. याद करिए हाल ही में जेएनयू में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा लगाई गई है.

तांडव में वह सब कुछ है जो जेएनयू में हुआ. वही आज़ादी-आज़ादी वाले नारे, वही छात्रों पर देशद्रोही होने के आरोप. इस यूनीवर्सिटी में छात्र नाटक कर रहे हैं. एक छात्र जीशान भगवान शिव के किरदार में है. हाथ में त्रिशूल है. शिव नारद से पूछते हैं कि हमारी लोकप्रियता आजकल कम क्यों हो रही है. इस पर नारद कहते हैं प्रभु कुछ सेंसेशनल सा ट्वीट कीजिये. जैसे कालेज के सारे विद्यार्थी देशद्रोही हो गए. आज़ादी-आज़ादी के नारे लगा रहे हैं. तब शिव का किरदार निभा रहे जीशान के मुंह से “व्हाट द फ…” निकलता है. यही वह शब्द है जो विवाद का विषय है.

वेब सीरीज में एक डायलाग है जब एक छोटी जाति का आदमी ऊंची जाति की औरत को डेट करता है तो वह बदला ले रहा होता है.

दरअसल यह वेब सीरीज समाज में हो रही घटनाओं की सिलसिलेवार तस्वीरें पेश कर रही है. सिनेमा को यूं भी समाज का आइना कहा जाता है.

भगवान के मुंह से गाली निकल गई तो विरोध का बाज़ार सज गया. हकीकत की दुनिया में आइये और सोचिये यह समाज किस मोड़ पर खड़ा है. भगवान राम के नाम पर बन रहे मन्दिर के नाम पर जमा हुए नौ लाख रुपये लखनऊ में किसी ठग ने बैंक से निकाल लिए.

राम मन्दिर के नाम पर देश भर में चंदा वसूली का काम चल रहा है. क्या वह सारा पैसा मन्दिर के एकाउंट में जमा हो रहा है.

सोचिये जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद खड़ी थी उस दौर में लोगों ने करोड़ों रुपये मंदिर के नाम पर दान किये थे. महिलाओं ने अपने जेवर उतारकर दानपात्र में डाल दिए थे. वह पैसे कहाँ गए. उसका हिसाब किसके पास है.

राम के नाम पर दो दिन में सौ करोड़ रुपये जमा हो गए. सौ हज़ार करोड़ भी जमा हो जाएँ तो ताज्जुब की बात नहीं है लेकिन मन्दिर के नाम पर आया पैसा मन्दिर में ही लगना चाहिए. मन्दिर के नाम पर आये पैसे को चुरा लेने वालों से सवाल पूछने का हक़ सबको है.

हज़ारों उदाहरण हैं. मंदिरों की मूर्तियाँ चुराकर उन्हें विदेशों में बेच दिया गया. अफगानिस्तान में भगवान बुद्ध की हज़ारों साल पुरानी मूर्ति को तोड़ दिया गया. ऐसे लोगों को न सजा मिली न मुकदमा दर्ज हुआ.

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यह सही है कि भगवान हमारी भावना का मुद्दा हैं. मगर भगवान को फिल्माने वाले ने अगर आस्था के साथ छेड़खानी की है तो उसके लिए सजा का प्राविधान क़ानून में होना चाहिए. किसी आम आदमी को यह हक़ नहीं मिलना चाहिए कि वह जज बन जाए.

तांडव के विरोध की टाइमिंग गज़ब की है. अर्नब जैसे लोगों को अच्छा वकील करने के लिए वक्त दिया जा रहा है. यह मामला आज नहीं तो कल कोर्ट में जाएगा ही. तब देश यह सवाल ज़रूर पूछेगा कि सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में तीन दिन पहले कैसे पता चला था. किसने बताया था ?

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