Wednesday - 1 April 2020 - 9:59 PM

किसानों को ‘मरहम’ की दरकार


प्रीति सिंह

एक बार फिर देश के कई राज्यों के किसान सिसक रहे हैं। खेतों की लहलाती फसल बर्बाद हो गई। किसान सदमे में हैं। राजस्थान के भरतपुर जिले में तो भारी बारिश और ओलावृष्टि  से हुए नुकसान से चार किसान सदमे/ हार्टअटैक से मर चुके हैं तो वहीं दो आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों का सदमें से मरना और आत्महत्या करना कई सवाल छोड़ जाता है, वह भी तब जब सरकार किसानों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना चला रही हो। आखिर इन योजनाओं को लेकर किसानों में विश्वास क्यों नहीं है कि फसल भले ही नुकसान हो गई हो, लेकिन सरकार उनके साथ है।

दरअसल किसानों में यह डर यूं ही नहीं है। देश में सरकारें कई दशकों से फसल बीमा योजनाएं चला रही हैं, लेकिन ये योजनाएं किसानों के नुकसान की सटीक भरपाई करने में सफल नहीं हुई हैं। हाल ही में एक आरटीआई आवेदन से पता चला कि नई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पिछले साल फसलों के नष्ट होने का 3000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हर्जाना किसानों को अभी तक नहीं मिला है, जबकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक फसल कटने के दो महीने के भीतर दावों का भुगतान किया जाना चाहिए।

पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली समेत लगभग पूरे उत्तर भारत में न सिर्फ बेमौसम बारिश हुई, बल्कि ओले भी गिरे। आम नागरिकों के लिए यह मौसम की असामान्य घटना थी, तो वहीं इन सभी राज्यों में महीनों से अपनी-अपनी फसल पर मेहनत कर रहे किसानों के लिए यह एक भारी आपदा थी।

देश में फसलों का बर्बाद होना हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। प्राकृतिक आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित किसान होता है। क्लामेट चेंज की वजह से फसल बर्बाद होने की समस्या और भी बड़ी हो गई है। अमूमन, पूरे उतर भारत में फरवरी तक ठंड खत्म हो जाती हैं, लेकिन इस साल अभी तक हल्की ठंड है। पहले तो मौसम का सटीक पूर्वानुमान किसानों तक पहुंचता नहीं था और अब मौसम का पूर्वानुमान लगाना ही मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है।

सर्दियों में पूरे उत्तर भारत में रबी का कृषि मौसम होता है जिसमें गेहूं, जौ, सरसों, तिल, मसूर दाल इत्यादि जैसी फसलें बोई जाती हैं। इन फसलों की कटाई वसंत ऋ तु में होती है। पिछले सप्ताह जब बारिश के साथ ओले गिरे तब इन सभी राज्यों में फसल या तो कटाई के लिए तैयार खड़ी थी या काट कर मंडी में ले जाने के लिए। दोनों ही सूरतों में फसल असुरक्षित थी और हुआ वही जिसका किसानों को डर था। इतनी फसल बर्बाद हो गई जिसका मूल्य करोड़ों में जाएगा।

एक अनुमान के अनुसार सिर्फ उत्तर प्रदेश में करीब 255 करोड़ रुपये मूल्य की फसल बर्बाद हो गई। ये बर्बादी प्रदेश के कम से कम 35 जिलों में देखी गई। इससे प्रदेश के लगभग 6.5 लाख किसान प्रभावित हुए।

वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि जिलों की तरफ से नुकसान की विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी गई है और अभी तक किसानों की फौरी मदद के लिए जिलों को 66 करोड़ रुपये की धनराशि दे भी दी गई है, पर यह राशि पर्याप्त नहीं है। अब देखना होगा कि फसल बीमा योजना इन हालत में किसानों के कितना काम आती है।

