Thursday - 23 January 2020 - 5:28 PM

ऑटो, पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर, कताई जैसे सेक्‍टर में मंदी की मार

न्‍यूज डेस्‍क

देश में नौकरी पिछले कई साल से लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। देश में रोज़गार के गंभीर संकट उत्पन्न हो गए हैं। एक तरफ जहाँ केंद्र की मोदी सरकार द्वारा युवाओं को रोज़गार मुहैया करवाने की दिशा में प्रयास किये जाने का दावा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई सेक्टरों में मंदी के कारण लाखों लोगों की नौकरी पर तलवार लटक रही है, जिससे निपटने में सरकार असक्षम नज़र आ रही है। मंदी की मार झेल रहे ऑटो सेक्टर में कार्यरत करीब 10 लाख कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है।

ऑटो सेक्टर के अलावा देश में पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर और कताई उद्योग की भी हालत खस्ता है। जहां देश के कई महानगरों में लाखों फ्लैट बनने के बाद बिक्री के लिए ग्राहकों के इंतेजार में खाली पड़े हैं, वहीं पॉवर सेक्टर हजारों करोड़ रुपये के बकाये के कारण भारी दबाव में है।

तो देश की करीब एक-तिहाई कताई उत्पादन क्षमता बंद हो चुकी है और जो मिलें चल रही हैं, वह भी भारी घाटे का सामना कर रही हैं। अगर यह संकट दूर नहीं हुआ तो हजारों लोगों की नौकरियां जा सकती हैं।

आपको बता दें कि कॉटन और ब्लेंड्स स्पाइनिंग इंडस्ट्री कुछ उसी तरह के संकट से गुजर रही है जैसा कि 2010-11 में देखा गया था। दूसरी ओर रिपोर्ट की माने तो के अनुसार देश में बिजली वितरण करने वाली कंपनियों पर इस साल जून महीने के अंत में बिजली उत्पादकों का बकाया 46,412 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

बिजली उत्पादक और वितरण कंपनियों के बीच बिजली सौदों में पारर्दिशता लाने के इरादे से बिजली मंत्रालय द्वारा शुरू एक पोर्टल पर दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले साल जून में वितरण कंपनियों पर बिजली उत्पादक कंपनियों का 34,465 करोड़ रुपए बकाया था। सर्वाधिक बकाया वली कंपनियों में तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और जम्मू कश्मीर की बिजली वितरण कंपनियां शामिल हैं।

वहीं, देश के कताई उद्योग अब तक के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। देश की करीब एक-तिहाई कताई उत्पादन क्षमता बंद हो चुकी है और जो मिलें चल रही हैं, वह भी भारी घाटे का सामना कर रही हैं। अगर यह संकट दूर नहीं हुआ तो हजारों लोगों की नौकरियां जा सकती हैं। कॉटन और ब्लेंड्स स्पाइनिंग इंडस्ट्री कुछ उसी तरह के संकट से गुजर रही है जैसा कि 2010-11 में देखा गया था।

नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के अनुसार राज्य और केंद्रीय जीएसटी और अन्य करों की वजह से भारतीय यार्न वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लायक नहीं रह गया है। अप्रैल से जून की तिमाही में कॉटन यार्न के निर्यात में साल-दर-साल 34.6 फीसदी की गिरावट आई है। जून में तो इसमें 50 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है।

अब कताई मिलें इस हालात में नहीं हैं कि भारतीय कपास खरीद सकें। यही हालत रही है तो अगले सीजन में बाजार में आने वाले करीब 80,000 करोड़ रुपये के 4 करोड़ गांठ कपास का कोई खरीदार नहीं मिलेगा।

गौरतलब है कि भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 10 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यह एग्रीकल्चर के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला सेक्टर है। ऐसे में बड़े पैमाने पर लोगों के बेरोजगार होने की आशंका है। यह उद्योग कर्ज पर ऊंची ब्याज दर, कच्चे माल की ऊंची लागत, कपड़ों और यार्न के सस्ते आयात जैसी कई समस्याओं से तबाह हो रहा है।

मंदी की मार धीरे-धीरे हर सेक्‍टर में अपने पैर पंसारते जा रहा है। ऐसे में मोदी सरकार के सामने प्राइवेट सेक्‍टर को बचाने की बड़ी चुनौती होगी। अब देखना ये होगा कि क्‍या कदम उठाते हैं।

 

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