Sunday - 27 November 2022 - 8:07 AM

क्या एक व्यापक लॉकडाउन का कोई उचित विकल्प है!

योगेश बंधु

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सीमित क्षेत्रों में सीमित छूट के साथ लाकड़ाउन 2.0 की घोषणा एक ईअंतराष्ट्रीय नीति प्रबंधको के शोध परक अनुमानों पर आधारित है। भारत द्वारा उठाए गए क़दम को तार्किक रूप से विश्व के सभी देशों में आज़माया जा रहा है।

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड साइन्स के सिल्वर प्रोफेसर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री देबराज रे और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज एम आई डी एस से सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस सुब्रमण्यन ने आवश्यक रूप से एक व्यापक लाकड़ाउन के अनिवार्य दोषों ग़रीबी, बेरोज़गारी, बुखमरी आदि को कम करने के लिए एक रोडमैप सुझाया है।

इस रोडमैप को अपनाने पर अमरेका सहित यूरोप के कई देश विचार कर रहें हैं क्योंकि आलोचनाओं या अतित्साह से प्रभावित होकर लाकड़ाउन को शिथिल करने का दुष्परिणाम चीन,जापान सहित सभी देशों ख़ासकर बड़ी आबादी वाले देशों में फिर से उभरने लगे हैं।

जीवन की सुरक्षा भौतिक नुकसान से पहले आती है इसलिए सामान्य लॉकडाउन 1.0 को लागू करने के साथ ही पहले सबसे सही कदम मुख्य रूप से गरीबों की भौतिक सुरक्षा की रक्षा के लिए कल्याणकारी उपायों की एक व्यापक योजना को लागू करना ज़रूरी था।

इसके लिए पर्याप्त आवश्यक सूचनाएं लक्ष्यीकरण और अनौपचारिक क्षेत्र की व्यापकता भी विचारणीय विषय हैं जो किसी भी सरकार के लिए चाहे वो कितने अच्छी नीयत वाले हों इन्हें लागू करना अत्यंत कठिन बनाते हैं। जैसा कि लाकड़ाउन के आरम्भिक दिनों भारत में हमें देखने को मिला जब कई शहरों से तमाम आंगठित मज़दूरो और कामगारों के सामूहिक पलायन की ख़बरें आयीं।

इस प्रकार लाकड़ाउन में सामाजिक दूरी का विकल्प अनिवार्य लोगों को अपनी आजीविका से वंचित करने के दूसरे विकल्प से जुड़ा हुआ है।लॉकडाउन लोगों के बीच सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने का एक शक्तिशाली तरीका है जिसके द्वारा वायरल संक्रमण की दर और पहुंच को कम किया जा सकताहै। लेकिन व्यापक लॉकडाउन के सामान्य अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और आर्थिक बोझ अत्यधिक भारी हैं।

उत्तरोत्तर व्यापक आर्थिक मंदी इस क़दम का सर्वाधिक निश्चित परिणाम है जो घरेलू आय रोजगार और पोषण से संबंधित सभी मुद्दों को प्रभावित करेगा। जब कोविड -19 के खिलाफ भारत की लड़ाई में एहम सामाजिक दूरी के जिस विकल्प का चयन कर रहे हैं लोगों को अपनी आजीविका से वंचित करना इसका आवश्यक दुष्परिणाम है।

देबराजरे और सुब्रमण्यन इन दुष्परिणामों को कम करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया जिसके अनुसार युवाओं को कानूनी रूप से काम करने की अनुमति देने के साथ अंतर पीढ़ी संचरण से बचने के संक्रमण के सम्भावित केंद्रों को लाकडाउन में ही रखा जाना बेहतर होगा।

उनके अनुसार संकट के इस समय में यह अनिवार्य है कि हमारे प्रयासों को उननीतियों पर केंद्रित किया जाए जो व्यवहार्य हों य खुद ऐसे उपायों से बचा जाए जो अधिकांश नागरिकों के लिए कष्टप्रद हों या जीवन निर्वाह से जुड़े आजीविका से सम्बद्ध निजी कार्यों को अपराधन माना जाए और सरकार की नीयति को विश्वसनीय स्पष्ट और प्रभावी रूप से संप्रेषित किया जाए।

देबराजरे और सुब्रमण्यन के अनुसार लोगों को अपनी आजीविका से वंचित करने का दूसरे विकल्प अविश्वसनीय रूप से एक मुश्किल विकल्प है। यह अमेरिका जैसे समृद्ध देशों में भी आसान नहीं है जहां आय का वितरण अत्यधिक असमान है और सामाजिक ताना बाना इस प्रकार का है कि यह लॉकडाउन के तहत एक वास्तविक संभावना है। ये चिंताएं भारत में कई गुना अधिक हैं।

 

