Wednesday - 15 July 2020 - 5:19 AM

क्या कोरोना युद्ध में असफल हो रही है सरकार ?

उत्कर्ष सिन्हा

ये खबर लिखने के वक्त 64 दिन हो चुके हैं जब हमारे प्रधानमंत्री ने कोरोना से लड़ाई की शुरुआत की घोषणा जनता कर्फ्यू के साथ की थी । आज दो महीने 4 दिन बाद हालात और भी बदतर हो चुके हैं। शहरों में सिमटा कोरोना गावों तक पहुच चुका है और संक्रमित लोगों की आधिकारिक सूचना 1 लाख 30 हजार के पार है।

हर तरफ से निराश कर देने वाली खबरें आ रही हैं, घर वापसी कर रहे मजदूरों को लाने के लिए जोर शोर से चलाई गई श्रमिक स्पेशल ट्रेने नारकीय यातना के डब्बों का रूप ले लिया है। खबर ये है कि करीब 7 लोग इन ट्रेनों में ही मर गए और उसकी वजह बनी भूख और प्यास।

रेलवे स्टेशनों पर श्रमिकों के फूटे गुस्से के वीडियोज़ वायरल हो रहे हैं। ये बता रहे हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों को धोने वाली भारतीय रेल किस कदर पंगु हो चुकी है, जबकि 40 के करीब ट्रेनों का रास्ता ही बदल दिया गया।

लेकिन रेल मंत्री पीयूष गोयल पर इसका  फ़र्क नहीं पड़ता, वे ट्वीटर पर लगातार सफलता की कहानिया शेयर कर रहे हैं। उनके ट्वीट संदेशों पर अभिजात्य वर्ग लहलोट हो सकता है लेकिन करीब 26 लाख श्रमिकों की बेबसी को ढँक नहीं सकता ।

देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने 20 लाख करोड़ के जिस पैकेज की घोषणा की थी वो सवालों के घेरे में है। जमीन पर सिवाय मनरेगा के और कोई काम ऐसा नहीं हो रहा जो इन बेबस मजदूरों की मुसीबत को कम कर सके। मनरेगा में भी काम उन्ही को मिल रहा जो गावों में पहुँच चुके हैं।

सड़कों पर चलते श्रमिक दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं और सरकारें अपने सफलताओं की प्रेस कांफ्रेंस में व्यस्त है । यूपी के कोरंटीन सेंटर्स इस कदर बदहाल हैं कि वहाँ सांप काटने से मौत हो रही है । कई सेंटर्स ऐसे भी हैं जहां इन बेबस लोगों के लिए न खाना है न शौचालय की कोई सुविधा।

भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्वनी शाही इन आलोचनाओं को सिरे से नकारते हैं। शाही का कहना है कि हमारी सरकार ने लाक डाउन का फैसला जिस तरह और जिस वक्त पर लिया उसे दुनिया भर के विशेषज्ञों ने सराहा है। घर वापसी करते मजदूरों की दिक्कतों का ध्यान रखते हुए जिस तरह से बड़ी संख्या में श्रमिक  स्पेशल ट्रेन चलाई गई वह भी एक एतिहासिक मिसाल बन गई है। स्टेशनों पर इन शमिकों के लिए खाने और पानी के पर्याप्त इंतजाम है, विपक्ष इन प्रयासों की आलोचना कर रहा है तो ये समय राजनीति का नहीं बल्कि सेवा का है।         

आम तौर पर अपनी अचानक की जाने वाली घोषणाओं के पहचाने जाने वाले प्रधानमंत्री बीते कई दिनों से खामोश हो गए हैं। अचानक किये गए लाक डाउन के फैसले की चौतरफा आलोचना हो रही है और उच्च मध्यवर्ग का फोकस जमातियों से हट कर अब इन मजदूरों की तरफ हो गया है जिसे वे कोरोना संकट के बढ़ने का जिम्मेदार ठहराने में जुटा हुआ है।