वहीं राजस्थान में एक और अनुमान के मुताबिक बीते सप्ताह बारिश और ओले पडऩे से कम से कम 19 जिलों में लाखों एकड़ में कटाई के लिए तैयार खड़ी सरसों, गेहूं, चना, जौ, जीरा, धनिया और कुछ सब्जियों की फसल बर्बाद हो गई। प्रदेश में सरसों की कुल पैदावार के 10 प्रतिशत के बर्बाद हो जाने का अनुमान है। बताया जा रहा है कि इस नुकसान की वजह से अकेले भरतपुर जिले में चार किसान सदमे और दिल के दौरे से मर चुके हैं।

इसी तरह पंजाब में भी इस बारिश और ओले से किसानों को भारी नुकसान हुआ है। हजारों एकड़ में फैली गेहूं की फसल नष्ट हो गई। नुकसान की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी गई है लेकिन राज्य सरकार की तरफ से अभी स्थिति का आंकलन पूरा नहीं हुआ है। वहीं किसान संगठनों का कहना है कि 30 प्रतिशत से भी ज्यादा गेहूं और लगभग 70 प्रतिशत सब्जियां बर्बाद हो गई हैं और किसानों को इसके अनुसार ही हर्जाना मिलना चाहिए।

फिलहाल धीरे-धीरे यह मामला गंभीर हो रहा है। 17 मार्च को संसद में भी इसकी गूंज सुनाई दी। राजस्थान के नागौर लोक सभा क्षेत्र से सांसद हनुमान बेनीवाल ने इसे संसद में उठाया।

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फसल बीमा योजना पर उठते रहे हैं सवाल

फसल बीमा योजना पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। किसानों और कृषि विशेषज्ञों ने इसे सही तरीके से लागू न करने और किसानों की शिकायतों का समाधान न करने को लेकर कई बार चिंता जाहिर की है।

दरअसल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के तहत दावा भुगतान में काफी असमानता देखी जा रही है और कुल दावों का करीब 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ 30-45 जिलों में भुगतान किया जा रहा है।

पिछले साल डिजिटल मीडिया द वायर द्वारा दायर किए गए सूचना के अधिकार (आरटीआई) आवेदन पर मिली जानकारी के मुताबिक किसानों के 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के दावे का भुगतान नहीं किया जा सका है, जबकि दावा भुगतान की समय-सीमा काफी पहले ही पूरी हो चुकी है। यह जानकारी 2019 जुलाई महीने में राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ हुई एक कॉन्फ्रेंस में दिखाए गए प्रेजेंटेशन में सामने आई थी।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक दिसंबर 2018 में खत्म हुए खरीफ मौसम के लिए किसानों के कुल 14,813 करोड़ रुपये के अनुमानित दावे थे, जिसमें से जुलाई 2019 तक सिर्फ 9,799 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जबकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक फसल कटने के दो महीने के भीतर दावों का भुगतान किया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि खरीफ 2018 के दावों का भुगतान ज्यादा से ज्यादा फरवरी 2019 तक में कर दिया जाना चाहिए था।

ऐसे कैसे सुधरेगी किसानों की हालत

लंबे समय से किसानों की हालत ठीक करनेे को लेकर विमर्श हो रहा है, पर हालात में कोई खास सुधार नहीं दिख रहा। सरकार पर भी लगातार आरोप लगता रहा है कि किसानों की दयनीय हालत को लेकर गंभीर नहीं है। यदि गंभीर होती तो किसान आत्महत्या को मजबूर न होते।

वहीं कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाएं लाकर किसानों की हालत नहीं सुधारी जा सकती। उनका मानना है कि सरकार कृषि में सरकारी निवेश की राशि का हिस्सा कम करती जा रही है, तो ऐसे कैसे किसान की हालत सुधरेगी।

गौरतलब है कि 2011-12 में प्तकृषि में सरकारी निवेश सकल घरेलु उत्पाद/त्रष्ठक्क का हिस्सा 18.2 प्रतिशत था जो कि 2016-17 में घट कर 13.8 प्रतिशत रह गया। मालूम हो 1980 में ये हिस्सा 43 प्रतिशत था। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मोटी बात ये है की अगर कृषि सरकारी निवेश को ही घटाया जा रहा है तो किसानों की हालत कैसे सुधरेगी ?

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