यह देखते हुए कि अधिकांश नौकरियों और व्यवसायों के लिए किसी न किसी रूप में पारस्परिक संपर्क अपरिहार्य है ऐसे में एक सामान्य अनिवार्य लॉकडाउन संभव नहीं हो सकता है। इसलिए व्यापक लॉकडाउन के साथ आजीविका पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित तरीक़ा अपना सकते हैं

1. उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि कोविड.19 से 20 और 40 वर्ष की आयु के लोगों की मृत्यु दर इन्फ्लूएंजा से होने वाली सभी उम्र के लोगों की समग्र मृत्युदर के बराबर है। ऐसे में भारत में 40 वर्ष से कम आयु के सभी वयस्कों को स्वतंत्र रूप से काम करने के अनुमति दबाव नहीं दी जा सकती है। यह कोई आदर्श उपाय नहीं है लेकिन यह औचित्य पूर्ण मध्य मार्ग है और इसे आसानी से मॉनिटर किया जा सकता है।

2. इस उपाय के ख़तरों को रोग प्रतिकारक परीक्षण द्वारा कम किया जा सकता है और निश्चित रूप से करना चाहिए क्योंकि इस तरह के परीक्षण व्यापकरूप से उपलब्ध हैं। इस प्रकार रोगप्रतिकारक परीक्षण के तहत प्रमाणित सभी व्यक्तियों को काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

3.जब संक्रमण दर कम हो जाए तो कार्य अनुमति वर्क पर्मिट हेतु आयु स्तर को बढ़ाने के लिए नए उपाय लागू किए जा सकते हैं।

4. वद्धों और बच्चों को प्रोत्साहन और प्रेरणा के साथ लाकडाउन में रखा जाए। जिन्हें स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा घर घर जाकर सरकार द्वारा सुरक्षा और आवश्यक सेवा प्रदान कीजाए। इनके अतिरिक्त जो लोग आसानी से घर पर रहने का विकल्प चुन सकते हैं उन्हें घर पर दिया जाए। जब कि जो ऐसा नहीं कर सकते उन्हें काम पर जाने का विकल्प दिया जाए।

इसमें स्वाभाविक रूपसे गरीब मजूदर काम करने का विकल्प चुनेंगे जबकि इसके विपरीत अधिक सुरक्षित लोग घर पर रुकने का विकल्प चुनेंगे। लेकिन इससे कम से कम गरीब मजदूर बेरोजगारी आय हानि भूख और जानलेवा आर्थिक कमी की अनैच्छिक आकस्मिकताओं का सामना नहीं करेंगे।

वर्तमान परिस्थितियों में यह प्रस्ताव निसंदेह पर्याप्त स्वीकार करने योग्य है क्योंकि यह अधिकांश परिवारों को जीवन रेखा बचाए रखने की अनुमति देता है और समान संतुलित और उपयोगी रूप से कार्यान्वयन योग्य है।यद्यपि इन उपायों की भी दो संभावित कमियाँ हैं ।

पहला इस बात की क्या गारंटी है कि इस नीति के तहत बुजुर्गों को पर्याप्त सुरक्षा दी जाएगी। इसका जवाब यह है कि कोई गारंटी नहीं है। किसी भी नीति के तहत अंतर पीढ़ी संपर्क से पूरी तरह से नहीं बचा जा सकता है। लाइन अगर एक पूर्ण लॉकडाउन पर विचार करें तो कोई भी इसका पालन करने का बोझ नहीं उठा सकता। ऐसी स्थिति में युवाओं को कानूनी तौर पर काम करने की अनुमति के साथ संक्रमण के ज़्यादा सम्भावित आबादी को आंशिक लॉकडाउन के साथ सुरक्षित रखा जाए।

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दूसरा क्या एक व्यापक लॉकडाउन के सापेक्ष इस उपाय से कोविड.19 की समग्र घटना में वृद्धि नहीं होगी जवाब है हाँ होगी। परंतु ऐसे समय में कोई भी उपाय सर्वश्रेष्ठ नहीं है। संक्रमण की घटनाओं को कम करने के लिए एक सुनिश्चित तरीका ग़रीबों की आजीविका को सुरक्षित कहते हुए एक व्यापक और अच्छी तरह से लागू किया लॉकडाउ नहीं है।

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इस प्रकार कह सकते हैं कि भारत जैसे बड़ी और विविध आबादी वाले देशों के लिए सीमित क्षेत्रों में सीमित छूटके साथ व्यापक लाकड़ाउन ही एक मात्र विकल्प है। संक्रमण से निपटने की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन नीतियों को कितनी सटीक तरीक़े से लागू किया जाता है।

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हालाँकि वर्तमान परिस्थितियों में भारत में कोरोना से निपटने के लिए प्रशासनिक औरआर्थिक चुनौतियों के साथ साथ अनेक सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिसके लिए नीतियो को और भी व्यापक बनाना होगा।

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