Sunday - 1 August 2021 - 1:34 AM

कैसे पहुंचे शून्य से शिखर तक किंग ऑफ चाट

प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

तब देश आजाद नहीं हुआ था। 1941 में लौहार से लखनऊ आये श्री हरि नारायण टण्डन लखनऊ जू के मेन गेट पर चाट का खोमचा लगाने लगे।

बनारसी बाग घूमने आने वाले कुछ देर यहां ठहर कर पेट पूजा किया करते थे। इतनी ब्रिकी हो जाती थी कि रोजी रोटी चल जाती।

1950 में उनके दिन बहुरे जब सरोजनी नायडू ने उन्हें वहीं पर होटल खोलने की जगह एलाट कर दी।

उस जमाने में जू गेट पर यही एकमात्र रेस्टोरेंट था, नाम था देल्ही चाट हाउस।

सब कुछ ठीक ठाक चल ही रहा था एक दिन हरि नारायण जी का एक इन्कम टैक्स इंस्पेक्टर से पंगा हो गया।

छोटी सी बात को इगो पर चोट मानकर इस इशू को बहुत बड़ा बना दिया। उसने किया यह कि शहर भर के सारे चाटवालों को जूठे पत्तों को उठवाकर रेस्टोरेंट के सामने फेंकवा दिये और दलबल के साथ आ धमका।

सारे जूठे पत्ते गिनवाए गये। अगला पिछला जोड़कर इतनी जबर्दस्त पैनाल्टी लगा दी कि चाट हाउस को बंद करना पड़ा। फिर 1956 में हरि नारायण जी ने हजरतगंज के मशहूर हलवासिया मार्केट के बाहर चाट का ठेला लगाना शुरू किया।

सुरेन्द्र टण्डन

… इसमें उनकी मदद घर वालों के साथ साथ उनके बड़े भाई भी करते थे। हरि नारायण जी के बेटे सुरेन्द्र टण्डन भी अपने पिता व ताऊ जी का हाथ बंटाने लगे।

कारण यह था कि हजरतगंज घूमने आने वालों के लिए इससे बेहतर चाट का स्वाद लेने की और कोई जगह नहीं थी। चाट खाने वालों की इतनी भीड़ हो जाया करती थी कि उसको सम्भालना मुश्किल हो जाता।

इसका भी रास्ता निकाला गया। शुक्रवार को केवल आईटी कालेज की लड़कियों को भी चाट दी जाती थी। शनिवार व रविवार को मेडिकल कालेज के डाक्टर व स्टूडेंट के लिए निर्धारित कर दिया गया था।

आम पब्लिक इन तीन दिनों में चाट खाने के लिए आसपास भी नहीं फटकती। मालूम था कि निराशा ही हाथ लगेगी। 1975 में जब इमरजेंसी लगी तो पुलिस वालों ने हलवासिया मार्केट के सामने ठेला लगाने से मना कर दिया।

उनका कहना था कि इससे ट्रैफिक जाम होता है। हरिनारायण जी की कांग्रेस में अच्छी पकड़ थी। वे दिल्ली संजय गांधी से मिले। संजय गांधी ने यहां के अधिकारियों को फोन कर कहा कि टण्डन जी का ठेला न हटायें।

पर स्थानीय पुलिस अधिकारी पता नहीं किस बात को लेकर रुष्ठ थेे कि उन्होंने संजय गांधी का फरमान भी टाल दिया। और ठेला नहीं लगने दिया।

इमर्जेंसी में पुलिस की मनमानी और निरंकुशता को देखते हुए यह निर्णय लिया गया कि हलवासिया में ही एक दुकान ली जाए। दुकान खरीद ली गयी। फिर टण्डन जी की चाट के दीवाने वापस आ गये।

यहां छह साल तक चाट का आनंद लोगों ने लिया तभी 1980 में सुरेन्द्र नारायण टण्डन जी को नगर निगम ने डीएम निवास के सामने, पेट्रोल पम्प के अपोजिट चाट का स्टाल लगाने की जगह एलाट कर दी गयी।

एक बार फिर सरोजनी नायडू मेहरबान हुईं। इस बार उनके नाम के पार्क में स्थान मिला। चाट हाउस का नाम रखा गया किंग आफ चाट। तो इस तरह किंग आफ चाट की नींव पड़ी। जब दुकान जमने लगी और यहां भी चाट के शौकीनों भीड़ लगने लगी तो नगर निगम ने दुकान डिमालिश करने का नोटिस थमा दिया। सुरेन्द्र जी इसके खिलाफ कोर्ट चले गये।

मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। इसी दौड़ भाग में उनका एक्सीडेंट हो गया। अभी वह पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुए थे कि फिर एक दिन भयानक एक्सीडेंट हो गया।

ऑपरेशन हुआ और उनका दाहिना पैर चार इंच छोटा हो गया। कष्ट सहते हुए 2004 में सुरेन्द्र जी ने भी आंखें मूंद ली। अब सारी जिम्मेदारी अर्जुन जी पर आ गयी।

अर्जुन टण्डन

सुरेन्द्र जी के बेटे अर्जुन टण्डन जी के पास अपने पुरखों की रवायत और पिताजी और ताऊजी का अनुभव विरासत में मिला था। उन्हें तो बस उस अजीम परम्परा को आगे बढ़ाना था।

उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चार मुकदमों का निर्णय उनके फेवर में रहा लेकिन अभी भी एक मुकदमें की लड़ाई जारी है।’पिताजी ने हमेशा यही सिखाया कि बेटा हक की लड़ाई अंतिम समय तक लड़नी चाहिए।

हमें बार बार उखाड़ा गया मिट्टी में मिलाने की कोशिशें हुईं लेकिन ऊपर वाले की मेहरबानी और पुरखों के आशीर्वाद से हम बार बार सुर्खुरू हुए।” बताते हैं अर्जुन जी।

किंग आफ चाट यूं तो आलू की टिक्की, पानी व दही चटनी के बताशे, मटर टिक्की तो लोग पसंद करते ही हैं लेकिन उनकी केसरिया गुझिया और काबुली चने बहुत ज्यादा डिमांड में रहते हैं।

केसरिया गुझिया दरअसल दही बड़े ही हैं लेकिन इसका प्रिप्रेशन व शेप गुझिया की तरह होता है। काबुली चने का ट्रीटमेंट भी एकदम अलग होता है।

स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें खास तरह के तैयार मसालों को बड़े अदब से डाला जाता है।पिताजी का साया सिर से उठ जाने के बाद सारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे अर्जुन जी पर उस वक्त वज्रपात हुआ जब 2011 में उनकी माताश्री भी उन्हें दुनिया में अकेला छोड़कर चली गयीं।

अपने को सम्भाला और चाट के सफर को उन्होंने कभी रुकने नहीं दिया। पिताजी की सीख कभी क्वालिटी से समझौता नहीं करना। छोटा हो बड़ा सबकी इज्जत करना, वो आज भी गांठ से बांधे हुए हैं।

बात आयी कि बॉलीवुड में कौन कौन आपकी चाट का चहेता है तो उन्होंने बिना देर किये ढेर से नाम गिना दिये। “कंगना रनाउत, अनूप जलोटा, नील नितिन मुकेश, जया प्रदा, जया भादुड़ी, अमर सिंह, संजय दत्त, रविंद्र जैन जैसे दिग्गज कलाकारों को आना जाना लगा रहता।

हां, एक मजेदार किस्सा सुनाऊं आपको। उन दिनों ये जो सामने आप जहांगीराबाद पैलेस देख रहे हैं, इसी में फिल्म ‘गदर” की शूटिंग चल रही थी।

अमरीश पुरी साहब ने प्रोडक्शन के एक सज्जन से जो मेरे मित्र भी हैं, से कहा कि सुनो जी, यहां कोई अपना खत्री भाई चाट के लिए मशहूर है…हमें भी उसकी चाट खिलवाओ।

फिर तय हुआ कि जब दुकान बंद करने का समय हो तो आप उन्हें बुला लें। सन्नाटे में काम बन जाएगा। तय समय पर चार गाड़ियां दुकान से थोड़ा दूर लग गयीं।

अभी एक दो प्लेट ही सप्लाई होे पायीं थीं कि पता नहीं कहां से यह बात लीक हो गयी। सैंकड़ों की संख्या में लोग आ जुटे। हल्ला मचाने लगे कि अमरीश जी को कार से बाहर निकालो।

बाउंसरों ने जब अपने हाथ खड़े कर दिये तो सरपट सारी गाड़ियां नौ दो ग्यारह हो गयीं। बाद में हमारे मित्र अमरीश पुरी साहब से मुझे मिलाने ले गये तो उन्होंने मुझे गले लगाकर कहा कि आपकी चाट का कोई जोड़ नहीं है।

एक दिन वेष बदलकर खाने जरूर आऊंगा। वह अपना वादा पूरा करने से पहले ही दुनिया से चले गये।””राजनैतिक हस्तियों की बात करूं तो केशरी नाथ त्रिपाठी जी की एक घटना मैं कभी नहीं भूल पाता।