ये तो सूरत ए हाल है जमीनी सच्चाई का, लेकिन इन सबके बीच भारी बहुमत से चुनी गई सरकार कर क्या रही है इसे भी देख लेना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार अजय त्रिवेदी कहते हैं- केंद्र हो या उत्तर प्रदेश, सरकारे अफसरों पर अति निर्भरता की शिकार हैं । चुनी हुई सरकार के अधिकांश मंत्री गायब हैं या फिर ट्विटर तक सिमटे हुए हैं। सांसद और विधायक पंगु हो चुके हैं। वे अपने स्तर पर जो कुछ कर लें लेकिन आपदा काल में उनकी कोई आधिकारिक भूमिका नहीं बन पा रही है। कैबिनेट हासिए पर है। वह सिर्फ फैसलों पर मुहर लगाने का काम कर रही है।

समाजवादी चिंतक असित यादव इस बात को आगे बढ़ाते हुए सवाल उठाते है कि क्या केंद्र और राज्य में कोरोना से युद्ध के विरुद्ध इन जनप्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ? जनता से चुना गया व्यक्ति अपनी जनता के प्रति संवेदनशील होता है और स्थानीय स्तर पर होने वाली व्यवस्था में वो बहुत प्रभावी हो सकता है, जबकि अफसरशाही की संवेदनाएं हमेशा ही संदेह के घेरे में रहती हैं।

केंद्र की सरकार के हर फैसले असफलता को और भी ज्यादा दिखा रहे हैं। स्वास्थ्य, वित्त, और रेलवे जैसे महत्वपूर्ण महकमों में बुनियादी सोच का बड़ा अभाव दिख रहा है। इसलिए एक के बाद एक आने वाली नीतियाँ कोई सार्थक बदलाव नहीं कर पा रही।

यूपी में बनी टीम 11 में ऐसे ही अफसर भरे हैं जो महज आंकड़ों की बाजीगरी से भ्रमित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उनपर निर्भरता इस कदर है कि अक्सर उनके दिए गए आंकड़ों को बताने के चक्कर में किरकिरी हो जा रही है।

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पहले एक दिन में 90 लाख रोजगार की घोषणा और फिर श्रमिकों में संक्रमण का प्रतिशत बताने में हुई बड़ी चूक ऐसे ही सूचनाओं की मिसाल हैं। जिन पर उठने वाले सवालों का कोई जवाब सरकार के पास नहीं है।

सरकार की सबसे बड़ी चूक विशेषज्ञों का समूह बनाने में हुई है। राजनीतिक विश्लेषक प्रियंका मजूमदार का मानना है कि ऐसे आपदा काल में सरकारो को सभी पार्टियों के नेताओं के साथ मिल कर काम करना चाहिए था । एक समन्वय समिति बनाई जाती जिससे राजनीति की गुंजाईश खत्म हो जाती । इसके साथ ही हर जरूरी विषयों पर विशेषज्ञों की समितियों को काम करने देना चाहिए था और जिले और ग्रामीण क्षेत्रों में सांसदों और विधायकों के नेतृत्व में राहत कमेटियाँ बना देनी चाहिए थी।

प्रियंका मजूमदार की बातों में दम है। जब फैसले विकेंद्रित होने की बजाय एक केंद्र में सिमट जाते हैं तो इतने बड़े देश को सम्हालना मुश्किल होगा ही।

अब जब कोरोना का संक्रमण हर तरफ फैल चुका है तब स्थिति को सम्हालना होगा। यह समय भारत के ग्रामीण क्षेत्रों को बचाने का है । घोषणाओं से आगे निकल कर जमीन पर सेवाएं देने के लिए सभी तंत्र सक्रिय किये जाने की जरूरत है और अफसरशाही से निकल कर जनप्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ाने की जरूरत है।

क्या प्रचंड बहुमत के नशे में डूबी सरकार इस तरह सोच पाएगी?

 

 

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