Wednesday - 1 April 2020 - 11:10 PM

Covid-19 की मार से, भारत की अर्थ व्यवस्था कैसे संभलेगी

ओम दत्त

संयुक्त राष्ट्र की कान्फ्रेंस आन ट्रेड एंड डेवलपमेंट(UNCTADI) के अनुसार कोरोना वायरस का प्रभाव विश्व की 15 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत पर भी पड़ेगा।

दुनिया भर की सरकारें कोविड -19 के खिलाफ चल रही लड़ाई के कारण मची उथल-पुथल और उससे होने वाले आर्थिक नुकसान से निपटने की तैयारी कर चुकी हैं लेकिन भारत ने आर्थिक नुकसान से निपटने की तैयारी के लिये देरी से कदम उठाया है जबकि देश में कोरोना वायरस का प्रभाव उसके सामने काफी समय पहले ही से ही स्पष्ट था।

आर्थिक क्षति के आकार को लेकर भी भारत में कोई व्यापक सोच देखने को नहीं मिल रही है जबकि प्राथमिक तौर पर हमें आम परिवारों और कारपोरेट क्षेत्र को होने वाली नकदी की बाधा से निपटना होगा।

भारत में नोटबंदी का अनुभव यह दर्शा चुका है कि कैसे अर्थव्यवस्था के संवेदनशील तबके को सुरक्षित किया जाना आवश्यक है। इस तबके में असंगठित क्षेत्र, दैनिक मजदूर ,कमजोर तबका और युवा शामिल हैं।

बीते एक महीने में कीमतों में बदलाव की गति और उसका परिमाण एक दशक पहले के ऐसे ही उथल पुथल वाले महीनों की याद दिलाता है। ग्लोबल एजेंसी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) ने 2020 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी वृद्धि दर 1.1फीसदी कम करके 5.1 कर दिया है, जबकि पहले वृद्धि दर 6.2 फ़ीसदी का अनुमान लगाया गया था।

कोरोना वायरस का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा असर होगा इसका अभी ठीक से आकलन किया जाना संभव नहीं है । वैश्विक आर्थिक उत्पादन पर कोरोना वायरस का प्रभाव ,तेल की कीमतों और शेयर बाजार में तेज गिरावट के असर ने वैश्विक वित्तीय बाजार में तनाव पैदा कर दिया है।पर्यटन और वैश्विक कारोबार बुरी तरह से प्रभावित है।


कामकाज में गिरावट आने से मुद्रा की गति भी धीमी हो जाती है, उपभोक्ता अपने घरों में रुक जाते हैं और उत्पादन में धीमापन आने से कल पुर्जों की आपूर्ति कम होती है । देश के अधिकांश राज्यों में लाकडाउन और कर्फ्यू से संगठित क्षेत्र के ज्यादातर लोगों के लिए आय और खपत दोनों में तेजी से गिरावट आई है।

परिवार तथा कुछ फर्म के पास नकदी संतुलन बेहतर है क्योंकि वे बाहर नहीं जा रहे। यह परिवार सामान्य से कम खर्च कर रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिये हवाई ,रेल और अन्य सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर प्रतिबंध लगाने तथा विभिन्न समारोहों को रद्द करने से होने वाली आय के नुकसान की भरपाई किया जाना संभव नहीं है।जबकि अभी यह सिलसिला लम्बा चल सकता है।

नकदी की कमी होने से उभरते बाजारों के इक्विटी फण्ड से पूंजी बाहर गई ।भारत में पिछले महीने 4 अरब डालर (पिछले 1 सप्ताह में दो अरब डालर की राशि) का बाहर जाना 2008 के खराब दौर के काफी करीब है हालांकि इस बार बाजार पूंजीकरण का अनुपात कुछ बेहतर है।

तेल की कीमतों में तेज गिरावट अनिश्चितता की ओर ओर कदम बढ़ा रही है ।विश्व स्तर पर तेल की कम कीमत से उत्पादक प्रभावित होते हैं और उपभोक्ता लाभान्वित। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में $30 की गिरावट होने पर भारत को सालाना 42 अरब डालर की बचत होती है यानी जीडीपी का करीब 1.4 फीसदी।

यदि कर नहीं बढ़ते हैं तो इसका आधा हिस्सा उपभोक्ताओं को मिलता है और खपत बढ़ाने में मदद मिलती ,लेकिन करों में इजाफा न हो इसकी संभावना कम ही है। एक बार कीमतों में कमी कर में तब्दील करने के बाद सरकार के लिए इसे वितरित करना आसान नहीं होता है।

बाजारों द्वारा शार्ट सेलिंग पर रोक लगाकर बाजार को कुछ मजबूती दी जा सकती है। यद्यपि वैश्विक बाजार में हो रहे उथल पुथल को देखते हुए बाजार को इस बुरे दौर से निकलने में समय लग सकता है।

भारत में वित्तीय क्षमता की कमी और उपभोक्ता तथा निवेशक की रुचि कम होने से भी बाजार को जूझना पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों के लिये केंद्र , रिजर्व बैंक और वित्तीय क्षेत्र को तालमेल की जरूरत होगी व्यापक तस्वीर को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जांय।

अमेरिका जहां संक्रमण का असर ज्यादा है वहां भारी मरकम आर्थिक पैकेज भी है लेकिन भारत को भी अपनी वित्तीय क्षमता के अनुसार एक वित्तीय पैकेज लाने की जरुरत पर विचार करना होगा और यह तय करना चाहिए कि पैकेज की अधिकांश राशि असंगठित और कमजोर वर्ग के तबके पर खर्च हो ।

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने कहा है कि सरकार कम से कम 5लाख करोड़ रूपये का पैकेज दे और इसे इस तरह से तैयार किया जाय कि जरूरतमन्द ही इसका लाभ ले सकें।

अच्छी बात यह है कि आज ही वित्तमंत्री  निर्मला सीतारमण ने बड़े वित्तीय राहत पैकेज देने की घोषणा की है ,लेकिन पैकेज कितने का है इसकी जानकारी नहीं दी गई है।राहत की बात यह भी है कि कुछ बड़े उद्योगपति भी वित्तीय मदद दे रहे हैं जिससे कमजोर तबके को काफी राहत होगी।

आने वाले सप्ताह और महीनों के दौरान नीति निर्माताओं को तेज और सुसंगत कदम उठाने चाहिये साथ ही उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रखना होगा,जो बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।

(लेखक जुबिली पोस्ट मीडिया वेंचर में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं) 

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