वो हलवासिया के जमाने से हमारे बाप दादाओं के हाथ की चाट खाया करते थे। उनकोे अक्सर मैंने कहते सुना कि जिस दिन वो हमारी चाट खाकर गये उसी शाम उन्हें विधान सभा का अध्यक्ष घोषित किया गया।

मेरे लिए यह लकी है। एक बार उन्हें एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी की एक पुस्तक का विमोचन करने हिन्दी भवन आना था। उन्होंने अपने एक आला अधिकारी से टण्डन की चाट लाने को कहा।

अधिकारी पूछ पूछ के थक गया लेकिन कोई नहीं बता पाया कि टण्डन की चाट कहां मिलेगी। तब किसी ने बताया कि साहब ये तो सामने ही है किंग आफ चाट।

अधिकारी की पेशानी पर आये बल तब खत्म हुए   और वो खुद भी छककर चाट खा कर गये।  कमलापति त्रिपाठी जी जब मु्ख्यमंत्री थे तो खुद दुकान पर आ जाते थे चाट खाने।

डा. नरेश त्रेहन को आज कौन नहीं जानता। जब वो लखनऊ मेडिकल कालेज में पढ़ते थे तब हमारे ठेले पर चाट खाने आते थे। फिर विदेश चले गये। लौटे तो दिल्ली में अस्पताल खोल लिया।

लखनऊ आना नहीं हो पाता था। उनके एक मित्र डा. दीपक हैं, जो लखनऊ में रहते हैं  और अक्सर चाट खाने आ जाते हैं। डा. त्रेहन उनको उलाहना देते कि बेटा तुम तो लकी हो जब चाहते हो जाकर गर्मागर्म आलू चाप उड़ा आते हो।

अरे कभी हमें भी तो चखाओ वो स्वाद जिसे खाकर मैं डाक्टर बना। वह लगभग हर संडे को दिल्ली जाते थे और मेदांता में ही स्पेशल विजिट करते थे। फिर क्या था सारा मटीरियल पैक करके एयरपोर्ट पर पहुंचा दिया गया।

उस रात त्रेहन साहब की आत्मा को असीम तृप्ति मिली जब उन्होंने अपनी मन पसंद केसरिया गुझिया और काबुली चने चखे।हमारी एक यूनिट कैटरिंग काम सम्भालती है। हम नार्थ ईस्ट के कुछ प्रदेशों को छोड़ कर हिन्दुस्तान में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां अपनी चाट लेकर नहीं गये हैं।

कभी कभी तो दो शहरों में हमें आर्डर मिल जाता। एक बार बम्बई आैर कलकत्ता में एक ही समय में आर्डर मिला। एक शाम का था एक रात का। हमने दो दो यूनिट को सक्रिय किया। मैं पहले बम्बई निपटाकर फ्लाइट पकड़कर कलकत्ता पहुंच गया।

एक मजेदार किस्सा बताऊं। हमारे एक प्रशंसक बम्बई में रहते हैं उनके वहां पर दो तीन स्टूडियो हैं। बड़े पैसे वाले हैं। उनके बेटे का जन्मदिन था।

तीन दिन पहले उनका फोन आया कि आपको चाट खिलानी है। तब उतनी फ्लाइट नहीं जाती थीं इसलिए सब पहलेे ही बुक हो जाती थीं।

ट्रेन रिजर्वेशन भी महीनों पहले हो जाता था। मैंने कहा कि वहां तक पहुंचूं कैसे, कोई साधन नहीं है। मैं ये काम नहीं कर पाऊंगा। वह बोले आप अपनी तैयारियां रखें। मैं कुछ इंतजाम करता हूं।

देखता क्या हूं कि कुछ ही घंटों में बोलेरियो गाड़ी मेरे दरवाजे पर आ लगी। ड्राइवर ने सेल्यूट मारा कि सामान लादिये अभी निकलना है। चौबीस घंटे में हम बम्बई पहुंच गये। सब काम अच्छे से निपट गया तो उन्होंने वापसी में प्लेन से भेजा।

देखिए साहब हम लिमिटेड माल बिना लहसुन प्याज के बनवाते हैं। ठीक पांच बजे दुकान खुल जाती है आैर आठ साढ़े आठ बजते बजते सारा माल खत्म हो जाता है।

टण्डन साहब की चौथी पीढ़ी के बेटा राहुल भी अपने पिता अर्जुन जी के कंधे से कंधा मिलाकर अपना पूरा सहयोग दे रहे हैं। यूं तो अर्जुन जी के दो बेटे और भी हैं लेकिन वे साफ्टवेयर इंजीनियर हैं और अपनी दुनिया में मस्त हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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